जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८८ [ २.२.१६२
१६२. सन्थव जातक
“न सन्थवस्मा परमत्थि पापियो. .” यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय अग्नि-हवन करने के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
इसकी कथा वैसी ही है जैसी नङ्गुट्ठ जातक¹ में है। भिक्षुओ न उन्ह अग्नि-हवन करते देख भगवान् से पूछा—"भन्ते ! जटिल-साधु नाना प्रकार के मिथ्या-तप करते हैं। इनसे कुछ उन्नति होती है ?" शास्ता ने उत्तर दिया— “भिक्षुओ, इससे कुछ लाभ नहीं। पुराने पण्डितों ने अग्नि-हवन करने से उन्नति होगी समझ चिरकाल तक अग्नि-हवन किया। लेकिन जब उससे हानि ही होनी देखी, तो उन्होंने उसे पानी डालकर बुझा दिया और शाखा आदि से पीटकर चले गए। फिर मुड़कर उस तरफ देखा तक नहीं।" इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पुराने समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। माता पिता ने उसके पैदा होने के दिन से अग्नि सभाल कर रख, उसके सोलह वर्ष का होने पर पूछा—'तात ! जन्म दिन से रखी हुई अग्नि लेकर जंगल में जा अग्नि की परिचर्या करोगे ? अथवा तीनों वेद सीखकर कुटुम्ब का पालन करते हुए घर पर रहोगे ?’
¹ नङ्गुट्ठ जातक (१४४)