भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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  • २९ ] चित्रग्रीवका कबूतरोंको आश्वासन २१ क्योंकि-अच्छे बड़े बड़े शास्त्रोंको पढ़ने तथा सुनने वाले और संदेहोंको दूर करने वाले (पंडित) भी लोभके वश हो कर दुःख भोगते हैं ॥ २६ ॥ अन्यच्च,- लोभात्क्रोधः प्रभवति लोभात्कामः प्रजायते । लोभान्मोहश्च नाशश्च लोभः पापस्य कारणम् ॥ २७ ॥ और दूसरे-लोभसे क्रोध उत्पन्न होता है, लोभसे विषयभोगकी इच्छा होती है और लोभसे मोह और नाश होता है, इसलिये लोभी पापकी जड है ॥ २७ ॥ अन्यच्च,- असंभवं हेममृगस्य जन्म तथापि रामो लुलुभे मृगाय । प्रायः समापन्नविपत्तिकाले धियोऽपि पुंसां मलिना भवन्ति ॥ २८ ॥ और देखो, सोनेके मृगका होना असंभव है, तो भी रामचन्द्रजी सोनेके मृगके पीछे लुभा गये, इसलिये विपत्तिकाल आने पर महापुरुषोंकी बुद्धियाँ भी बहुधा मलिन हो जाती हैं ! ॥ २८ ॥ अनन्तरं सर्वे जालेन बद्धा बभूवुः । ततो यस्य वचतात्तत्रावल- म्बितास्तं सर्वे तिरस्कुर्व्वन्ति । इसके पीछे सबकेसब जालमें बँध गये । फिर जिसके वचनसे वहां उतरे थे उसका सब तिरस्कार करने लगे; यतः,- न गणस्याग्रतो गच्छेद्सिद्धे कार्ये समं फलम् । यदि कार्यविपत्तिः स्यान्मुखरस्तत्र हन्यते' ॥ २९ ॥ जैसे कि कहा है-समूहके आगे मुखिया होकर न जाना चाहिये, क्योंकि काम सिद्ध होनेसे फल सबको बराबर (प्राप्त) होता है, और जो काम बिगड़ जाय तो मुखियाही मारा जाता है' ॥ २९ ॥ तस्य तिरस्कारं श्रुत्वा चित्रग्रीव उवाच - 'नायमस्य दोषः । उसकी निन्दा सुन कर चित्रग्रीव बोला-'इसका कुछ दोष नहीं है;