जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा परिच्छेद ८. कासाव वर्ग २२१. कासाव जातक “अणिक्कसावो कासावं...” यह धर्मदेशना शास्ता ने जेतवन में रहते समय देवदत्त के बारे में कही। घटना राजगृह में घटी। क. वर्तमान कथा एक समय धर्मसेनापति (सारिपुत्र) पांच सौ भिक्षुओं के साथ वेळुवन में रहते थे। देवदत्त भी अपने जैसी दुराचारी परिषद से घिरा हुआ गयाशीर्ष पर रहता था । उस समय राजगृह निवासी चन्दा इकट्ठा करके दान की तैयारी करते थे। व्यापार के लिए आए एक बनिए ने एक मूल्यवान् सुगन्धित काषाय वस्त्र दे कर कहा कि इस वस्त्र का दान कर मुझ भी (दान मे) हिस्सेदार बनावें। नागरिको ने महादान दिया। सब चन्दा करके इकट्ठे किए गए कार्षापणो से ही पूरा हो गया। वह वस्त्र बच गया। लोग इकट्ठे होकर सोचने लगे कि यह वस्त्र किसे दे ? क्या सारिपुत्र स्थविर को ? अथवा देवदत्त को ? कुछ ने कहा सारिपुत्र स्थविर को। दूसरो ने कहा—सारिपुत्र स्थविर कुछ दिन रह कर यथारुचि चल देगा। देवदत्त स्थविर सदैव हमारे नगर ही के पास रहता है। मङ्गल-अमङ्गल में यही हमारा सहायक होता है। देवदत्त को दे। राय लेने पर 'देवदत्त को दे' कहने वालो की संख्या अधिक निकली। उन्होने देवदत्त को दे दिया। देवदत्त ने उसकी डसे कटवा, ओवट्टक वस्त्र सिलवा, रँगवा कर सुनहरी रेशम सदृश बना पहना। उस समय तीस भिक्षुओ ने राजगृह से श्रावस्ती पहुँच, शास्ता को प्रणाम