हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 114, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें९४ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ३१- देख, — जो स्वामीके हितकी इच्छासे पराये अधिकारकी चर्चा करता है वह रेंकनेसे मारे गये गधेकी तरह मारा जाता है ॥ ३१ ॥ दमनकः पृच्छति — ‘कथमेतत् ?’ । करटको ब्रूते— दमनक पूछने लगा— ‘यह कथा कैसे है ?’ करटक कहने लगा ।— कथा ३ [ धोबी, धोबन, गधा और कुत्तेकी कहानी ३ ] ‘अस्ति वाराणस्यां कर्पूरपटको नाम रजकः । स चाभिनववय- स्कया वध्वा सह चिरं निधुवनं कृत्वा निर्भरमालिङ्गय प्रसुप्तः । तदनन्तरं तद्गृहद्रव्याणि हर्तुं चौरः प्रविष्टः । तस्य प्राङ्गणे गर्दभो बद्धस्तिष्ठति, कुक्कुरश्चोपविष्टोऽस्ति । अथ गर्दभः श्वानमाह— ‘सखे ! भवतस्तावदयं व्यापारः । तत्किमिति त्वमुच्चैः शब्दं कृत्वा स्वामिनं न जागरयसि ?’ कुक्कुरो ब्रूते—‘भद्र ! मम नियोगस्य चर्चा त्वया न कर्तव्या । त्वमेव किं न जानासि यथा तस्याहर्निशं गृहरक्षां करोमि । यतोऽयं चिरान्निर्वृतो ममोपयोगं न जानाति । तेनाधुनापि ममाहारदाने मन्दादरः । यतो विना विधुरदर्शनं स्वामिन उपजीविषु मन्दादरा भवन्ति ।’ ‘बनारसमैं एक कर्पूरपटक नामक धोबी रहता था। वह नवजवान अपनी स्त्रीके साथ बहुत काल तक विलास करके, और अत्यन्त छातीसे चिपटा कर सो गया । इसके बाद उसके घरके द्रव्यको चुरानेके लिये चोर अंदर घुसा । उसके आंग- नमें एक गधा बंधा था और एक कुत्ता भी बैठा था । इतनेमें गधेने कुत्तेसे कहा-‘मित्र ! यह तेरा काम है, इसलिये क्यों नहीं ऊंचे शब्दसे भोंक कर स्वामीको जगाता है ?’ कुत्ता बोला-‘भाई ! मेरे कामकी चर्चा तुझे नहीं करनी चाहिये, और क्या तू सचमुच नहीं जानता है कि जिसप्रकार मैं उनके घरकी रखवाली रातदिन करता हूं, पर वैसा वह बहुत कालसे निश्चित होकर मेरे उपयोगको नहीं मानता है; इसलिये आजकल वह मेरे आहार देनेमें भी आदर ( फिक्र ) कम करता है । क्योंकि बिना आपत्तिके देखें स्वामी सेवकों पर थोड़ा आदर करते हैं ।