जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७४ नहीं हुआ ?" "भन्ते ! बुद्ध की याद से मन को प्रीति-युक्त कर, पानी के प्रतिष्ठित हो मैं पृथ्वी को मर्दन करते हुए की तरह आया हूँ।" "उ: न केवल तूने ही बुद्ध के गुणों का स्मरण कर रक्षा प्राप्त की है। प समुद्र में नौका के टूटने पर उपासकों ने बुद्ध के गुणों की याद कर रक्ष की।" इतना कह, उसके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही- ख. अतीत कथा पूर्वं काल में काश्यप सम्यक् सम्बुद्ध के समय में एक स्रोतापन्न श्रावक, एक नाई गृहस्थ के साथ नौका पर चढ़ा। उस नाई की भार्य्या नाई को उपासक को सौंपा-आर्य ! इसके सुख दुःख का भार आप र सातवें दिन वह नौका समुद्र के बीच में टूट गई। वे दोनो जने एक से चिमटे, एक द्वीप पर पहुँचे। यह नाई पक्षियों को मार कर, पका कर के समय उपासक को भी देता। यह उपासक 'मुझे नहीं चाहिए" क न खाता। वह सोचता त्रिरत्न की शरण को छोड़ कर हमारे लिए यह दूसरा सहारा नहीं। उसने त्रिरत्न के गुणों का स्मरण किया। उसके स्मरण करते करते उस द्वीप के नागराज ने अपने शरीर की नौका बनाई। समुद्र-देवता नौका चलाने वाला बना। नौका सात र भरी गई। तीन मस्तूल थे। इन्द्रनीलमणि की जोतें। सोने के चप्पू। देवता ने नौका में खड़े होकर घोषणा की—क्या कोई जम्बूद्वीप जाने है ? उपासक बोला-हम जाएँगे ? तो आ नौका पर चढ़। उसने पर चढ़ नाई को आवाज दी। समुद्रदेवता ने कहा-तुझे ही जाना मिल इसे नहीं। क्या कारण है ? कारण यही है कि यह शीलवान् नहीं है नौका तेरे लिए लाया हूँ। इसके लिए नहीं। "रहो ! मैं अपने दिए दान का, रक्षा किए गए शील का, तथा भावन गई भावना का इसे हिस्सेदार बनाता हूँ।" "स्वामी ! मैं अनुमोदन करता हूँ।" "अब ले चलूँगा" कह देवता ने उसे भी चढ़ा, दोनों जनों को समुद्र निकाल, नदी से वाराणसी पहुँचा अपने प्रभाव से उन दोनों के घर पर धन प