जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५६ [ २ १.१५५ ५ क. वर्तमान कथा एक दिन शास्ता को राजकाराम म चारो प्रकार की परिषद् म बैठे धर्मोपदेश करते समय छींक आई। भिक्षुओं ने जोर मे, ऊँचे स्वर से कहा- "भन्ते ! भगवान् ! जीएँ। सुगत ! जीए।" उनके चिल्लाने से धर्मोपदेश में विघ्न पडा। भगवान् ने भिक्षुओ से पूछा- "भिक्षुओ, यदि किसी के छींकने पर 'जीएँ' कहा जायगा, तो क्या उस कहने से उसके जीने मरने पर कुछ प्रभाव पडेगा ?" "भन्ते ! नही।" "भिक्षुओ ! छींकने पर 'जीएँ' नहीं कहना चाहिए। जो कहे उसे दुष्कृत का दोष लगेगा।"¹ उन दिनो भिक्षुओ को छींक आने पर लोग कहा करते- "भन्ते ! जीएँ।" भिक्षु बुरा मानते और कुछ न बोलते। लोग खीझ उठते- "कैसे हैं यह श्रमण शाक्य-पुत्रीय जो "भन्ते ! जीए' कहने पर कुछ नहीं बोलते। भगवान् से यह बात कही गई। भगवान् ने कहा-"भिक्षुओ ! गृहस्थ लोग मगल-अमगल को मानने वाले हैं। भिक्षुओ ! गृहस्थ लोगों के 'भन्ते जीएँ' कहने पर 'चिरकाल तक जीते रहो' कहने की अनुज्ञा देता हूँ।" भिक्षुओ ने भगवान से पूछा- भन्ते ! 'जीओ', तथा 'जीते रहो' यह कहने की प्रथा कब से आरम्भ हुई ? शास्ता ने कहा-भिक्षुओ, यह 'जीओ' तथा 'जीते रहो' कहने की प्रथा पुराने समय में आरम्भ हुई। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही- ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व काशी देश में एक ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। उसका पिता व्यापार करके गुजारा करता था। उसके सोलह वर्ष के बोधिसत्त्व स मोरी आदि की चीजें उठा ग्राम निगम आदि में घूमते हुए वाराणसी पहुँचकर द्वारपाल के घर पर भात ¹ विनय पिटक में यह शिक्षापद नहीं मिला।