जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंइन्दसमानगोत्त ] १८७ तेनेव मेत्तिं कयिराथ सद्धिं सुखावहो सप्पुरिसेन सङ्गमो ॥ [ श्रेष्ठ आदमी अर्थ-अनर्थ को जानता हुआ बुरे आदमी से दोस्ती न करे। चिरकाल तक साथ रह कर भी बुरा आदमी बुराई करता है, जैसे हाथी ने इन्द्रसमान गोत्र की बुराई की। जिसके सदाचार, प्रज्ञा तथा ज्ञान को अपने बराबर का समझे, उसीके साथ मैत्री करे। सत्पुरुष के साथ की गई मैत्री सुख को देने वाली होती है।] न मन्थय कापुरिसेन कयिरा, घृणित क्रोधी आदमी के साथ आसक्ति वा मैत्री न करे। अरियो अनरियेन पजानमत्थ; आर्य चार प्रकार के होते हे (१) आचार आर्य, (२) लिङ्ग-आर्य, (३) दर्शन आर्य, (४) प्रतिवेध- आर्य। इनमें यहाँ आचार्यार्य आर्य से मतलब है। जो अर्थ को जानता है अर्थ को पहचानता है, आचार में स्थित है—ऐसा आर्य-पुद्गल, अनार्य, निर्लज्ज, दुश्शील के साथ मैत्री न कर। क्या ? चिरानुवुत्थोपि करोति पापं, क्योंकि अनार्य चिरकाल तक एक साथ रहकर भी, उस एक साथ रहने का ख्याल न कर पाप, पाप-कर्म, बुरा-कर्म करता है। जैसे क्या ? गजो यथा इन्दसमामगोत्त जैसे उस हाथी ने इन्द्रसमानगोत्र को मार कर पाप किया। यं त्वेव जञ्जा सदिसो मम, इत्यादि में जिस आदमी को जाने कि यह आदमी शील आदि में मेरे समान है, उसीके साथ मैत्री करे। सत्पुरुष के साथ मेल जोल सुखदायी होता है। इस प्रकार बोधिसत्त्व ने उपदेश दिया कि बात न मानने वाला नही होना चाहिए, कहना मानने वाला होना चाहिए। यूँ ऋषिगण को उपदेश दे इन्द्र समान गोत्र का शरीर-कृत्य करवा ब्रह्म विहारों की भावना करते हुए वह ब्रह्म लोकगामी हुए। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय इन्दसमानगोत्त यह बात न मानने वाला भिक्षु था। ऋषि- गण का शास्ता मे ही था।