भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

पृष्ठ 476, कुल 479 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 476

कपि ] ४६१ २५०. कपि जातक "अयं इसी उपसम सङ्कमे रतो " यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय एक ढोगी भिक्षु के बारे मे कही। क वर्तमान कथा उसका ढोग भिक्षुओ म प्रकट हो गया। भिक्षुओ ने धर्मसभा में बातचीत चलाई—आयुष्मानो ! अमुक भिक्षु कल्याणकारी बुद्धशासन म प्रव्रजित हो ढोग करता है। शास्ता ने आकर पूछा- भिक्षुओ, बैठ क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा- भिक्षुओ, यह भिक्षु केवल अभी ढोंगी नही है, यह पहले भी ढोगी रहा है। इसने जब यह वन्दर या केवल आग के लिए ढोग किया। इतना कह पूर्व-जन्म की क्या कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व काशीदेश में ब्राह्मण कुल में पैदा हुआ। बडे होने पर पुत्र के भागने दौड़ने में समर्थ होने पर, ब्राह्मणी के मर जाने पर पुत्र को गोद मे ल हिमालय चला गया। वहाँ ऋषियो के प्रव्रज्या-क्रम से प्रव्रजित हो उस पुत्र को भी तपस्वीकुमार बना पर्णशाला में रहने लगा। वर्षा ऋतु मे मूसलधार वर्षा होने के समय एक बन्दर पीडित, दाँत फटफटाता हुआ, काँपता हुआ भटकता था। बोधिसत्त्व बडे बडे लकड लाकर आग बना मन्च पर लेटा था। उसका पुत्र भी पाँव दबाता हुआ बैठा था। वह बन्दर एक मृत तपस्वी के वल्कल वस्त्र ओढ पहन, एक कन्धे पर अजिनचर्म रख, बैहगी तथा कमण्डल ले ऋषिवेष बना पर्णशाला के द्वार पर जा आग के लिए ढोग करके खडा हुआ।

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · पृष्ठ 476, कुल 479 में से · BharatKosha