भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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सिगाल ] २३ धन के लोभी होते हैं। मैं ऐसा उपाय करूँ कि यह ब्राह्मण मुझे अपनी चादर में छिपा, गोद में ले जाकर नगर से बाहर कर दे।" उसने मनुष्य-भाषा में कहा—"ब्राह्मण।" ब्राह्मण ने लौटकर पूछा—"मुझे कौन बुला रहा है ?" "ब्राह्मण ! मैं।" "किस कारण ?" "ब्राह्मण, मेरे पास दो सौ कार्षापण हैं। यदि मुझे गोद में ले चादर से ढक जिससे कोई न देखे, इस प्रकार नगर से निकाल सके, तो मैं तुझे यह कार्षा- पण दे दूंगा।" धन के लोभ से ब्राह्मण 'अच्छा' कह स्वीकार कर, उस गीदड़ को वैसे ले नगर से निकल थोड़ा आगे गया। गीदड़ ने पूछा—'ब्राह्मण यह कौन सी जगह है ?" "अमुक जगह।" "और भी थोड़ा आगे तक ले चल।" इस प्रकार बार बार कहकर उसे महाश्मशान तक ले जा, वहाँ पहुँचकर कहा—"मुझे यहाँ उतार दे।" ब्राह्मण ने उसे उतार दिया। "अच्छा तो ब्राह्मण चादर फैला।" ब्राह्मण ने धन-लोभ से चादर फैला दी। 'तो इस वृक्ष की जड़ में खोद' कह गीदड़ ब्राह्मण को जमीन खोदने में लगा, उसकी चादर पर चढ़ उसके चारों कोनों तथा बीच में—पाँच जगहों पर . पाखाना कर, उसे लबेड़ श्मशान-वन में दाखिल हो गया। बोधिसत्त्व ने वृक्ष की शाखा पर खड़े हो यह गाथा कही— सद्दहासि सिगालस्स सुरापीतस्स ब्राह्मण, सिप्पिकानं सतं नत्थि कुतो फसता दुवे॥ [ ब्राह्मण ! तू शराब पिए हुए गीदड़ का विश्वास करता है। उसके पास सौ सीपियाँ भी नहीं, दो सौ कार्षापण तो कहाँ होंगे।] सद्दहासि या सद्दहेसि। इसका मतलब है कि विश्वास करता है।