हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
DevanagariHindipublished275 पृष्ठ
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६० • • हित चौरासी के व्यवधान हैं। प्रेम में सङ्कोच लज्जा एवं भय के अभाव की स्पष्ट झाँकी आचार्य्य चरण श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु ने बड़े ही अनोखे ढंग से करायी है। सखियाँ श्रीलालजी से कहती हैं- किं रे धूर्त्त प्रवर निकटं यासि नः प्राणसख्या, नूनं बाला कुच तट कर स्पर्श मात्राद्विमुह्येत।
- श्रीराधा सुधानिधि। अर्थात् "क्यों रे धूर्त्त श्रेष्ठ ! तू हमारी प्राण प्यारी सखि (श्रीराधा) के निकट आ रहा है ? निश्चय है कि तू इस बाला के कुच तट स्पर्श मात्र से ही विमोहित हो जायगा।" अस्तु, उपरोक्त उदाहरणों से स्पष्ट हो जाता है कि प्रेम में ऐश्वर्य, ज्ञान, माहात्म्य, लज्जा, घृणा सङ्कोच, भय और ऐसी ऐसी अन्यान्य अनेक बातों का सर्वथा त्याग है- अभाव है। आचार्य्य श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु ने उसी दिव्यतम रस का गान किया है जो प्रेम का सार और विशुद्ध रूप है। जिसका लक्ष्य श्रीहित ध्रुवदासजी ने इस प्रकार कराया है- औरौ भजन आहिं बहुतेरे। ते सब प्रेम भजन के चेरे।। नारदादि सनकादि 'ध्रुव; उद्धव अरु ब्रह्मादि। गोपिनु कौ सुख देखि किय, भजन आपुनौ बादि।। तिन गोपिनु तें दुर्लभ माई। नित्य विहार सहज सुखदाई।। सिव श्रीपति जद्यपि ललचाहीं। मन प्रवेस तिनहूँ कौ नाहीं।। ऐसे रसिक किसोर विहारी। उज्ज्वल प्रेम-विहार अहारी।। अति आसक्त परसपर प्यारे। एक सुभाव दुहुँनि मन हारे।। रस मय बढ़ी नेह की बेली। तेहि अवलंबे नवल नवेली।।