जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
पृष्ठ 290, कुल 479 में से
संदर्भ में पढ़ें¸ सीलानिसंस ] २७५ दिया। फिर, 'पण्डित की ही संगति करनी चाहिए। यदि इस नाई की इस उपासक के साथ संगति नहीं होती, तो यह समुद्र के बीच म ही नष्ट हो जाता, कहते हुए देवता न पण्डित की संगति की महिमा बखानते हुए यह दो गाथाएँ कहीं— पस्स सद्धाय सीलस्स चागस्स च अय फल नागो नावाव वण्णेन सद्ध वहति उपासक ॥ सद्धिरेव समासेय सन्भि कुब्बेथ सय्यव सत हि सन्निवासेन सोत्थि गच्छति नहापितो ॥ [ श्रद्धा, शील और त्याग के इस फल को देखो । नाग नौका की शक्ल बना कर श्रद्धावान् उपासक का वहन करता है। सत्पुरुष के साथ रहे, सत्पुरुष के ही साथ दोस्ती कर । सत्पुरुष के साथ रहन से नाई कल्याण को प्राप्त होता है । ] पस्स किसी विशष को सम्बोधा न कर केवल देखने को कहता है। सद्धाय लौकिक तथा लोकोत्तर श्रद्धा स । शील में भी इसी प्रकार । चगस्स दान का त्याग तथा चित्तमैल का त्याग। अय फल यह फल। गुण या परि- णाम अर्थ है। अथवा त्याग के फल को देखो। यह नाग नौका की शक्ल में, यह अर्थ भी समझना चाहिए। नावाव वण्णेन नौका के आकार से। सद्ध तीन रत्नो में प्रतिष्ठित श्रद्धा । सन्भिरेव पण्डितो के ही साथ। समासेय एक साथ रह निवास कर यही अर्थ है। कुब्बेथ, कर। सन्थव मित्रता, तृष्णा-पूर्ण दोस्ती तो किसी से न करनी चाहिए। नहापितो—नाई गृहस्थ। न्हापितो यह भी पाठ है। इस प्रकार समुद्र देवता आकाश में ठहर, धर्मोपदेश दे तथा नसीहत कर, नागराजा को साथ ल अपने विमान को ही चला गया। शास्ता न यह धर्मदेशना ला, आर्य-सत्यो को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। आर्य-सत्यो का प्रकाशन समाप्त होने पर उपासक सकृदा- गामीफल म प्रतिष्ठित हुआ । तब स्त्रोतापन्न उपासक परिनिर्वाण को प्राप्त हुआ। नागराजा सारिपुत्त ! समुद्रदेवता तो मैं ही था।