जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४६० [ २.१०.२४६ एकपुत्तको भविस्ससि त्वञ्च नो हेस्ससि इस्सरो कुले, ओरोह दुमस्मा सालक एहि दानि घरफ यजेमसे ॥ अर्थ—तू मेरा एकपुत्रक होकर रहेगा। मेरे कुल में (भोगों का) स्वामी होकर रहेगा। इस वृक्ष से उतर। आ, अपने घर चलें। सालक ! यह नाम लेकर सम्बोधन किया है। उसे सुनकर बन्दर ने दूसरी गाथा कही— ननु मं हृदयतिमञ्ञसि यञ्च मं हनसि वेलुमट्ठिया, पक्कम्बवने रमामसे गच्छ त्वं घरकं यथासुखं ॥ [ निश्चय से तू मुझे हृदय से बहुत चाहता है। तभी तो मुझे बांस की छड़ी से मारता है। अब हम पके आम्रवन में रहेंगे। तू सुखपूर्वक घर जा । ] ननु मं हृदयेंति मञ्जसि निश्चय से तू मुझे हृदय में बहुत मानता है। मतलब है कि तू समझता है कि यह सुहृदय है। यञ्च मं हनसि वेलुलट्ठिया इतना अधिक मानता है कि बांस की छड़ी से मारता है। इससे प्रकट करता हूँ कि इस कारण से मैं नहीं आता हूँ। इसलिए हम इस पक्कम्बवने रमामसे गच्छ त्वं घरकं यथासुखं यह कह कूद कर बन म चला गया। सपेरा भी असन्तुष्ट हो अपन घर गया । शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय बन्दर शामणेर था । सपेरा महास्थविर । धान्य का व्यापारी तो में ही था ।