भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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३८४ [ २.८ २२३ मुझे तुम्हारा राजा क्या देगा। उसने रास्ते में भात की पोटली पा, उसमें से कुछ भी न दे स्वयं खाया।" बोधिसत्त्व ने पूछा— “महाराज, क्या ऐसी बात है ?” राजा ने स्वीकार किया। बोधिसत्त्व ने राजा 'स्वीकार करता है' जान देवी को कहा— “देवी ! राजा को अप्रिय होने पर तुम्हे यहाँ रहने से क्या लाभ ? संसार में अप्रिय का साथ दुखदायी होता है। तुम्हारे यहाँ रहने से राजा को अप्रिय के साथ रहने का दुख होगा। 'प्राणी मिलने वाले के साथ मिलते हैं, न मिलने वाले के साथ नहीं मिलते' जान दूसरी जगह चला जाना चाहिए। दुनिया बहुत बड़ी है।” इतना कह यह गाथाएँ कही— नमे नमन्तस्स भजे भजन्त किच्चानुकुब्बस्स करेय्य किच्च, नानत्थकामस्स करेय्य अत्थ असम्भजन्तम्पि न सम्भजेय्य ॥१॥ चजे चजन्तं घणयं न कयिरा अपेताचित्तेन न सम्भजेय्य, द्विजो दुमं खीरणफलं ति अत्वा अञ्ञं समवेक्खेय्य महा हि लोको ॥२॥ [ झुकने वाले के सामने झुके। संगति करना चाहने वाले के साथ संगति करे। जो अपने काम आता हो उसका काम करे। अनर्थ चाहने वाले का अर्थ न करे। जो संगति करना न चाहता हो, उससे संगति न करे ॥१॥ छोड़ने वाले को छोड़ दे। ऐसे से स्नेह न करे। जिसका दिल विमुख हो गया हो, उससे संगति न करे। जिस तरह पक्षी वृक्ष को फलरहित जानकर दूसरे (वृक्ष) को ढूँढते हैं, उसी तरह दूसरे को ढूँढे। संसार बड़ा है ॥२॥ ]