भारतकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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२२ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ३०- यतः,— आपदामापतन्तीनां हितोऽप्यायाति हेतुताम् । मातृजंघा हि वत्सस्य स्तम्भीभवति बन्धने ॥ ३० ॥ क्योंकि-हितकारक पदार्थ भी आने वाली आपत्तियोंका कारण हो जाता है, जैसे गोदोहनके समय माताकी जांघ बछड़ेके बांधनेका खूँटा हो जाती है ॥ ३० ॥ अन्यच्च,— स बन्धुर्यो विपन्नानामापदुद्धरणक्षमः । न तु भीतपरित्राणवस्तूपालम्भपण्डितः ॥ ३१ ॥ और दूसरे-बन्धु वह है जो आपत्तिमं पड़े हुये मनुष्योंको निकालनेमें समर्थ हो, और जो दुःखितोंकी रक्षा करनेके उपायके बदले उलहना देनेमें चतुराई बतावे वह बन्धु नहीं है ॥ ३१ ॥ विपत्काले विस्मय एव कापुरुषलक्षणम् । तदत्र धैर्यमवलम्ब्य प्रतीकारश्चिन्त्यताम् । आपत्तिकालमें घबरा जाना तो कायर पुरुषका चिन्ह है, इसलिये, इस काममें धीरज धर कर उपाय सोचना चाहिये; यतः,— विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः । यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ॥ ३२ ॥ क्योंकि-आपदामें धीरज, बढ़तीमें क्षमा, सभामें वाणीकी चतुरता, युद्धमें पराक्रम, यशमें रुचि, और शास्त्रमें अनुराग ये बातें महात्माओंमें स्वभावसेही होती हैं ॥ ३२ ॥ संपदि यस्य न हर्षो विपदि विषादो रणे च धीरत्वम् । तं भुवनत्रयतिलकं जनयति जननी सुतं विरलम् ॥ ३३ ॥ जिसे सम्पत्तिमें हर्ष, और आपत्तिमें खेद न हो, और संग्राममें धीरता हो, ऐसा तीनों लोकके तिलक का जन्म विरला होता है और उसको विरली माता ही जनती है ॥ ३३ ॥ १ अर्थात् तुमने इस उपायसे इस आपत्तिको क्यों नहीं दूर कर दिया ?.