भारतकोश
हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 275 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 86

हित चौरासी • • ८१ भावार्थ—श्रीप्रियाजी ने कहा— "सखि ! नन्द नन्दन ने तो मेरा मन हर लिया है। मैं अपने भवन में बैठी मुक्ता माल पिरो रही थी उन्होंने सबेरे सबेरे मुझ पर काँकरी फेंक कर मेरी तन्मयता भंग करके अपनी ओर आकृष्ट कर लिया। नयनाभिराम रसघन मोहन मूर्त्ति नन्द किशोर की तिरछी चितवन एवं मद मत्त पद गति को देखकर तथा मधुर रस पूर्ण वंशी स्वर को सुनकर किस प्रकार मन स्थिर रह सकता है ? अथ च इन्दीवर श्याम के मुख दर्शन के लिये मेरे नेत्र चकोर वत् तृषित हैं। श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि श्रीप्रिया मुख से उपरोक्त बात सुनकर (सखी ने कहा कि हे युवति ! तुम प्राणों को न्यौछावर करती हुई अपने प्रियतम रसिक वर लाल का मिलन प्राप्त करो। – १४ – अवतरण—युगल किशोर के स्नान का समय है अतः सखियों ने दोनों का कुआन्तर किया है किन्तु प्रियतम श्रीलालजी को यह अल्प कालीन वियोग भी असह्य है। वे आतुर होकर हित सजनी से प्रार्थना करते हैं कि मुझे प्रियाजी के निकट आप पहुँचा दें। किन्तु हित सजनी भी उन्हें इस समय प्रियाजी के स्नान कुञ्ज में पहुँचाने में आपत्ति मान रही है। (अन्ततः प्रियतम के सन्तोष के लिये उन्होंने एक उपाय निकाला कि वे उन्हें सहचरि बनाकर ही कुञ्ज तक ले जायँ किन्तु उनके सहचरि बनाकर यहाँ तक लाने का भेद खुल गया, तो अवश्य प्रियाजी रूठ जायेंगी)। ऐसी दशा में चतुर हित सजनी ने एक चाल चली।। वे एक खासे समय तक श्रीलालजी को बातों में उलझाये रहीं तब तक प्रियाजी स्नान कर चुकीं। प्रियतम को उलझाये रखने की बातें थीं—उनको सहचरि कैसे बनाया जाय ? और कैसे प्रिया जी तक ले जाया जाय ताकि भेद न खुले। यदि कदाचित भेद खुल गया तो क्या क्या हो सकता है ? इत्यादि ! समस्या के निराकरण में बहुत सा समय लग गया तब तक श्रीप्रियाजी स्नान श्रृंगार से निवृत हो लीं और पश्चात् हित सजनी ने उन्हें प्रियाजी के समीप पहुँचा दिया। दोनों मिल गये। वियोग व्यथा मिट गयी।