जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसीलानिसंस ] २७३ आवाज करके ही अपने को विपत्ति में डाला। इसमें सिंह की खाल का दोष नहीं। उसके ऐसा कहते ही गधा वहीं गिर कर मर गया। बनिया भी उसे छोड़कर चला गया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय गधा कोकालिक था। पण्डित काश्यप तो मैं ही था। १६०. सीलानिसंस जातक "पस्स सद्धाय सीलस्स...." यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक श्रद्धावान् उपासक के बारे में कही। क. वर्तमान कथा वह श्रद्धावान् प्रसन्नचित्त आर्य-श्रावक था। एक दिन जेतवन जाते समय उसने शाम को अचिरवती नदी के किनारे पर जाकर देखा कि नाविक नौकाओं को किनारे पर छोड़ धर्म सुनने के लिए चले गए। वह घाट पर नौका न देख, बुद्ध की याद से मन को प्रसन्न कर नदी में उतर पड़ा। पाँव पानी में नहीं भीगे। पृथ्वीतल पर चलते हुए की तरह बीच में पहुँचने पर उसने लहर को देखा। उसकी बुद्ध-भक्ति मन्द पड़ गई थी; इससे उसके पैर डूबने लगे। उसने बुद्ध-भक्ति को दृढ़ कर पानी पर ही चल, जेतवन में प्रवेश कर शास्ता को प्रणाम किया। वह एक ओर बैठा। शास्ता ने उसके साथ बात- चीत करते हुए पूछा—"उपासक ! क्या रास्ते में आते हुए अधिक कष्ट तो १८