भारतकोश
हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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८६ • • हित चौरासी और उस दर्शन सुखानुभव का वर्णन अपनी सहेलियों से इस प्रकार कर रही हैं- टोड़ी मूल- आजु देखि ब्रज सुन्दरी मोहन बनी केलि। अंस अंस बाहु दै किसोर जोर रूप रासि, मनौं तमाल अरुझि रही सरस कनक बेलि॥ नव निकुंज भ्रमर गुंज, मंजु घोष प्रेम पुंज, गान करत मोर पिकनि अपने सुर सौं मेलि। मदन मुदित अंग अंग, बीच बीच सुरत रंग, पलु पलु हरिवंश पिवत नैन चषक झेलि॥१७॥ भावार्थ - (श्रीहित सजनी कहती हैं-)" सखियों! देखो आज ब्रज सुन्दरि श्रीराधा और मोहन की क्रीड़ा (कैसी भली) बनी है ! रूप की राशि युगल किशोर परस्पर एक के स्कन्ध पर दूसरे की बाहुलता लपेट कर ऐसे शोभित हैं मानो तमाल (द्रुम) से सरस स्वर्ण बेलि लिपट रही हो। नव निकुञ्ज में भ्रमर समूह का सुन्दर और मधुर गुञ्जार हो रहा है। गुञ्जार क्या है प्रेमपुञ्ज है उस गुञ्जन से अपना-अपना स्वर मिलाकर मयूर और कोयल भी गान कर रहे हैं। इधर युगल किशोर भी अङ्ग-अङ्ग से प्रेम मुदित होकर बीच बीच में सुरत आनन्द ले रहे हैं और हरिवंश चन्द्र (सजनी रूप से) इस आनन्द रस को अपने नयन पात्रों में झेल कर प्रति पल पान कर रहे हैं (अर्थात् दर्शन का रस पी रहे हैं।)

  • १८ - अवतरण - इस पद में श्रीहिताचार्य्य चरण ने अपनी स्वामिनी वृन्दावनेश्वरी श्रीराधा के रूप प्रभाव एवं महत्व का वर्णन स्तुति व्याज से किया है। वे कहते हैं- आसावरी मूल-सुनि मेरो वचन छबीली राधा। तैं पायौ रस सिंधु अगाधा॥