भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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९२ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः २७- विशेषतश्च,— प्रणमत्युन्नतिहेतोर्जीवितहेतोर्विमुञ्चति प्राणान् । दुःखीयति सुखहेतोः, को मूढः सेवकादन्यः ? ॥ २७ ॥ और विशेष बात यह है कि—जो उन्नतिके लिये झुकता है, जीनेके लिये प्राणका भी त्याग करता है, और सुखके लिये दुःखी होता है, ऐसा सेवकको छोड़ और कौन भला मूर्ख हो सकता है?' ॥ २७ ॥ दमनको ब्रूते—'मित्र ! सर्वथा मनसापि नैतत्कर्तव्यम् । यतः,— कथं नाम न सेव्यन्ते यत्नतः परमेश्वराः । अचिरेणैव ये तुष्टाः पूरयन्ति मनोरथान् ॥ २८ ॥ दमनक बोला–'मित्र ! कभी यह बात मनसेभी नहीं करनी चाहिये, क्योंकि स्वामियोंकी सेवा यत्नसे क्यों नहीं करनी चाहिये, जो सेवासे प्रसन्न हो कर शीघ्र (सेवकके) मनोरथ पूरे कर देते हैं ॥ २८ ॥ अन्यच्च पश्य,— कुतः सेवाविहीनानां चामरोद्धूतसंपदः । उद्दण्डधवलच्छत्रं वाजिवारणवाहिनी' ॥ २९ ॥ और दूसरे देखो—स्वामीकी सेवा नहीं करने वालोंको चमरके डुलावसे युक्त ऐश्वर्य तथा ऊंचे दंड वाले श्वेत छत्र और घोड़े हाथियोंकी सेना कहां धरी है ? ॥ २९ ॥ करतको ब्रूते—'तथापि किमनेनास्माकं व्यापारेण ? यतोऽव्यापा- रेषु व्यापारः सर्वथा परिहरणीयः । करटक बोला–'तोभी हमको इस कामसे क्या प्रयोजन है ? क्योंकि अयोग्य कामोंमें व्यापार ( अनधिकृत चेष्टा ) करना सर्वथा त्यागनेके योग्य है ॥ पश्य,— अव्यापारेषु व्यापारं यो नरः कर्तुमिच्छति । स भूमौ निहतः शेते कीलोत्पाटीव वानरः' ॥ ३० ॥ देख–जो मनुष्य नहीं करनेके कामोंमें (पड़ना) व्यापार करना चाहता है वह कीलके उखाड़ने वाले बंदरकी तरह धरती पर मृत्युशायी होता है ॥ ३० ॥ दमनकः पृच्छति—कथमेतत् ?' । करटकः कथयति— दमनक पूछने लगा—'यह कथा कैसे है?' तब करटक कहने लगा।—