जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४६२ [ २.१०.२५० तपस्वी कुमार ने उसे देखे 'तात ! एक तपस्वी शीत से पीड़ित है। काँप रहा है। उसे यहाँ बुला। सेक लेगा' कहा। उसने पिता से प्रार्थना करते हुए यह गाथा कही— अयं इसी उपसमसंयमे रतो संतिट्ठति सिसिरभयेन अट्टितो, हन्द अयं पविसतुमं अगारकं विनेतु सीतं दरथञ्च केवलं । [ यह ऋषि उपशमन में तथा संयम में लगा है। शीतभय से पीड़ित है। यह इस घर में प्रवेश करे और अपने शीत तथा पीड़ा को दूर करे ।] उपसमसंयमे रतो रागादि क्लेश के उपशमन में तथा शीलसंयम मे लगा है। संतिट्ठति, वह ठहरता है। सिसिरभयेन वायु और वर्षा से उत्पन्न शीतभय से। अट्टितो पीड़ित। पविसतुमं, यहाँ प्रवेश करे। केवलं सब। बोधिसत्व ने पुत्र की बात सुन उठकर देखते हुए बन्दर का भाव समझ दूसरी गाथा कही— नायं इसी उपसमसंयमे रतो कपी अयं दुमवरसाखगोचरो, सो दूसको रोसकोचापि जम्मो सचे वजे इमम्पिं दूसये घरं ॥ [ यह उपशमन तथा सयम मे लगा हुआ ऋषि नही । यह वृक्षो की शाखा पर घूमने वाला बन्दर है। यह दूषित करने वाला है। यह क्रोध करने वाला है। यह नीच है। यदि घर मे आए तो इस घर को भी दूषित करे ।] दुमवरसाखगोचरो वृक्षो की शाखां पर घूमने वाला। सो दूसको रोसको चापि जम्मो जहाँ जहाँ जाए उस उस जगह को दूषित करने वाला होने से दूसक। झगड़ने वाला होने से रोसको, नीच होने से जम्मो। सचे वजे यदि इस पर्ण-