भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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गग्ग ] १५५ पानी मे खड़े ही खड़े बोधिसत्त्व ने गरुड राज की प्रशंसा करते हुए यह गाथा कही— सो ब्रह्मगुत्तो चिरमेव जीव दिव्या च ते पातुभवन्तु भक्खा सो ब्रह्मवण्णं अपचायमानो धुभुक्खितो नो वितरासि भोत्तु ॥ [ तू ब्रह्म द्वारा रक्षित होकर चिर काल तक जीवित रह । तुझे दिव्य भोजन प्राप्त हो । तू ब्राह्मण वर्ण के गौरव के कारण भूखा होता हुआ भी नहीं खा रहा है । ] सो ब्रह्मगुत्तो, यह तू ब्रह्म द्वारा गोपित, ब्रह्म द्वारा रक्षित होकर दिब्बा च ते पातुभवन्तु भक्खा, देवताओ के भोजन करने योग्य भोजन तुझे मिलें । प्राण हिंसा करके नाग-मास खानेवाला न बन । इस प्रकार बोधिसत्त्व ने पानी में खड़े ही खड़े अनुमोदन कर, पानी से निकल वल्कल पहन उन दोनो को अपने आश्रम पर ले जा मैत्री-भावना की प्रशंसा कर दोनो का मेल करा दिया । उसके बाद से वह प्रसन्नता पूर्वक सुख से रहने लगे । शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय नाग और गरुड यह दो महामात्य थे । तपस्वी तो मैं ही था । १५५. गग्ग जातक “जीव यस्स सत गग्ग ” यह शास्ता ने जेतवन के समीप राजा प्रसेनजित के बनवाए राजकाराम म रहते हुए अपनी छींक के बारे में कही ।