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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

by नारायण पण्डित

Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)

DevanagariHindipublished302 pages
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-५९ ] कार्यसाधनमें युक्ति की प्रशंसा २४१ सिंहेनोक्तम्-‘वरं प्राणपरित्यागः । न पुनरीदृशि कर्मणि प्रवृत्तिः ।’ जम्बुकेनापि तथोक्तम् । ततः सिंहेनोक्तम्-‘मैवम् ।’ अथ व्याघ्रेणोक्तम्-‘मद्देहेन जीवतु स्वामी’ । सिंहेनोक्तम्-‘न कदाचिदेवमुचितम् ।’ अथ चित्रकर्णोऽपि जातविश्वासस्तथैवा- त्मानमाह । ततस्तद्वचनात्तेन व्याघ्रेणासौ कुक्षिं विदार्य व्यापा- दितः सर्वैर्भक्षितः । अतोऽहं ब्रवीमि-“मतिर्दोलायते सत्यम्” इत्यादि । ततस्तृतीयधूर्तवचनं श्रुत्वा स्वमतिभ्रमं निश्चित्य छागं त्यक्त्वा ब्राह्मणः स्नात्वा गृहं ययौ । स छागस्तैर्धूर्तैर्नीत्वा भक्षितः । अतोऽहं ब्रवीमि-“आत्मौपम्येन यो वेत्ति” इत्यादि ॥’ राजाह- ‘मेघवर्ण ! कथं शत्रुमध्ये त्वया चिरमुषितम् ? कथं वा तेषामनुनयः कृतः ?’ मेघवर्ण उवाच-‘देव ! स्वामिकार्यार्थिना स्वप्रयोजन- वशाद्वा किं न क्रियते ? । सिंहने कहा-‘मरना अच्छा है, पर ऐसे काममें मन चलाना अच्छा नहीं ।’ सियारने भी यही कहा। फिर सिंहने कहा-‘ऐसा कभी नहीं ।’ फिर बाघने कहा- ‘मेरे शरीरसे स्वामी प्राण-रक्षण करें।’ सिंहने कहा कि-‘यह भी कभी उचित नहीं है ।’ पीछे चित्रकर्णने भी विश्वासके मारे वैसे ही अपनेको दान देनेके लिये कहा । फिर उसके कहने पर उस बाघने कोखको फाड़कर उसे मार डाला और सबने खा लिया । इसलिये मैं कहता हूँ कि “बुद्धि सचमुच चलायमान हो जाती है” इत्यादि । फिर तीसरे धूर्तकी बात सुन कर अपनी बुद्धिकाही भ्रम समझ कर बकरेको छोड़ कर ब्राह्मण नहा कर घर चला गया । उन धूर्तोंने उस बकरेको ले जा कर खा लिया । इसलिये मैं कहता हूं-“जो अपने समान ( दूसरोंको ) जानता है” इत्यादि ।’ राजा बोला-‘हे मेघवर्ण ! शत्रुओंके बीचमें इतने दिन तक तू कैसे रहा ? अथवा कैसे उन्होंकी विनती की ?’ मेघवर्णने कहा-‘महाराज ! स्वामीके काम चाहने वालेको, अथवा अपने प्रयोजनके लिये क्या नहीं करना पड़ता है ? पश्य,— लोको वहति किं राजन् ! न मूर्ध्ना दग्धुमिन्धनम् ? । क्षालयन्नपि वृक्षाङ्घ्रिं नदीवेगो निकृन्तति ॥ ५९ ॥ देखो—मनुष्य, जलानेके लिये ईंधनको क्या सिर पर नहीं उठाते हैं ? और नदीका वेग वृक्षके चरण अर्थात् जड़को धोता हुआ भी उखाड़ देता है ॥५९॥ हि० १६

राजा बोला—'यह कथा कैसी है ?' मेघवर्ण कहने लगा।—

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२४२ हितोपदेशः [ संधिः ६०- तथा चोक्तम्,— स्कन्धेनापि वहेच्छत्रून् कार्यमासाद्य बुद्धिमान् । यथा वृद्धेन सर्पेण मण्डूका विनिपातिताः' ॥ ६० ॥ जैसा कहा भी है-चतुर मनुष्यकों अपना काम निकालनेके लिये शत्रुओंको कंधे पर बैठा लेना चाहिये। जैसे वृद्ध सर्पने मेंडूकोंको मार डाला' ॥ ६० ॥ राजाह—'कथमेतत् ?' । मेघवर्णः कथयति— राजा बोला—'यह कथा कैसी है ?' मेघवर्ण कहने लगा।— कथा १२ [ भूखा साँप और मेंडकों की कहानी १२ ] 'अस्ति जीर्णोद्याने मन्दविषो नाम सर्पः। सोऽतिजीर्णतया- ऽऽहारमप्यन्वेष्टुमक्षमः सरस्तीरे पतित्वा स्थितः। ततो दूरादेव केनचिन्मण्डूकेन दृष्टः, पृष्टश्च—'किमिति त्वमाहारं नान्वि- ष्यसि ?' । सर्पोऽवदत्—'गच्छ भद्र ! मम मन्दभाग्यस्य प्रश्नेन किम् ?' । ततः संजातकौतुकः स च भेकः सर्वथा कथ्यताम्' इत्याह । सर्पोऽप्याह—'भद्र ! ब्रह्मपुरवासिनः श्रोत्रियस्य कौण्डि- न्यस्य पुत्रो विंशतिवर्षीयः सर्वगुणसंपन्नो दुर्दैवान्मम नृशंस- स्वभावाद्दष्टः । तं पुत्रं सुशीलनामानं मृतमालोक्य मूर्च्छितः कौण्डिन्यः पृथिव्यां लुलोठ । अनन्तरं ब्रह्मपुरवासिनः सर्वे बान्धवास्तत्रागत्योपविष्टाः । एक पुराने उपवनमें मंदविष नाम सर्प रहता था। वह अधिक बूढ़ा होनेसे आहार भी ढूँढ़नेके लिये असमर्थ हुआ सरोवरके किनारे पर लटक कर बैठा था। फिर दूसरे किसी मेंढ़कने देखा, और पूछा—'क्या बात है जो तुम भोजनको नहीं ढूँढ़ते हो ?' सर्पने कहा—'मित्र ! जाओ, मुझ भाग्यहीनका क्या पूछना है ?' फिर आश्चर्ययुक्त हो कर उस मेंढ़कने यह कहा कि 'अवश्य ही कहो।' सर्पने कहा- 'मित्र ! ब्रह्मपुरके निवासी कौंडिन्य नामक वेदपाठीके सब गुणोंसे युक्त बीस [L27: बरसके पुत्रको दुर्भाग्य और दुष्ट स्वभावसे मैंने डस लिया। तब उस सुशील नाम पुत्रको मरा हुआ देख कर कौंडिन्य पछाड़ खा कर धरतीपर गिर पड़ा ! पीछे सब ब्रह्मपुरवासी बान्धव वहाँ आ कर बैठे ।

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-६५] स्नातकका कौण्डिन्यको उपदेश २४३ तथा चोक्तम्, — उत्सवे व्यसने युद्धे दुर्भिक्षे राष्ट्रविप्लवे । राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः' ॥ ६१ ॥ जैसा कहा है—विवाह आदि उत्सवमें, दुःखमें, संग्राममें, अकालमें, राज्यके पालटेमें, राजद्वारमें और श्मशानमें जो साथ रहता है वह सच्चा बान्धव है' ॥ तत्र कपिलो नाम स्नातकोऽवदत्—'अरे कौण्डिन्य ! मूढोऽसि, तेनैव विलपसि । वहाँ एक कपिल नाम भिक्षुने कहा-'अरे कौंडिन्य ! तुम मूर्ख हो, इसीसे विलाप करते हो । शृणु,— क्रोडीकरोति प्रथमं यथा जातमनित्यता । धात्रीव जननी पश्चात्तथा शोकस्य कः क्रमः ? ॥ ६२ ॥ सुनो—जैसे पहले प्राणीके उत्पन्न होते ही, अनित्यता (नश्वरता) ग्रहण करती है, वैसे ही पीछे धायके समान माता गोदमें खिलाती है, इसलिये इसमें शोककी कौनसी बात है ? ॥ ६२ ॥ क्व गताः पृथिवीपालाः ससैन्यबलवाहनाः ? । वियोगसाक्षिणी येषां भूमिरद्यापि तिष्ठति ॥ ६३ ॥ सेनाके चतुरंग बल तथा हाथी, घोड़े इत्यादिसे युक्त राजा कहाँ गये ? जिन्होंनेके वियोगकी साक्षी देने वाली पृथ्वी आज तक वर्तमान है ॥ ६३ ॥ अपरं च,— कायः संनिहितापायः संपदः पदमापदाम् । समागमाः सापगमाः सर्वमुत्पादि भङ्गुरम् ॥ ६४ ॥ और दूसरे-शरीरके संग नाश है, संपत्तियाँ विपत्तियोंका स्थान हैं, समागमके साथ वियोग है, और सब उत्पन्न होने वाली वस्तु नाश होने वाली हैं ॥ ६४ ॥ प्रतिक्षणमयं कायः क्षीयमाणो न लक्ष्यते । आमकुम्भ इवाम्भःस्थो विशीर्णः सन् विभाव्यते ॥ ६५ ॥ यह शरीर क्षणक्षणमें घटता हुआ भी नहीं दीखता है, जैसा जलके भीतर धरा हुआ कच्चा घड़ा जलसे खाली हो जाता है तब जाना जाता है ॥ ६५ ॥

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२४४ हितोपदेशः [ संधिः ६६- आसन्नततरतामेति मृत्युर्जन्तोर्दिने दिने । आघातं नीयमानस्य वध्यस्येव पदे पदे ॥ ६६ ॥ मारनेके लिये वधस्थानमें ले गये हुए वध्य पुरुषके समान मृत्यु प्राणियोंके दिन पर दिन पास चली जाती है ॥ ६६ ॥ अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं द्रव्यसंचयः । ऐश्वर्यं प्रियसंवासो मुह्येत्तत्र न पण्डितः ॥ ६७ ॥ यौवन, रूप, जीवन, द्रव्यका संचय, ऐश्वर्य तथा स्त्रीपुत्रादि प्यारोंसे बोल- चाल, रहना सहना, ये सब अनित्य हैं; इस लिए बुद्धिमानको चाहिये कि वह इनसे मोह न करें ॥ ६७ ॥ यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महोदधौ । समेत्य च व्यपेयातां तद्वद्भूतसमागमः ॥ ६८ ॥ जैसे समुद्रमें दो काष्ठके लट्ठे अपने आप बहते हुए चले जाते हैं और मिल कर फिर अलग हो जाते हैं इसी तरह (संसारमें) प्राणियोंका स्त्री, पुत्र, मित्रादि परिवारके साथ मिलना या जुदा होना होता है ॥ ६८ ॥ यथा हि पथिकः कश्चिच्छायामाश्रित्य तिष्ठति । विश्रम्य च पुनर्गच्छेत्तद्वद्भूतसमागमः ॥ ६९ ॥ जैसे कोई मुसाफिर मार्गमें छायाका आसरा ले कर बैठ जाता है और आराम ले कर फिर चला जाता है वैसा ही (इस दुनियामें स्त्री, पुत्र और मित्र वगैरह) प्राणियोंका समागम है ॥ ६९ ॥ अन्यच्च,— पञ्चभिर्निर्मिते देहे पञ्चत्वं च पुनर्गते । स्वां स्वां योनिमनुप्राप्ते तत्र का परिदेवना ? ॥ ७० ॥ और दूसरे-पृथ्वी, जल, तेज, वायु, और आकाश इन पाँच तत्त्वोंसे देह बनी है, फिर अपनी अपनी योनिमें अर्थात् पाँच तत्त्व पाँच तत्त्वोंमें मिल जाने पर उसमें क्या पछतावा है ? ॥ ७० ॥ यावन्तः कुरुते जन्तुः संबन्धान्मनसः प्रियान् । तावन्तोऽपि निखन्यन्ते हृदये शोकशाङ्कवः ॥ ७१ ॥ प्राणी जितना मनको अच्छे लगने वाले संबन्धोंको अर्थात् स्नेहकी गाँठोंको मजबूत करता है, उतनी ही हृदयमें शोककी कुठारें लगती हैं ॥ ७१ ॥

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-७७] संबंध और संबंधियोंकी समस्या २४५ नायमत्यन्तसंवासो लभ्यते येन केनचित् । अपि स्वेन शरीरेण किमुतान्येन केनचित् ॥ ७२ ॥ किसी प्राणीको अपने शरीरका भी ऐसा बहुत काल तक साथ नहीं मिलता है, फिर दूसरों ( पुत्रादिकों ) से क्या आशा है ? ॥ ७२ ॥ अपि च,— संयोगो हि वियोगस्य संसूचयति संभवम् । अनतिक्रमणीयस्य जन्ममृत्योरिवागमम् ॥ ७३ ॥ और भी—जैसे जन्म अवश्य होने वाली मृत्युके आगमनको सूचना करता है वैसे ही संयोग अवश्य होने वाले वियोगको सूचना करता है ॥ ७३ ॥ आपातरमणीयानां संयोगानां प्रियैः सह । अपथ्यानामिवान्नानां परिणामोऽतिदारुणः ॥ ७४ ॥ और अपथ्य अर्थात् हित नहीं करने वाली भक्ष्य वस्तुओंके समान क्षण- भर सुन्दर लगने वाले स्त्री-पुत्रादि प्रिय-जनोंके साथ मिलनेका अन्त बड़ा कष्टदायक होता है ॥ ७४ ॥ अपरं च,— व्रजन्ति न निवर्तन्ते स्रोतांसि सरितां यथा । आयुरादाय मर्त्यानां तथा रात्र्यहनी सदा ॥ ७५ ॥ और भी, जैसे नदीके जलप्रवाह जाते हैं और फिर नहीं लौटते हैं, वैसे ही रात और दिन प्राणियोंकी आयुको ले कर प्रतिक्षणको चले जाते हैं और लौटते नहीं हैं ॥ ७५ ॥ सुखास्वादपरो यस्तु संसारे सत्समागमः । स वियोगावसानत्वादुःखानां धुरि युज्यते ॥ ७६ ॥ संसारमें सज्जनोंका संग अत्यन्त सुख देने वाला है, परन्तु उस संयोगके अंतमें वियोग होनेसे वह सुख-दुःखोंके आगे जोड़ा बन जाता है, अर्थात् अन्तमें दुःख देने वाला होता है ॥ ७६ ॥ अत एव हि नेच्छन्ति साधवः सत्समागमम् । यद्वियोगासिलूनस्य मनसो नास्ति भेषजम् ॥ ७७ ॥ इसीसे विवेकी जन अच्छे लोगोंके समागमको नहीं चाहते हैं कि जिसके वियोगरूपी तलवारसे कटे हुए मनकी औषध नहीं है ॥ ७७ ॥

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२४६ हितोपदेशः [संधिः ७८-

सुकृतान्यपि कर्माणि राजभिः सगरादिभिः । अथ तान्येव कर्माणि ते चाऽपि प्रलयं गताः ॥ ७८ ॥ सगर आदि राजाओंने अच्छे अच्छे कर्म यज्ञ वगैरह किये, फिर वे कर्म और वे राजा भी नाश हो गये ॥ ७८ ॥ संचिन्त्य संचिन्त्य तमुग्रदण्डं मृत्युं मनुष्यस्य विचक्षणस्य । वर्षाम्बुसिक्ता इव चर्मबन्धाः सर्वे प्रयत्नः शिथिलीभवन्ति ॥ ७९ ॥ बड़े दंड करने वाली मृत्युको बार बार सोच कर बुद्धिमान् मनुष्यके भी सब उपाय, बरसातमें भीगे हुए चमड़ेकी गाँठोंके समान ढीले पड़ जाते हैं ॥ ७९ ॥ यामेव रात्रिं प्रथमामुपैति गर्भे निवासी नरवीरलोकः । ततः प्रभृत्यस्खलितप्रयाणः स प्रत्यहं मृत्युसमीपमेति ॥ ८० ॥ वीर पुरुष जिस पहली रातको गर्भमें आता है उसी दिनसे निरंतर गतिसे वह नित्य मृत्युके पास सरकता जाता है ॥ ८० ॥ अतः संसारं विचारय । शोकोऽयमज्ञानस्य प्रपञ्चः । इसलिये संसारको विचारो । यह शोक अज्ञानका पाखंड है । पश्य,— अज्ञानं कारणं न स्याद्वियोगो यदि कारणम् । शोको दिनेषु गच्छत्सु वर्धतामपयाति किम् ? ॥ ८१ ॥ देखो,-जो वियोगही दुःखका कारण होता और अज्ञान कारण नहीं होता, तो प्रतिदिन शोक बढ़ना चाहिये था, फिर भला घटता क्यों जाता है ? इसलिये अज्ञान ही शोकका मूल कारण है ॥ ८१ ॥ तदत्रात्मानमनुसंधेहि । शोकचर्चां परिहर । इसलिये इसमें आत्माको स्थिर करो, शोककी चर्चाको दूर करो; यतः,— अकाण्डपातजातानां गात्राणां मर्मभेदिनाम् । गाढशोकप्रहाराणामचिन्तैव महौषधिः' ॥ ८२ ॥

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-८५ ] संयम और सदाचरणकी प्रशंसा २४७ क्योंकि-कुसमयमें गिरनेसे उत्पन्न हुए, शरीरके मर्मस्थानको विदारण करने वाले कठोर शोकके प्रहारोंकी चिंता नहीं करना ही बड़ी औषधि है ॥८२॥ ततस्तद्वचनं निशम्य प्रबुद्ध इव कौण्डिन्य उत्थायाब्रवीत्—'तद- लमिदानीं गृहनरकवासेन । वनमेव गच्छामि ।' फिर उसका वचन सुन कर जागे हुएके समान उठके कौंडिन्य बोला-'अब नरकके समान घरका रहना ठीक नहीं है, वनकोही जाता हूँ । कपिलः पुनराह— 'वनेऽपि दोषाः प्रभवन्ति रागिणां गृहेऽपि पञ्चेन्द्रियनिग्रहस्तपः । अकुत्सिते कर्मणि यः प्रवर्तते निवृत्तरागस्य गृहं तपोवनम् ॥ ८३ ॥ कपिल फिर बोला-'प्रेमियोंको अर्थात् संसारके झगड़ोंमें फँसे हुओंको वनमें भी दोष अर्थात् काम, क्रोध, लोभ, और मोहादिक होते हैं; घरमें भी पाँचों इन्द्रियोंका रोकना तपके समान है । और जो अच्छे काममें प्रवृत्त होता है और विषयादि रागोंको छोड़ देता है उसका घर ही तपोवन है ॥ ८३ ॥ यतः,— दुःखितोऽपि चरेद्धर्मं यत्र कुत्राश्रमे रतः । समः सर्वेषु भूतेषु न लिङ्गं धर्मकारणम् ॥ ८४ ॥ क्योंकि-किसी आश्रममें अनुरक्त हो, दुःखी हो कर भी धर्मका आचरण करे और सब प्राणियोंमें समान स्नेह रक्खे; केवल सिर मुंडा कर गेरुए कपड़े आदि धारण वगैरह चिन्हही धर्मका कारण नहीं है ॥ ८४ ॥ उक्तं च,— वृत्त्यर्थं भोजनं येषां संतानार्थं च मैथुनम् । वाक् सत्यवचनार्थाय दुर्गाण्यपि तरन्ति ते ॥ ८५ ॥ औरभी कहा है-जिन मनुष्योंका केवल 'आजीविकाके लियेही भोजन है, संतान उत्पन्न करनेके लियेही मैथुन है और सत्य वचन बोलनेके लियेही बाणी है वे कठिन स्थानोंसेभी पार हो जाते हैं ॥ ८५ ॥

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२४८ हितोपदेशः [ संधिः ८६- तथा हि,— आत्मा नदी संयमपुण्यतीर्था सत्योदका शीलतटा दयोर्मिः । तत्राभिषेकं कुरु पाण्डुपुत्र ! न वारिणा शुध्यति चान्तरात्मा ॥ ८६ ॥ जैसा कहा है कि-हे युधिष्ठिर ! इन्द्रियोंका संयमन (रोकना) ही जिसका पुण्यतीर्थ है, सत्यही जिसका जल है, शील जिसका किनारा है और दयाही जिसमें लहरियोंकी माला है, ऐसी आत्मारूपी नदीमें स्नान कर, क्योंकि केवल पानीसे ( स्नान करनेसे ) ही अंदरकी आत्मा शुद्ध नहीं हो सकती है ॥ ८६ ॥ विशेषतश्च,— जन्ममृत्युजराव्याधिवेदनाभिरुपद्रुतम् । संसारमिममुत्पन्नमसारं त्यजतः सुखम् ॥ ८७ ॥ और विशेष करके—जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा, रोग और शोक इनसे भरे हुए अत्यन्त असार इस संसारको छोड़ देने वाले मनुष्यको सुख है ॥ ८७ ॥ यतः,— दुःखमेवास्ति न सुखं यस्माद्यदुपलक्ष्यते । दुःखार्तस्य प्रतीकारे सुखसंज्ञा विधीयते' ॥ ८८ ॥ क्योंकि-इस संसारमें दुःखही दुःख है सुख नहीं है कि जिस दुःखसे जो कुछ सुखकाभी अनुभव होता है, पर दुःखसे पीड़ित मनुष्यके दुःख दूर होने परसे वह दुःखही सुख कहाता है' ॥ ८८ ॥ कौण्डिन्यो ब्रूते—‘एवमेव ।' ततोऽहं तेन शोकाकुलेन ब्राह्मणेन शप्तः—'यदद्यारभ्य मण्डूकानां वाहनं भविष्यसि' इति । कपिलो ब्रूते—‘संप्रत्युपदेशासहिष्णुर्भवान् । शोकाविष्टं ते हृदयम् । ‘कौंडिन्य बोला कि-'ऐसेही है ॥' तब उस शोकसे व्याकुल ब्राह्मणने मुझे शाप दिया--'आजसे लेकर तू मेंडकोंका वाहन होगा । 'कपिल बोला-‘तुम अभी उपदेशको नहीं सुन सकते हो । तुम्हारा चित्त शोकमें डूबा हुआ है। तथापि कार्यं शृणु,— तोभी जो करना चाहिये सो सुनो ॥

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यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी में लिप्यंतरण है:

-९० ] भूखे सांपके मीठे शब्दोंसे सब मेंढ़कोंका नाश २४९ सङ्गः सर्वात्मना त्याज्यः स चेत्त्यक्तुं न शक्यते । स सद्भिः सह कर्तव्यः सतां सङ्गो हि भेषजम्' ॥ ८९ ॥ संग तो सर्वथा त्यागनाही चाहिये और जो वह नहीं छोड़ा जाय तो सज्जनोंके साथ संग करना चाहिये, क्योंकि साधुओंका संग सचमुचही औषधि है ॥ ८९ ॥ अन्यच्च,— कामः सर्वात्मना हेयः स चेद्धाातुं न शक्यते । स्वभार्यां प्रति कर्तव्यः सैव तस्य हि भेषजम्' ॥ ९० ॥ और दूसरे-रतिकी इच्छाभी सर्वथा छोड़ देनी चाहिये, और जो वह नहीं छूट सके तो अपनी स्त्रीके साथही करनी चाहिये, क्योंकि वही सचमुच उसकी औषधि है' ॥ ९० ॥ एतच्छ्रुत्वा स कौण्डिन्यः कपिलोपदेशामृतप्रशान्तशोकानलो यथाविधि दण्डग्रहणं कृतवान् । अतो ब्राह्मणशापान्मण्डूकान् वोढुमत्र तिष्ठामि; अनन्तरं तेन मण्डूकेन गत्वा मण्डूकनाथस्य जालपादनाम्नोऽग्रे तत्कथितम् । ततोऽसावागत्य मण्डूकनाथस्त- स्य सर्पस्य पृष्ठमारूढवान् । स च सर्पस्तं पृष्ठे कृत्वा चित्र क्रमं बभ्राम । परेद्युश्चलितुमसमर्थं तं मण्डूकनाथोऽवदत्—'किमद्य भवान्मन्दगतिः ?' । सर्पो ब्रूते—'देव ! आहारविरहादसमर्थो- ऽस्मि ।' मण्डूकनाथोऽवदत्—'अस्मदाज्ञया मण्डूकान् भक्षय ।' ततः 'गृहीतोऽयं महाप्रसादः' इत्युक्त्वा क्रमश्रो मण्डूकान् खादितवान् । अतो निर्मण्डूकं सरो विलोक्य मण्डूकनाथोऽपि तेन खादितः । अतोऽहं ब्रवीमि—"स्कन्धेनापि वहेच्छत्रून्" इत्यादि ॥ देव ! यात्विदानीं पुरावृत्ताख्यानकथनम् । सर्वथा संधेयोऽयं हिरण्यगर्भो राजा संधीयतामिति मे मतिः ।' राजो- वाच—'कोऽयं भवतो विचारः ? यतो जितस्तावदयमस्माभिस्ततो यद्यस्मत्सेवया वसति तदास्ताम्; नो चेन्निगृह्यताम् ।' यह सुन कर उस कौण्डिन्यने कपिलके उपदेशरूपी अमृतसे शोकरूपी अग्निको शांत कर विधिपूर्वक दंड ग्रहण कर लिया । इसलिये ब्राह्मणके शापसे मेंढ़कोंको चढ़ा कर ले जानेके लिये यहां बैठा हूं । पीछे उस मेंढ़कने जा कर जालपाद नाम मेंढ़कोंके राजाके सामने वह वृत्तान्त कहा, फिर वह मेंढ़कोंका राजाभी आ कर

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[Page Header: २५० हितोपदेशः [ संधिः ९१-]

उस साँपकी पीठ पर चढ़ लिया । और वह सर्प उसे अपने पीठ पर बैठा कर विचित्र विचित्र चालोंसे फिरने लगा । दूसरे दिन चलनेके लिये असमर्थ सर्पसे मेंढकोंके राजाने कहा-‘आज तुम धीरे धीरे क्यों रेंगते हो ? सर्पने कहा-‘महा- राज ! खानेको नहीं मिलनेसे असमर्थ हूं.’ मेंढकोंके स्वामीने कहा-‘हमारी आज्ञासे मेंढकोंको खा लो ।’ फिर “यह महाप्रसाद मैंने ग्रहण किया” यह कह कर वह क्रम क्रमसे मेंढकोंको खाने लगा । फिर मेंढकोंसे खाली सरोवरको देख कर मेंढ़- कोंके राजाकोभी खा लिया. इसलिये मैं कहता हूं, “शत्रुओंको भी कंधे पर चढ़ावे” इत्यादि. हे महाराज ! अब पहले वृत्तान्तके कहनेको रहने दीजिए. सब प्रकारसे यह हिरण्यगर्भ राजा सन्धि करने योग्य है, इसलिए मेरी समझमें तो सन्धि कर लीजिये.’ राजाने कहा-‘यह तुम्हारा कैसा विचार है ? क्योंकि इसको तो हम जीत चुके हैं, फिर जो वह हमारी सेवाके लिये रहे तो भलेही रहे, नहीं तो युद्ध किया जाय. अत्रान्तरे जम्बूद्वीपादागत्य शुकेनोक्तम्—‘देव ! सिंहलद्वीपस्य सारसो राजा संप्रति जम्बूद्वीपमाक्रम्यावतिष्ठते ।’ राजा ससं- भ्रमं ब्रूते—‘किं किम् ?’ । शुकः पूर्वोक्तं कथयति । गृध्रः स्वगतमु- वाच—‘साधु रे चक्रवाक मन्त्रिन् सर्वज्ञ ! साधु ।’ राजा सको- पमाह—‘आस्तां तावदयम् । गत्वा तमेव समूलमुन्मूलयामि ।’ इसी अवसर बीच जम्बूद्वीपसे आ कर तोतेने कहा—‘महाराज ! सिंहल- द्वीपका सारस राजा अब जम्बूद्वीपको घेरे हुये डटा हुआ है।’ राजा घबरा कर बोला-‘क्या क्या ?’ तोतेने पहिली बात दोहरा कर कही । गिद्धने अपने मनमें सोचा कि ‘धन्य है ! अरे चकवे मंत्री सर्वज्ञ ! तुझे धन्य है, धन्य है !’ राजा झुंझला कर बोला-‘इसे तो रहने दो । मैं जा कर उसीको जड़से नाश करूंगा.’ दूरदर्शी विहस्याह— ‘न शरन्मेघवत् कार्यं वृथैव घनगर्जितम् । परस्यार्थमनर्थं वा प्रकाशयति नो महान् ॥ ९१ ॥ दूरदर्शी हँस कर बोला-‘शरदृतुके मेघके समान वृथा गंभीर गर्जना नहीं चाहिये, बड़े पुरुष शत्रुके अर्थको अथवा अनर्थको प्रकट नहीं करते हैं ॥ ९१ ॥

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  • ९३ ] अविचारी कृत्यसे अनुताप होना २५१ अपरं च,— एकदा न विगृह्णीयाद्बहून् राजाभिघातिनः । सदर्पोऽप्युरगः कीटैर्बहुभिर्नाश्यते ध्रुवम् ॥ ९२ ॥ और दूसरे-राजा एकही समय पर बहुतसे शत्रुओंसे नहीं लड़े; क्योंकि, अहंकारी सर्पकोभी निश्चय करके बहुतसी (क्षुद्र) चीटियां मार डालती हैं ॥९२॥ देव ! किमिति विना संधानं गमनमस्ति ? यतस्तदास्तत्पश्चात्प्र- कोपोऽनेन कर्तव्यः । हे महाराज ! बिना मेल किये कैसे जाते हो ? क्योंकि फिर हमारे जानेके बाद यह बड़ा कोप करेगा. अपरं च,— योऽर्थतत्त्वमविज्ञाय क्रोधस्यैव वशं गतः । स तथा तप्यते मूढो ब्राह्मणो नकुलाद्यथा' ॥ ९३ ॥ और दूसरे-जो मूर्ख मनुष्य बातके भेदको न जान कर केवल क्रोधकेही वश हो जाता है वह वैसाही दुःख पाता है जैसा नेवलेसे ब्राह्मण दुःखी हुआ' ॥ ९३ ॥ राजाह—'कथमेतत् ?' । दूरदर्शी कथयति— राजा बोला-‘यह कथा कैसी है ? दूरदर्शी कहने लगा ।— कथा १३ [ माधव ब्राह्मण, उसका बालक, नेवला और साँपकी कहानी १३ ] ‘अस्त्युज्जयिन्यां माधवो नाम विप्रः । तस्य ब्राह्मणी प्रसूत- बालापत्यस्य रक्षार्थं ब्राह्मणमवस्थाप्य स्नातुं गता । अथ ब्राह्म- णाय राज्ञः पार्वणश्राद्धं दातुमाह्वानमागतम् । तच्छ्रुत्वा ब्राह्मणः सहजदारिद्र्यादचिन्तयत्—'यदि सत्वरं न गच्छामि तदाऽन्यः कश्चिच्छ्रुत्वा श्राद्धं ग्रहीष्यति । ‘उज्जयिनी नगरीमें माधव नाम ब्राह्मण रहता था । उसकी ब्राह्मणीके एक बालक हुआ । वह उस बालककी रक्षाके लिये ब्राह्मणको बैठा कर नहानेके लिये
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गई । तब ब्राह्मणके लिये राजाका पार्वणश्राद्ध करनेके लिये बुलावा आया. यह सुन कर ब्राह्मणने जन्मके दरिद्री होनेसे सोचा कि 'जो मैं शीघ्र नहीं जाऊं तो दूसरा कोई सुन कर श्राद्धका आमंत्रण ग्रहण कर लेगा. यतः,— आदानस्य प्रदानस्य कर्तव्यस्य च कर्मणः । क्षिप्रमक्रियमाणस्य कालः पिबति तद्रसम् ॥ ९४ ॥ क्योंकि—शीघ्र नहीं किये गये–लेने, देने और करनेके–कामका रस समय पी लेता है ॥ ९४ ॥ किंतु बालकस्यात्र रक्षको नास्ति, तत्किं करोमि ? यातु, चिर- कालपालितमिमं नकुलं पुत्रनिर्विशेषं बालकरक्षायां व्यवस्थाप्य गच्छामि ।' तथा कृत्वा गतः । ततस्तेन नकुलेन बालक समीपमा- गच्छन् कृष्णसर्पो दृष्ट्वा व्यापाद्य कोपात्खण्डं खण्डं कृत्वा खादितः । ततोऽसौ नकुलो ब्राह्मणमायान्तमवलोक्य रक्त- विलिप्तमुखपादः सत्वरमुपागम्य तच्चरणयोर्लुलोठ । ततः स विप्रस्तथाविधं तं दृष्ट्वा 'बालकोऽनेन खादितः' इत्यवधार्य नकुलं व्यापादितवान् । अनन्तरं यावदुपसृत्यापत्यं पश्यति ब्राह्मण- स्तावद्बालकः सुस्थः सर्पश्च व्यापादितस्तिष्ठति । ततस्तमुपकारकं नकुलं निरीक्ष्य भावितचेताः स परं विषादमगमत् । अतोऽहं ब्रवीमि—"योऽर्थतत्त्वमविज्ञाय" इत्यादि ॥ परन्तु बालकका यहां रक्षक नहीं है, इसलिये क्या करूं ? जो हो, बहुत दिनोंसे पुत्रसेभी अधिक पाले हुये इस नेवलेको पुत्रकी रक्षाके लिये रख कर जाता हूं ।' वैसा करके चला गया. फिर वह नेवला बालकके पास आते हुए काले साँपको देख कर, उसे मार कोपसे टुकड़े टुकड़े करके ( मार कर ) खा गया । फिर वह नेवला ब्राह्मणको आता देख लोहूसे भरे हुए मुख तथा पैर किये शीघ्र पास आ कर उसके चरणों पर लोट गया. फिर उस ब्राह्मणने उसे वैसा देख कर "इसने बालकको खा लिया है" ऐसा समझ कर नेवलेको मार डाला. पीछे ब्राह्मणने जब बालकके पास आ कर देखा तो बालक आनंदमें है और सर्प मरा हुआ पड़ा है । फिर उस उपकारी नेवलेको देख कर मनमें घबरा कर बड़ा दुःखी हुआ; इसलिये मैं कहता हूं, "जो बातके भेदको न जान कर" इत्यादि.

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  • ९८ ] विचारसे कार्यसिद्धि और अविचारसे आपत्ति २५३ अपरं च,— कामः क्रोधस्तथा मोहो लोभो मानो मदस्तथा । षड्वर्गमुत्सृजेदेनमस्मिंस्त्यक्ते सुखी नृपः' ॥ ९५ ॥ और दूसरे—काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार, तथा मद इन छः बातोंको छोड़ देना चाहिये, और इनके त्यागनेसे ही राजा सुखी होता है' ॥ ९५ ॥ राजाह—'मन्त्रिन् ! एष ते निश्चयः ?' मन्त्री ब्रूते—'एवमेव । राजा बोला—'हे मंत्री ! यह तेरा निश्चय है ? मंत्रीने कहा—'हां, ऐसाही है । यतः,— स्मृतिश्च परमार्थेषु वितर्को ज्ञाननिश्चयः । दृढता मन्त्रगुप्तिश्च मन्त्रिणः परमो गुणः ॥ ९६ ॥ क्योंकि—धर्मके तत्त्वोंमें स्मरण, विवेक, बुद्धिकी स्थिरता, दृढ़ता, और मंत्रको गुप्त रखना ये मंत्रीके मुख्य गुण हैं ॥ ९६ ॥ तथा च,— सहसा विदधीत न क्रिया- मविवेकः परमापदां पदम् । वृणुते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव संपदः ॥ ९७ ॥ औरभी कहा है—एकाएक बिना विचारे कोई काम न करना चाहिये, क्योंकि अविवेक याने विवेकका न होना आपत्तियोंका मुख्य स्थान है. और गुणको चाहने वाली संपत्तियां विचार कर करने वाले(सदसद्विवेकी पुरुष)के पास आपसे आप चली आती हैं ॥ ९७.॥ तद्देव ! यदिदानीमस्मद्वचनं क्रियते तदा संधाय गम्यताम् । इसलिये हे महाराज ! जो अब मेरी बात मानों तो मेल करके चलिए । यतः,— यद्यप्युपायाश्चत्वारो निर्दिष्टाः साध्यसाधने । संख्यामात्रं फलं तेषां सिद्धिः साम्नि व्यवस्थिता' ॥ ९८ ॥ क्योंकि—यद्यपि मनोरथके सिद्ध करनेमें चार उपाय ( साम, दाम, दंड और भेद ) कहे हैं तथापि उन उपायोंका फल, केवल गिनतीही है परन्तु कार्यका साधन मेलमें रहता है, अर्थात् मेलसेही कार्य बन जाता है ॥ ९८ ॥
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२५४ हितोपदेशः [ संधिः ९९- राजाह—'कथमेवं संभवति ?' । मन्त्री ब्रूते—'देव ! सत्वरं भवि- ष्यति । यह सुन कर राजा बोला-'ऐसा कैसे हो सकता है ?' मंत्रीने कहा-'महा- राज ! शीघ्र हो जायगा । पश्य,— अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः । ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्मापि नरं न रञ्जयति ॥ ९९ ॥ क्योंकि—मूर्ख सहजमें मिलाने योग्य है, और अधिक बुद्धिमान् और भी सहजमें प्रसन्न कर लिया जा सकता है परन्तु थोड़ेही ज्ञानसे अभिमानी मनुष्यको ब्रह्माभी प्रसन्न नहीं कर सकता है ॥ ९९ ॥ विशेषतश्चायं धर्मज्ञो राजा सर्वज्ञो मन्त्री च । ज्ञातमेतन्मया पूर्वं मेघवर्णवचनात्तत्कृतकार्यसंदर्शनाच्च । और विशेष करके यह राजा धर्मशील और मंत्री सर्वज्ञ है। मैंने यह पहलेही मेघवर्णकी बातसे और उनके किये हुए कार्योंके देखनेसे जान लिया था. यतः,— कर्मानुमेयाः सर्वत्र परोक्षगुणवृत्तयः । तस्मात् परोक्षवृत्तीनां फलैः कर्मानुभाव्यते' ॥ १०० ॥ क्योंकि—सर्वत्र परोक्षमें गुणोंसे युक्त अर्थात् अपने गुणोंको नहीं प्रकट करने वाले पुरुष कर्मसे जाने जाते हैं। इसलिये जिनका आकार और हृदयका भाव छुपा हुआ है ऐसे महान् पुरुषोंको कर्मके बलसे निश्चय करे' ॥ १०० ॥ राजाह—'अलमुत्तरोत्तरेण। यथाभिप्रेतमनुष्ठीयताम्।' एतन्म- न्त्रयित्वा गृध्रो महामन्त्री 'तत्र यथार्हं कर्तव्यम्।' इत्युक्त्वा दुर्गा- भ्यन्तरं चलितः । ततः प्रणिधि बकेनागत्य राज्ञो हिरण्यगर्भस्य निवेदितम्—'देव ! संधिं कर्तुं महामन्त्री गृध्रोऽस्मत्समीपमा- गच्छत्।' राजहंसो ब्रूते—'मन्त्रिन् ! पुनः संबन्धिना केनचिद- त्रागन्तव्यम्।' सर्वज्ञो विहस्याह—'देव ! न शङ्कास्पदमेतत् । यतोऽसौ महाशयो दूरदर्शी। अथवा स्थितिरियं मन्दमतीनाम् । कदाचिच्छङ्कैक न क्रियते, कदाचित्सर्वत्र शङ्का।

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राजा बोला-‘इस उत्तर प्रत्युत्तरको रहने दो। जो करना है सो कीजिये.’ यह परामर्श करके महामंत्री गिद्ध “इसमें जो उचित होगा, सो किया जायगा” यह कह कर गढ़के अंदर चला गया। फिर दूत बगुलेने आ कर राजा हिरण्यगर्भसे निवेदन किया कि ‘महाराज ! महामंत्री गिद्ध हमारे पास मेल करनेके लिये आया है.’ राजहंसने कहा-‘हे मंत्री ! फिर किसी न किसी संबन्धसे यहां आया होगा.’ सर्वज्ञ हँस कर बोला-‘महाराज ! यह शंकाका स्थान नहीं है. क्योंकि यह दूरदर्शी बड़ा सज्जन है। अथवा ऐसा मन्दबुद्धियोंका नियम है कि कभी तो शंका नहीं करते हैं, कभी सर्वत्र शंका करते हैं। तथा हि,— सरसि बहुशस्ताराच्छाया क्षणात्परिवञ्चितः कुमुदविटपान्वेषी हंसो निशास्वविचक्षणः । न दशति पुनस्ताराशङ्की दिवापि सितोत्पलं कुहकचकितो लोकः सत्येऽप्यपायमपेक्षते ॥ १०१ ॥ कुमुदिनीको ढूंढने वाला चतुर हंस रातको सरोवरमें बहुतसे तारोंकी परछा- ईसे क्षणभर ठगा हुआ (अर्थात् तारोंकी परछाईको कुमुदिनी जान कर) दिनमेंभी तारोंकी शंकासे फिर श्वेतकमलोंको नहीं लेता है, जैसे छलसे छला गया संसार सत्यमेंभी बुराईकी शंका करता है ॥ १०१ ॥ दुर्जनदूषितमनसः सुजनेष्वपि नास्ति विश्वासः । बालः पायसदग्धो दध्यपि फूत्कृत्य भक्षयति ॥ १०२ ॥ दुष्टोंसे छले हुए चित्त वाले मनुष्यका सज्जनोंमेंभी विश्वास नहीं रहता है जैसे क्षीरसे जला हुआ बालक दहीकोभी सचमुच फूंक देकर कर खाता है ॥ १०२ ॥ तद्देव ! यथाशक्ति तत्पूजार्थं रत्नोपहारादिसामग्री सुसज्जीक्रिय- ताम्।’ तथानुष्ठिते सति स गृध्रो मन्त्री दुर्गद्वाराच्चक्रवाकेणोप- गम्य सत्कृत्यानीय राजदर्शनं कारितो दत्तासने चोपविष्टः । चक्र- वाक उवाच—‘युष्मदायत्तं सर्वम् । स्वेच्छयोपभुज्यतामिदं राज्यम्।’ राजहंसो ब्रूते—‘एवमेव।’ दूरदर्शी कथयति—‘एव- मेवैतत् । किंत्विदानीं बहुप्रपञ्चवचनं निष्प्रयोजनम् ।

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२५६ हितोपदेशः [संधिः १०३- इसलिये महाराज ! शक्तिके अनुसार उसके सत्कारके लिये रत्नोंकी भेट आदि सामग्री अच्छे प्रकारसे तयार कीजिये । फिर ऐसा करने पर उस गिद्ध मंत्रीको गढ़के द्वारसे चक्रवेने पास जा कर आदरपूर्वक लिवा ला कर राजाका दर्शन कराया. और वह दिये हुए आसन पर बैठ गया। फिर चकवा बोला-'सब तुम्हारे आधीन है । अपनी इच्छानुसार इस राज्यको भोगिये ।' राजहंसने कहा- 'हां, ठीक है ।' दूरदर्शी बोला-'हां, यह ऐसेही हो । परन्तु अब बहुत प्रपञ्चकी बात वृथा है. यतः,- लुब्धमर्थेन गृह्णीयात् स्तब्धमञ्जलिकर्मणा । मूर्खं छन्दानुरोधेन याथातथ्येन पण्डितम् ॥ १०३ ॥ क्योंकि-लोभीको धनसे, अभिमानीको हाथ जोड़ कर, मूर्खको उसका मनोरथ पूरा करके और पण्डितको सच सच कह कर वशमें करना चाहिये ॥ १०३ ॥ अन्यच्च,- सद्भावेन हरेन्मित्रं संभ्रमेण तु बान्धवान् । स्त्री-भृत्यौ दानमानाभ्यां दाक्षिण्येनेतरान्जनान् ॥ १०४ ॥ और दूसरे-विनयसे मित्रको, मीठी बातोंसे बांधवोंको, दान तथा मानसे स्त्री और सेवकोंको तथा चतुरतासे अन्य लोगोंको वशमें करना चाहिये ॥१०४॥ तदिदानीं संधाय गम्यताम् । महाप्रतापश्चित्रवर्णो राजा ।' चक्र- वाको ब्रूते-'यथा संधानं कार्यं तदप्युच्यताम् ।' राजहंसो ब्रूते-'कति प्रकाराः संधीनां संभवन्ति ?' इसलिये अब मेलके लिये चलिये, चित्रवर्ण राजा बड़ा प्रतापी है । चकवा बोला-'जैसे मेल करना चाहिये सोभी तो कहिये ।' राजहंस बोला-'संधियां कितने प्रकारकी हैं ?' गृध्रो ब्रूते-'कथयामि, श्रूयताम्,- गिद्ध बोला-'कहता हूं । सुनिये,- बलीयसाऽभियुक्तस्तु नृपो नान्यप्रतिक्रियः । आपन्नः संधिमन्विच्छेत् कुर्वाणः कालयापनम् ॥ १०५ ॥

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-१११ ] सोलह सन्धि कथन २५७ सबल शत्रुके साथ जिसने युद्ध कर रक्खा है और संधिको छोड़ और कोई जिसका उपाय नहीं, ऐसी आपत्तिमें गिर कर समय व्यतीत करते हुये राजाको संधिकी प्रार्थना करनी चाहिये ॥ १०५ ॥ कपाल उपहारश्च संतानः संगतस्तथा । उपन्यासः प्रतीकारः संयोगः पुरुषान्तरः ॥ १०६ ॥ और कपाल, उपहार, संतान, संगत, उपन्यास, प्रतीकार, संयोग, पुरुषां- तर, ॥१०६ ॥ अदृष्टनर आदिष्ट आत्मादिष्ट उपग्रहः । परिक्रयस्तथोच्छिन्नस्तथा च परभूषणः ॥ १०७ ॥ अदृष्टनर, आदिष्ट, आत्मादिष्ट, उपग्रह, परिक्रय, उच्छिन्न, और पर- भूषण, ॥ १०७ ॥ स्कन्धोपनेयः संधिश्च षोडशैते प्रकीर्तिताः । इति षोडशकं प्राहुः संधिं संधिविचक्षणाः ॥ १०८ ॥ स्कंधोपनेय, यह सोलह प्रकारकी संधि कही गई है और संधिके जानने वाले इन्हींको सोलह संधि करते हैं ॥ १०८ ॥ कपालसंधिर्विज्ञेयः केवलं समसंधितः । संप्रदानाद्भवति य उपहारः स उच्यते ॥ १०९ ॥ केवल समान वालेके साथ मेल करनेको “कपालसंधि” कहते हैं, और जो धन देनेसे होती है वह “उपहारसंधि” कहलाती है ॥ १०९ ॥ संतानसंधिर्विज्ञेयो दारिकादानपूर्वकः । सद्भिस्तु संगतः संधिर्मैत्रीपूर्व उदाहृतः ॥ ११० ॥ कन्यादान देनेसे जो हो उसे “सन्तानसंधि” जाननी चाहिये और सज्जनोंके साथ मित्रतापूर्वक मेल करनेको “संगतसंधि” कहते हैं ॥ ११० ॥ यावदायुःप्रमाणस्तु समानार्थप्रयोजनः । संपत्तौ वा विपत्तौ वा कारणैर्यो न भिद्यते ॥ १११ ॥ जितना अवस्थाका प्रमाण है, तब तक समान धनसे युक्त रहे और संपत्ति या विपत्तिमें अनेक कारणोंसेभी नहीं टूटे ॥ १११ ॥ हि० १७

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२५८ हितोपदेशः [संधिः ११२- संगतः संधिरेवायं प्रकृष्टत्वात् सुवर्णवत् । तथाऽन्यैः संधिकुशलैः काञ्चनः स उदाहृतः ॥ ११२ ॥ वह संगतसंधि परमोत्तम होनेसे सुवर्णके समान है और दूसरे संधि जानने वालोंने इसको “कांचनसंधि” कही है, अर्थात् सुवर्णके समान, नम भलेही जाय परन्तु टूटती नहीं है ॥ ११२ ॥ आत्मकार्यस्य सिद्धिं तु समुद्दिश्य क्रियेत यः । स उपन्यासकुशलैरुपन्यास उदाहृतः ॥ ११३ ॥ अपना काम निकालनेके अभिप्रायसे जो की जाती है, उसे नीति जानने वाले “उपन्याससंधि” कहते हैं ॥ ११३ ॥ मयाऽस्योपकृतं पूर्वं ममाप्येष करिष्यति । इति यः क्रियते संधिः प्रतीकारः स उच्यते ॥ ११४ ॥ मैंने पहले इसका उपकार किया है, यहभी भविष्यमें मेरे ऊपर उपकार करेगा; इस हेतुसे जो संधि की जाती है उसे “प्रतीकारसंधि” कहते हैं ॥ ११४ ॥ उपकारं करोम्यस्य ममाप्येष करिष्यति । अयं चाऽपि प्रतीकारो रामसुग्रीवयोरिव ॥ ११५ ॥ और मैं इसका उपकार करता हूं यहभी मेरा करेगा यहभी दूसरे प्रकारकी राम-सुग्रीव जैसी “प्रतीकारसंधि” है ॥ ११५ ॥ एकार्थं सम्यगुद्दिश्य क्रियां यत्र हि गच्छति । सुसंहितप्रमाणस्तु स च संयोग उच्यते ॥ ११६ ॥ जहां एकही प्रयोजनके करनेके लिये दृढ प्रमाणोंसे युक्त संधि होती है, उसको “संयोगसंधि” कहते हैं ॥ ११६ ॥ आवयोर्योधमुख्यैस्तु मदर्थः साध्यतामिति । यस्मिन्पणस्तु क्रियते स संधिः पुरुषान्तरः ॥ ११७ ॥ हम दोनोंके मुख्य योद्धा लोग हमारा कार्यसाधन करे; ऐसी जिसमें प्रतिज्ञा की जाती है वह “पुरुषांतरसंधि” है ॥ ११७ ॥ त्वयैकेन मदीयोऽर्थः संप्रसाध्यस्त्वसाविति । यत्र शत्रुः पणं कुर्यात् सोऽदृष्टपुरुषः स्मृतः ॥ ११८ ॥ और केवल तुझेही मेरे कामको अच्छी तरह कर देना चाहिये; ऐसी प्रतिज्ञा जिस संधिमें शत्रु करे उसे “अदृष्टपुरुषसंधि” कहते हैं ॥ ११८ ॥

जहाँ राज्यका एक भाग देनेके पणसे बलवान् शत्रुके साथ जो संधि की

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-१२५] सन्धि प्रकार २५९ यत्र भूम्येकदेशेन पणेन रिपुरूर्जितः । संधीयते संधिविद्भिः स चादिष्ट उदाहृतः ॥ ११९ ॥ जहाँ राज्यका एक भाग देनेके पणसे बलवान् शत्रुके साथ जो संधि की जाती है, उसको संधि जानने वाले "आदिष्टसंधि" कहते हैं ॥ ११९ ॥ स्वसैन्येन तु संधानमात्मादिष्ट उदाहृतः । क्रियते प्राणरक्षार्थं सर्वदानादुपग्रहः ॥ १२० ॥ अपनी सेनाके साथ जो संधि करता है वह "आत्मादिष्टसंधि" है और जो अपनी रक्षाके लिये सर्वस्व दे कर की जाती है वह "उपग्रहसंधि" है ॥ १२०॥ कोशांशेनार्धकोशेन सर्वकोशेन वा पुनः । शिष्टस्य प्रतिरक्षार्थं परिक्रय उदाहृतः ॥ १२१ ॥ जो कोशसे कुछ भाग, आधे कोशसे या संपूर्ण कोशसे सज्जन मंत्रीकी रक्षाके लिये की जाती है वह "परिक्रयसंधि" कही गई है ॥ १२१ ॥ भुवां सारवतीनां तु दानादुच्छिन्न उच्यते । भूम्युत्थफलदानेन सर्वेण परभूषणः ॥ १२२ ॥ सारवती अर्थात अन्नसे पूर्णा भूमिके देनेसे जो हो उसे "उच्छिन्नसंधि" कहते हैं और भूमिमें उपजे हुए संपूर्ण फलके देनेसे जो हो उसे "परभूषणसंधि" कहते हैं ॥ १२२ ॥ परिक्लिन्नं फलं यत्र प्रतिस्कन्धेन दीयते । स्कन्धोपनेयं तं प्राहुः संधिं संधिविचक्षणाः ॥ १२३ ॥ और जिसमें खेतसे लाया हुआ और स्वच्छ किया हुआ अन्न कंधोंके ऊपर लिब ले जा कर दिया जाता है, संधि जानने वाले उसको "स्कन्धोपनेयसंधि" कहते हैं ॥ १२३ ॥ परस्परोपकारस्तु मैत्री संबन्धकस्तथा । उपहारश्च विज्ञेयाश्चत्वारश्चैव संधयः ॥ १२४ ॥ परस्पर आपसमें उपकार, मित्रता, संबन्ध तथा भेट येभी चार प्रकारकी संधि जाननी चाहिये ॥ १२४ ॥ एक एवोपहारस्तु संधिरेव मतो मम । उपहारविभेदास्तु सर्वे मैत्र्यविवर्जिताः ॥ १२५ ॥

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केवल उपहार अर्थात् भेटही एक उपहार संधि है, यही मुझे संमत है, और उपहारसे भिन्न अन्य सब प्रकारकी संधियां मित्रतासे रहित है ॥ १२५ ॥ अभियोक्ता बलियस्त्वादलब्ध्वा न निवर्तते । उपहाराहृते तस्मात् संधिरन्यो न विद्यते' ॥ १२६ ॥ और चढ़ाई करके युद्धके लिये आने वाला शत्रु बलवान् होनेसे थोड़ाभी धन बिना लिये नहीं लौटता है इसलिये उपहारको छोड़ दूसरे प्रकारकी संधि नहीं है' ॥ १२६ ॥ राजाह—'भवन्तो महान्तः पण्डिताश्च । तदत्रास्माकं यथा- कार्यमुपदिश्यताम् ।' मन्त्री ब्रूते—'आः ! किमेवमुच्यते ? । राजा बोला—'आप लोग तो बड़े पण्डित हैं । इसलिये हमको जो करना चाहिये सो आज्ञा कीजिये ।' मंत्री बोला—'अजी ! आप क्या कहते हैं ? । आधिव्याधिपरीतापाद्य श्वो वा विनाशिने । को हि नाम शरीराय धर्मापेतं समाचरेत् ? ॥ १२७ ॥ मनका संताप, रोग और पुत्रादिक वियोगसे उत्पन्न हुआ क्लेश इनसे आज अथवा कल याने किसीभी क्षणमें विनाश पाने वाले शरीरके लिये कौनसा मनुष्य धर्मरहित आचरण करेगा ? ॥ १२७ ॥ जलान्तश्चन्द्रचपलं जीवितं खलु देहिनाम् । तथाविधमिति ज्ञात्वा शश्वत् कल्याणमाचरेत् ॥१२८॥ देहधारियोंका जीवन निश्चय करके पानीमें दिखनेवाले चन्द्रमाका प्रतिबिंबके समान चंचल है ऐसा इसे जान कर सर्वदा कल्याणका आचरण करना चाहिये ॥ १२८ ॥ मृगतृष्णासमं वीक्ष्य संसारं क्षणभङ्गुरम् । सञ्जनैः संगतं कुर्याद्धर्माय च सुखाय च ॥ १२९ ॥ मृगतृष्णाके समान क्षणभंगुर संसारको विचार कर धर्म और सुखके लिये सज्जनोंके संग मेल करना चाहिये ॥ १२९ ॥ तन्मम संमतेन तदेव क्रियताम् । इसलिये मेरी समझसे वही करिये । यतः,— अश्वमेधसहस्राणि सत्यं च तुलया कृतम् । अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेवातिरिच्यते ॥ १३० ॥