भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 113, कुल 302 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 113

-३१ ] अनधिकृत चेष्टाका परिणाम ९३

कथा २ [ अनधिकृत चेष्टा करने वाले बंदरकी कहानी २ ] 'अस्ति मगधदेशे धर्मारण्यसंनिहितवसुधायां शुभदत्तनाम्ना कायस्थेन विहारः कर्तुमारब्धः । तत्र करपत्रक्षार्यमाणैकस्तम्भस्य कियद्दूरस्फटितस्य काष्ठखण्डद्वयमध्ये कीलकः सूत्रधारेण निहितः । तत्र बलवान्वानरयूथः क्रीडन्नागतः । एको वानरः कालप्रेरित इव तं कीलकं हस्ताभ्यां धृत्वोपविष्टः । तत्र तस्य मुष्कद्वयं लम्बमानं काष्ठखण्डद्वयाभ्यन्तरे प्रविष्टम् । अनन्तरं स च सहजचपलतया महता प्रयत्नेन तं कीलकमाकृष्टवान् । आकृष्टे च कीलके चूर्णिताण्डद्वयः पञ्चत्वं गतः । अतोऽहं ब्रवीमि—"अव्यापारेषु व्यापारम्" इत्यादि' ॥ दमनको ब्रूते— 'तथापि स्वामिचेष्टानिरूपणं सेवकेनावश्यं करणीयम् ।'— करटको ब्रूते—'सर्वस्मिन्नधिकारे य एव नियुक्तः प्रधानमन्त्री स करोतु । यतोऽनुजीविना पराधिकारचर्चा सर्वथा न कर्तव्या । 'मगध देशमें धर्मारण्यके पास किसी प्रदेशमें शुभदत्त नामक कायस्थने एक मन्दिर बनवाना आरंभ किया । वहां आरेसे चीरा हुआ लट्ठा जो कितनीही दूर तक फट रहा था; उस काटके दोनों भागोंके बीचमें बढ़ईने कील ठोक दी थी । वहां बलवान् बन्दरोंका झुंड खेलता हुआ आया । एक बन्दर मृत्युसे प्रेरित हुएके समान उस लकड़ीकी खूंटीको दोनों हाथोंसे पकड़ कर बैठ गया । वहां उसके लटकते हुए दोनों अंडकोश, उस काटके दोनों भागोंकी संदमें लटक पड़े और फिर उसने स्वभावकी चंचलतासे बडे बड़े उपाय करके खूंटीको खींच लिया, और खूंटीको खींचतेही उसके दोनों अंडकोश पिचले जाने पर वह मर गया ॥ इसलिये मैं कहता हूं—"विना कामके कामोंमें पड़ना" इत्यादि' ॥ दमनकने कहा—'तोभी सेवकको स्वामीके कामका विचार अवश्य करना चाहिये ॥' करटक बोला—'जो सब काम पर अधिकारी प्रधान मंत्री हो वही करे । क्योंकि सेवकको पराये कामकी चर्चा कभी नहीं करनी चाहिये ॥ पश्य,— पराधिकारचर्चां यः कुर्यात् स्वामिहितेच्छया । स विषीदति चीत्काराद्गर्दभस्ताडितो यथा ॥ ३१ ॥