जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसुसीम ] १६१ क. वर्तमान कथा . श्रावस्ती में कभी एक ही परिवार भिक्षुसघ को जिसमें बुद्ध मुख्य रहते थे दान देता था, कभी बहुत से लोग एक साथ इकट्ठे हो दल बना कर दान देते थे, कभी एक एक गली के लोग मिलकर देते थे और कभी सारे नगर के लोग सबसे इकट्ठा करने के दान देते थे। इस समय सारे नगर निवासियो से दान इकट्ठा किया गया। सारा सामान तैयार हो गया। दाताओ में दो पक्ष थे। कुछ ने कहा यह सामान अन्य-तीथिको को दे। कुछ ने कहा सघ को, जिसके प्रमुख बुद्ध हैं। इस प्रकार बार बार बात होने पर भी दोनों पक्षो का अपना अपना आग्रह रहा—अन्य- तीथिको के शिष्य उन्हें दान दिए जाने के पक्षपाती रहे और बुद्ध के शिष्य बुद्ध- प्रमुख भिक्षुसघ को। तब यह हुआ कि बहुमत देखा जाए। बहुमत लिए जाने पर अधिक लोग यही कहने वाले हुए कि बुद्ध-प्रमुख भिक्षु-सघ को ही दिया जाए। उन्हीं की बात स्थिर रही। अन्य-तीथिको के शिष्य बुद्ध को दिए जाने वाले दान में बाधा नहीं डाल सके। नगर के लोगो ने बुद्ध की प्रमुखता में भिक्षुसघ को निमन्त्रित कर महा- दान दिया और सातवें दिन सब वस्तुओ का दान किया। शास्ता अनुमोदन कर जनता को मार्ग तथा फल का बोध करा जेतवन विहार में चले गए। वहाँ भिक्षुसघ द्वारा आदर प्रदर्शित किए जाने पर गन्ध- कुटी के सामने खडे हो उपदेश दे गन्धकुटी में प्रवेश किया। शाम को धर्मसभा में एकत्रित हुए भिक्षुओ ने बातचीत चलाई— आयुष् मानो! दूसरे तीर्थिक श्रावको ने बुद्ध को मिलने वाले दान में विघ्न डालने की कोशिश की, किन्तु वे सफल नही हुए। सभी वस्तुओ का दान बुद्धो के ही चरणो पर आ पहुँचा। ओह ! बुद्धो की महानता !
- शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा—'भिक्षुओ, यह दूसरे मतो के अनुयाई न केवल अभी मुझे मिलने वाले दान में विघ्न डालने का प्रयत्न करते हैं, पहले भी किया है। लेकिन दान की वह वस्तुएं हमेशा मेरे ही चरणों में आ जाती रही हैं'—इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—