भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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गग्ग ] १५७ बनवाकर खाया । निवासस्थान नही था । उसने पूछा-"असमय पर आए हुए अतिथि कहाँ रहते हैं ?" मनुष्यो ने उत्तर दिया-"नगर के बाहर एक शाला है । लेकिन उसमें भूत-प्रेत आदि रहते है । यदि चाहे तो वहाँ रहें ।" बोधिसत्त्व ने कहा-"तात ! चले ! डरने की जरूरत नही । मैं उस यक्ष का दमन कर उसे आपके चरणो पर गिराऊँगा ।" वह पिता को लकर वहाँ गए । पिता तख्ते पर लेटा । वे स्वय पिता के पैरो को दबाते हुए बैठे । वहाँ रहनेवाल यक्ष ने बारह वर्ष कुबेर की सेवा करके उससे यह अधिकार प्राप्त किया था कि उस शाला मे जो आदमी आएँ उनमें से किसी को छींक आने पर यदि कोई 'जीवँ' कहे और जिसको छींक आई हो वह भी 'जीओ' कहे तो उनको छोडकर वह शेष सभी को खा सकता है। वह चौखट पर रहता था । उसने बोधिसत्व के पिता को छींक लिवाने के लिए अपने प्रताप से सूक्ष्म चूर्ण बिखेरा । चूर्ण आकर उसके नयनो में पडा । उसे तख्ते पर पडे ही पडे छींक आई। बोधिसत्व ने उसे 'जीवँ' नही कहा । यक्ष उसे खाने के लिए चोखट से उतरने लगा । बोधिसत्व ने उसे उतरते देख, सोचा इसी ने मेरे पिता को छिंकाया होगा । छींकने पर 'जो जीवँ' न कहे उन्हें यह यक्ष खा लेता होगा । उन्होंने पिता को सम्बोधन करके यह पहली गाथा कही— जीव वस्स सत गग्ग ! अपरानि च वीसति, मा मं पिसाचा खादन्तु जीव त्वं सरदोसत ॥ [ गग्ग ! तू सौ वर्ष जीवित रह । और भी बीस वर्ष । मुझे पिशाच न खाएँ । तू सौ वर्ष जीवित रह । ] गग्ग, यह पिता को उसके नाम से सम्बोधन किया है । अपरानि च वीसति, और भी बीस वर्ष जीवित रह । मा मं पिसाचा खादन्तु, मुझे पिशाच न खाए । जीव त्व सरदो सत, तू एक सो बीस वर्ष जी । सरदसत का अर्थ तो सौ वर्ष ही होता है। लेकिन पहले के बीस जोड देने से यहाँ एक सौ बीस से मतलब है ।