ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished548 पृष्ठ
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( १७ )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ३-४ | परमात्माद्वारा मनुष्य-शरीरकी रचना, उसे देखकर देवताओंका प्रसन्न होना और उसके भीतर अपने-अपने स्थानोंमें प्रवेश करना ..... | ३०५ |
| ५ | देवताओंके अन्तमें शुधा और पिपासाको भी भाग-प्रदान ..... | ३०७ |
( तृतीय खण्ड )
| १-२ | परमात्माद्वारा अन्तरचनाका विचार और अन्तकी सृष्टि ..... | ३०९ |
|---|---|---|
| ३-९ | अन्तका भाग जाना तथा पुरुषका उसे वाणी, प्राण, नेत्र, कान, त्वचा, मन और उपस्थके द्वारा पकड़नेका उद्योग एवं पकड़नेमें असफल होना ..... | ३०९ |
| १० | अन्तमें अपानके द्वारा अन्तको पकड़ लेनेके कारण अपानकी महत्ताका उल्लेख ..... | ३१३ |
| ११ | परमात्माका मनुष्य-शरीरमें प्रवेश करनेका विचार ..... | ३१४ |
| १२ | परमात्माका 'विदूति' नामक मूर्द्धद्वारसे शरीरमें प्रवेश करना तथा उनके तीन स्थानों और तीन स्वप्नोंका निरूपण ..... | ३१५ |
| १३ | मनुष्यका सृष्टि-रचना देखकर आश्चर्ययुक्त होना और उसके बाद परमेश्वरके साक्षात्कारसे इसी शरीरमें उसके कृतकृत्य हो जानेका कथन ..... | ३१६ |
| १४ | परमेश्वरके 'इन्द्र' नामकी व्युत्पत्ति ..... | ३१७ |
द्वितीय अध्याय
( प्रथम खण्ड )
| १-२ | पुरुषद्वारा माताके शरीरमें गर्भप्रवेशरूप उसका प्रथम जन्म तथा माताके द्वारा गर्भके पालन-पोषणका वर्णन ..... | ३१८ |
|---|---|---|
| ३ | माताके गर्भसे बाहर बालकरूपमें प्रकट होनारूप उसका दूसरा जन्म तथा पिता-पुत्रके सम्बन्ध और कर्तव्यका संकेत ..... | ३१९ |
| ४ | पिताद्वारा पुत्रपर वैदिक और लौकिक शुभ कर्मोंका भार देकर उद्वाण होनेका और मरनेके बाद अन्य योनिमें उत्पन्न होनारूप उसके तृतीय जन्मका कथन तथा इस प्रकरणका भावार्थ—जन्म-मृत्युसे छूटनेके लिये प्रेरणा ..... | ३२१ |
| ५-६ | वामदेव ऋषिको गर्भमें ही ज्ञान होनेका उल्लेख तथा देहत्यागके पश्चात् उनको परमधाम प्राप्त होनेका निरूपण ..... | ३२२ |