हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 40, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें२० हितोपदेशः [ मित्रलाभः २२- यतः,— 'सुजीर्णमन्नं सुविचक्षणः सुतः सुशासिता स्त्री नृपतिः सुसेवितः । सुचिन्त्य चोक्तं सुविचार्य यत्कृतं सुदीर्घकालेऽपि न याति विक्रियाम्' ॥ २२ ॥ क्योंकि-'अच्छी रीतिसे पका हुआ भोजन, विद्यावान् पुत्र, सुशिक्षित अर्थात् आज्ञाकारिणी स्त्री, अच्छे प्रकारसे सेवा किया हुआ राजा, सोच कर कहा हुआ वचन, और विचार कर किया हुआ काम ये बहुत काल तकभी नहीं बिगड़ते हैं' ॥२२॥ एतद्वचनं श्रुत्वा कश्चित्कपोतः सदर्पमाह—'आः, किमेवमुच्यते ? यह सुनकर एक कबूतर घमंडसे बोला, 'अजी ! तुम क्या कहते हो ? वृद्धानां वचनं ग्राह्यमापत्काले ह्युपस्थिते । सर्वत्रैवं विचारे तु भोजनेऽप्यप्रवर्तनम् ॥ २३ ॥ जब आपत्काल आवे तब वृद्धोंकी बात माननी चाहिये; परन्तु उस तरह सब जगह माननेसे तो भोजन भी न मिले ॥ २३ ॥ यतः,— शङ्काभिः सर्वमाक्रान्तमन्नं पानं च भूतले । प्रवृत्तिः कुत्र कर्तव्या जीवितव्यं कथं नु वा ? ॥ २४ ॥ क्योंकि-इस पृथ्वीतल पर अन्न और पान (इत्यादि सब ) सन्देहोंसे भरा है, किस वस्तुमें खाने-पीनेकी इच्छा करे अथवा कैसे जिए ? ॥ २४ ॥ ईर्ष्या घृणी त्वसंतुष्टः क्रोधनो नित्यशङ्कितः । परभाग्योपजीवी च षडेते दुःखभागिनः' ॥ २५ ॥ ईर्षा करने वाला, घृणा करने वाला, असंतोषी, क्रोधी, सदा संदेह करने वाला और पराये आसरे जीने वाला ये छः प्रकारके मनुष्य हमेशा दुःखी होते हैं' ॥ एतच्छ्रुत्वा सर्वे कपोतास्तत्रोपविष्टाः । यह सुन कर-सब कबूतर ( बहेलियेने चावलके कण जहां छीटे थे ) वहां बैठ गये । यतः,— सुमहन्त्यपि शास्त्राणि धारयन्तो बहुश्रुताः । छेत्तारः संशयानां च क्लिश्यन्ते लोभमोहिताः ॥ २६ ॥