हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२ • • हित चौरासी इस पद में हित सजनी एवं लाल की उसी समस्या वार्त्ता का वर्णन है- मूल- अधर अरुन तेरे कैसे कैं दुराऊँ? रवि ससि संक भजन किये अपबस, अदभुत रंगनि कुसुम बनाऊँ॥ सुभ कौसेय कसिव कौस्तुभ मनि, पंकज सुतनि लै अंगनि लुपाऊँ। हरषित इंदु तजत जैसे जलधर, सो भ्रम ढूँढ़ि कहाँ हौं पाऊँ॥ अंबु न दंभ कछू नहीं व्यापत, हिमकर तपै ताहि कैसे कैं बुझाऊँ। (जै श्री) हित हरिवंश रसिक नवरँग पिय भृकुटि भौंह तेरे खंजन लराऊँ॥१४॥ भावार्थ- (हित सखि ने कहा-) "हे रसिक वर लाल ! आपके अत्यन्त अरुण अधरों का राग किस प्रकार छिपाऊँ ? यदि मैं कदाचित् उन अधरों की अद्भुतता कुसुम रङ्गों से रंजित करूँ तो भी मुझे रवि शशि रूप प्रेम की आशङ्का है, (अर्थात् ताप शैत्य उभय गुण विशिष्ट प्रेम आपके अधरों में वैवर्ण्य, शुष्कता, कम्पन आदि रूपों में प्रियतमा दर्शन के समय प्रकट हो ही जायगा। तब मेरा रङ्ग निर्माण रूप प्रयास व्यर्थ होगा।) यदि आपके कौस्तुभ मणि को उज्ज्वल कौशेय वस्त्रों से छिपा दिया जाय और पङ्कज पराग के लेपन पूर्वक आपकी श्याम अंग कान्ति का अदर्शन भी कर दूँ किन्तु जब जलद अवगुण्ठन से निर्मुक्त चन्द्रमा की भाँति आपका श्रीमुख उल्लसित हो उठेगा (और इससे आपका भेद खुलने लगेगा, तब मैं वहाँ पर श्रीप्रिया के सम्मुख) कौन सा मिष (संभ्रम) उपस्थित करूँगी? तब तो उस समय वहाँ पर श्रीप्रियाजी के समक्ष न शीतल वचन काम देंगे और न दम्भ, छल या कृत्तिमता ही सफल हो सकेगी। अरे! जब चन्द्रवत! शीतल स्वभाव मयी श्रीप्रिया ही तप्त (कुपित) हो उठेंगी तब मैं उन्हें किन वचनों के द्वारा शान्त व प्रबोधित करूँगी। श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं "किन्तु फिर भी हे रसिक नायक प्रियतम! आपके खञ्जन वत् चपल नयनों का श्रीराधा की भृकुटियों से- अवश्य मिलन करा दूँगी।"