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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 88

हित चौरासी • • ८३ नोट : इस पद के भावार्थ में प्राचीन टीकाकारों का प्रायः वैमत्य है। लेखक ने भी अपने विचारानुसार सामान्य अर्थ प्रकट किया है। – १५ – अवतरण– प्रातः काल स्वामिनी श्रीराधा की सुरतालस पूर्ण तन्मय दशा को देखकर हित सखी सावधान करने के हेतु मधुर सम्भाषण पूर्वक उनका ध्यान आकृष्ट करती हैं– मूल–अपनी बात मोसों कहि री भामिनी, औंगी मौंगी रहति गरब की माती। हौं तोसों कहत हारी सुनि री राधिका प्यारी, निसि कौ रंग क्यौं न कहति लजाती।। गलित कुसुम बैंनी सुनि री सारँग नैनी, छूटी लट, अचरा वदति, अरसाती। अधर निरंग रँग रच्यौ री कपोलनि, जुवति चलति गज गति अरुझाती।। रहसि रमी छबीले रसन बसन ढीले, सिथिल कसनि कंचुकी उर राती। सखी सौं सुनि श्रवन वचन मुदित मन, चली हरिवंश भवन मुसिकाती।।१५।। भावार्थ–प्रियतम मिलन सुख उन्म के गौरव से उन्मादित हे श्यामे ! तुम अपने हृदय का रसमय आवेश मुझसे प्रकट करो जो तुम गुमसुम मौन पूर्वक आस्वादन कर रही हो। लाड़िली राधे ! मैं तुमसे पूछते पूछते परिश्रान्त प्राय हो गयी हूँ किन्तु तुम अपने सरस चिन्तन की अन्तर्मुखी वृत्ति से तनिक भी निवृत्त नहीं होतीं। रात्रि कालीन.मधुमय प्रिय सङ्गम का सुख वर्णन क्यों नहीं करती, अपनी इस निज दासी से लज्जा क्यों? हे मृग नयनी! तुम्हारे श्रीअङ्गों पर रति चिह्न स्पष्ट है। वेणी गुम्फित पुष्प विगलित हैं केश राशि शिथिल है एवं सहज लज्जा का अनुभव करती हुई तुम वसनाञ्चल की ओट लिये बोलती हो। मधुप मोहन ने तुम्हारे अधर कमल कोष