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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 85

८० • • हित चौरासी प्रवाहित है और मन्द मुकुलित मल्लिकादि पुष्प श्रीवृन्दा कानन को अपनी सुगन्ध से पूरित कर रहे हैं। मधुमयी शरद् शर्वरी पूर्ण हिमकर की मरीचिमाला से अलंकृत है। श्रीहित सखी कहती हैं–हे गोप कुमारि ! हे भामिनि !! आप नरवाहन के प्रभु प्रेम स्मर ताप से व्यथित श्रीश्याम सुन्दर को प्रेममयी चितवन से धन्य धन्य कीजिये; हे निखिल सौन्दर्य राशि! आप मानत्याग पूर्वक प्रियतम के कण्ठ को अपनी मृणाल बाहुओं से अलंकृत करते हुए अतुल आनन्द राशि का अवगाहन कीजिये। नव निकुञ्जान्तर्गत आपकी यह श्याम सङ्गम केलि का उज्ज्वल रस अखिल विश्व वन्द्य है। सर्व श्रेयस्कर है। – १३ – ˙अवतरण – प्रातः काल श्रीप्रियाजी अपने मणिमय निकुञ्ज प्राङ्गण में बैठी अपनी त्रुटित माला का गुम्फन कर रही थीं। उसी समय परम ललित नायक श्रीलालजी उस वीथी से हो निकले और उन्होंने जान बूझ कर एक 'काँकरी' प्रियाजी की ओर फेंकी। प्रियाजी ने लाल की ओर देखा और वे नायकोचित प्रियतम के गुण, रूप एवं माधुर्य्य पर मुग्ध हो गयीं। 'काँकरी फेंकने का प्रयोजन पूर्ण हुआ। श्रीप्रियाजी अपनी मनःस्थिति हित सखी से कह रही हैं– मूल– नंद के लाल हरयौ मन मोर। हौं अपने मोतिनु लर पोवति, काँकरि डारि गयौ सखि भोर॥ बंक बिलोकनि चाल छबीली, रसिक सिरोमनि नंद किसोर। कहि कैसें मन रहत श्रवन सुनि, सरस मधुर मुरली की घोर॥ इंदु गोबिंद वदन के कारन, चितवन कौं भये नैन चकोर। (जै श्री) हित हरिवंश रसिक रस जुवती। तू लै मिलि सखि प्रान अँकोर।।१३।।