हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • ८५ टोड़ी मूल- आजु मेरे कहैं चलौ मृगनैनी। गावत सरस जुबति मंडल में, पिय सौं मिलैं भलैं पिक बैनी।। परम प्रवीन कोक विद्या में, अभिनय निपुन लाग गति लैनी। रूप रासि सुनि नवल किसोरी, पलु पलु घटति चाँदनी रैनी।। (जै श्री) हित हरिवंश चली अति आतुर, राधा रमन सुरत सुख दैनी। रहसि रभसि आलिंगन चुबंन, मदन कोटि कुल भई कुचैनी।।१६।। भावार्थ-(दूती ने कहा-) “हे मृग लोचनि राधे ! आज मेरे कहने पर चलो तो सही ! हे पिक वचनि वहाँ युवति मण्डल में सरस गान परायण प्रियतम से मिलन ही श्रेष्ठ है-भला है। आप तो कोक विद्या में परम प्रवीण हैं, अभिनय (क्रीड़ाओं) में निपुण हैं और नृत्य की अलग लाग आदि गतियों के लेने में भी कुशल हैं। हे रूप राशि नवल किशोरी, सुनिये ! (विलम्ब उचित नहीं है।) अरी ! क्रमशः पल पल करके चाँदनी रात घट ही तो रही है !” श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं (कि सखी के वचनों को सुनकर) रमण (प्रियतम) को सुरत सुख प्रदान करने वाली श्रीराधा अत्यन्त आतुर भाव से चल पड़ीं और उन्होंने एकान्त के रस भरे आलिङ्गन चुम्बन आदि से कोटि कोटि मदन कुल को भी बेचैन कर दिया, (अर्थात कोटि कोटि काम को भी सन्तप्त कर दिया!) – १७ – अवतरण-आज वृन्दावन के मञ्जुल निकुञ्ज भवन में ब्रज सुन्दरी श्रीराधा और श्रीमोहन लाल हिल मिल कर किसी अनिर्वचनीय प्रेम सुख का आस्वादन कर रहे हैं। श्रीहित सखी उस अनिर्वचनीय सुख का दर्शन रस पान कर रही हैं