जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८६ [ २.२.१६१ 'सचमुच आचार्य ! एक हाथी-बच्चा है, जिसकी माँ मर गई है, उसे ' पोस रहा हूँ।' 'हाथी बड़े होने पर पालन-पोषण करने वाले को ही मारते हैं, तू उसे मत पोस।' 'आचार्य ! उसके बिना नहीं रह सकता।' 'अच्छा ! तो पता लगेगा।' उससे पोसा जाकर वह हाथी-बच्चा आगे चलकर बड़े भारी शरीर वाला हो गया। एक समय वे ऋषिगण जंगल से फल-मूल लाने के लिए दूर चले गए और कुछ दिन वहीं रहे। हाथी को श्रेष्ठ दक्षिण हवा लगी तो उसका मद फूट पड़ा। उसने उस तपस्वी की पर्णकुटी नष्ट कर डाली। पानी का घड़ा फोड़ दिया। पत्थर का तख्ता फेंक दिया। आलम्बन-तख्ता' नोच डाला। फिर उस तापस्वी को मार डालकर ही जाने के विचार से एक घनी जगह में छिपकर उसके आने के रास्ते की ओर देखता हुआ खड़ा रहा। इन्दसगोत्त अपना फल-मूल ले, सबके आगे आगे आ रहा था। उसे देख वह साधारण स्वभाव से ही उसके पास गया। हाथी ने घनी जगह से निकल, उसे सूण्ड से पकड़, जमीन पर गिरा, सिर पैर से दबा मार डाला। फिर उसे मसलता हुआ क्रौञ्चनाद करके जंगल में चला गया। शेष तपस्वियो ने बोधिसत्व से यह समाचार कहा। बोधिसत्त्व ने यह कहते हुए कि बुरे आदमी से दोस्ती नहीं करनी चाहिए, यह गाथा कही— न सन्थवं पापपुरिसेन कयिरा अरियो अनरियेन पजानमत्थं चिरानुवुत्थो पि करोति पापं गजो यथा इन्दसमानगोत्तं ॥ यं ह्येव जञ्जा सदिसो मर्म सीलेन पञ्ञाय सुतेन चापि
' जिसके सहारे से बैठ सकें।