जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४० [ १.१२ १२० उस राजा ने अपनी पटरानी को वर दिया था कि जो इच्छा हो मांग ले । उसने कहा, मुझे और वर दुर्लभ नहीं हैं, मैं यही चाहती हूँ कि अब इसके बाद आप किसी दूसरी स्त्री को कामुक-दृष्टि से न देखें । राजा ने अस्वीकार कर, लेकिन फिर फिर जोर देने से उसके वचन को अस्वीकृत न कर सकने के कारण स्वीकार कर लिया । उसके बाद राजा ने सोलह हजार नर्तकियों में से किसी एक स्त्री की ओर भी कामुक-दृष्टि से नहीं देखा । उस समय राजा के इलाके में बगावत फैली । इलाके के योद्धाओं ने विद्रोहियो (चोरो) के साथ दो तीन लडाइयाँ लड (राजा के पास) पत्र भेजा कि इसके आगे हम न लड सकेंगे । राजा ने वहाँ जाने की इच्छा से सेना एकत्र कर देवी को बुलवाकर कहा—"भद्रे ! में इलाके में जाता हूँ । वहाँ नाना प्रकार के युद्ध होते हैं। जय-पराजय भी अनिश्चित रहती है। वैसी जगहों में स्त्रियो को साथ ले चल सकना कठिन है। तू यही रह।" उसने कहा "देव ! में यहाँ नही रह सकती ।" राजा के बार बार मना करने पर बोली "अच्छा ! तो एक एक योजन पर पहुँचकर मेरा कुशल-समाचार जानने के लिए एक एक आदमी भेजना होगा।" राजा ने "अच्छा" कह स्वीकार किया । बोधिसत्व को नगर म छोड़, बडी भारी सेना के साथ नगर से निकल राजा जाते हुए एक एक योजन पर एक एक आदमी को भेजता कि जाओ हमारा कुशल समाचार कह रानी के दुख-सुख की खबर लाओ। वह हर आनेवाले आदमी से पूछती 'राजा ने तुम्हे किस लिए भेजा है ?' 'तुम्हारा कुशल- समाचार जानने के लिए' कहने पर 'तो आओ' कह उससे सहवास करती । राजा ने बत्तीस योजन मार्ग जाते हुए बत्तीस जनो को भेजा । उसने उन सभी के साथ वैसे ही किया । राजा न इलाके को दबा, लोगो को निश्चिन्त कर लौटते समय भी उसी तरह बत्तीस आदमी भेज । उसन उन बत्तीसो के साथ भी वैसे ही दुष्कर्म किया । राजा ने (राजधानी म) पहुँच विजय-पडाव१ पर रुक बोधिसत्व को १ इलाके को जीतकर आने पर नगर से बाहर जो पडाव डाला जाता था, उसे 'जय खन्धावार' कहते थे ।