भारतकोश
हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 99

६४ • • हित चौरासी भोग रूप सब प्रियाकौ, भोगी मोहन लाल। संधि सखी हित दुहुँनि कौ मिलवत हैं सब काल॥ इस सर्व व्यापी हित निकुञ विलास का सूत्र है- जो रस रीति सबनि तें दूरि। सो सब विश्व रही भरपूरी॥ मूरि सजीवन कहि दई॥ -सेवक श्रीदामोदर जी। इसी महान् दृष्टि को पाकर श्री भगवत रसिक जी ने अपने उर में ही उस अनिर्वचनीय निकुञ रस का दर्शन और पान किया और एक अजीब मस्ती में वे बोल गये- हमारौ वृन्दावन उर और। माया काल तहाँ नहिं व्यापै, जहाँ रसिक सिर मौर॥ . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . भगवत रसिक बताई सतगुरु अमल अलौकिक ठौर॥ इस 'अमल अलौकिक ठौर' और उसके रस को पाकर उनकी दृष्टि ही 'पलट' गयी। उन्होंने दुई-द्वैत का परदा फाड़ फेंका फिर देखा- जहँ देखें तहँ आपनौ इष्ट धर्म, गुरु धाम। कारज कारन जगत में परि पूरन रति काम॥ परिपूरन रति काम समुझि समता जिन लीनीं। निंदा स्तुति सुपरि विषमता बुधि तजि दीनीं॥ शत्रु मित्र नहिं कोइ ऊँच नहिं नीच कोऊ तहँ। सो घट भगवत रसिक स्याम स्यामा संतत जहँ॥ किन्तु यह दर्शन भाव ऐनक के सहारे किंवा दृष्टि बदल जाने पर ही सम्भव है जिन्होंने इसे पाया वे दलीलों से ऊपर उठकर कह गये- चसमा नित्य विहार कौ दियौ विहारिनि मोहिं। भई प्रीति परतीति उर अंतर लीनौ जोहि॥ अंतर लीनौ जोहि निरंतर निजु धन पायौ। सुक नारद सनकादि नेति निगमागम गायौ॥