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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 89

८४ • • हित चौरासी का मुक्त पान किया है, जिससे अधर कमल की अरुणता मन्द है, सुभग कपोलों पर प्रेमावेशित प्रियकृत चुम्बन पूर्वक रुचिर ताम्बूल राग रंजित है। रस विमुग्ध युवति ! तुम मत्त करिणि की भाँति मन्थर पद न्यास पूर्वक अभिगमन करती हो। इस प्रकार रस उद्दीपन कराती हुई सखी कहती है अब अधिक गोपन का प्रयास मत करो। तुमने छबीले नायक के साथ सुरत रसोत्सव सुख लूटा है तभी तो तुम्हारे कटि भूषित वस्त्राभरण श्लथ हैं एवं वक्षस्थल पर बन्धन निर्मुक्त अरुण कंचुकि शोभित है। हित हरिवंश कहते हैं-प्रिय सहचरि से अपने मदनारधन की बात सुनकर प्रसन्न भूता शुचि स्मिता श्रीराधा निकुंज मंदिर की ओर चल पड़ी।

  • १६ - अवतरण-चूँकि श्रीलालजी परम ललित नायक हैं वचन विदग्ध और क्रिया चतुर भी हैं, फिर भी उनके अनेक प्रयत्नों एवं सावधानी के पश्चात् भी परम रूप, गुण, लावण्य मयी अतुला नायिका श्रीराधा कभी कभी मानिनि बन ही बैठती हैं। कभी तो मान सकारण होता है कभी अकारण ही। रस वृद्धि के लिये कह दें या उनके भोलेपन में मान तो हो ही जाता है। तब रूठी हुई भोली प्रिया को मना लेना प्रियतम के लिए काम रखता है। ऐसे अवसरों पर वे किसी का आश्रय ढूढ़ते हैं तब उन्हें चतुर दूतिका हित सजनी के सिवाय और कोई दृष्टि ही नहीं आता। आज भोलीं स्वामिनी रूठ बैठी हैं। प्रियतम उन्हें नहीं मना सके हैं। अब उन्होंने अपनी प्रियतमा को मना लाने के लिये श्रीहित सजनी को दूतिका बनाकर उनके पास भेजा है। दूतिका जाकर अपनी वचन चातुरी से क्षण भर में ही प्रसन्न कर लेती है और इतना प्रसन्न कर लेती है कि प्रियाजी प्रेमाकुल होकर अति आतुर भाव से प्रियतम से जा मिलती हैं। मिलन के अवसर में "आलिंगन चुंबन परिरम्भन," जाने क्या क्या होता है। इतना कि कोटि कोटि काम समूह भी व्याकुल हो उठते हैं, उनके अनन्त रस विलास से। इस विषय का रस पूर्ण वर्णन श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु की अमृत वाणी में देखें। दूतिका नायिका से रास रस प्रसङ्ग का वर्णन करते हुए रस उद्दीपन पूर्वक कहती है-