भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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सूचना भेजी 'नगर को (स्वागत के लिए) तैयार करे।' बोधिसत्त्व सारे नगर के साथ राज-महल को भी तैयार कराते हुए रानी के निवास-स्थान पर गया। उसने बोधिसत्त्व का सुन्दर शरीर देख सयम न कर सकने के कारण कहा— "ब्राह्मण ! शय्या पर आ।" बोधिसत्त्व ने उत्तर दिया—"ऐसा मत कह। मेरे मन में राजा का गौरव भी है और मै पाप-कर्म से डरता भी हूँ। मै ऐसा नही कर सकता।" "उन चौसठ सदेश-वाहको को तो न राजा का गौरव था, न वह पाप से डरते थे, तुझे ही राजा का गौरव है और तू ही (एक) पाप से डरनेवाला है ?" "हाँ, यदि उनको भी ऐसा होता, तो वह भी ऐसा न करते। मै तो जान बूझकर ऐसा दुस्साहस नही करूँगा।" "बहुत क्यो बकवाद करता है, यदि मेरा कहना नही करेगा तो तेरा सिर कटवा दूँगी।" "एक जन्म के सिर की बात क्या, यदि हजार जन्मो में हर बार भी सिर कटे तो भी मै ऐसा नही कर सकता।" "अच्छा देखूँगी" कह बोधिसत्त्व को डरा रानी अपने कमरे मे गई। वहाँ अपने शरीर पर नाखून की खसोट के निशान बना, बदन पर तेल मल, मैले कुचैले कपडे पहन बीमारी का बाहना बना कर लेट रही और दासियो को आज्ञा दी कि जब राजा पूछे 'देवी कहाँ है ?' तो उत्तर देना 'बीमार है।' बोधिसत्त्व राजा की अगवानी के लिए गए। राजा ने नगर की प्रदक्षिणा कर प्रासाद पर चढ रानी को न देख पूछा—"देवी कहाँ है ?" "देव ! बीमार है।" राजा ने रानी के कमरे में प्रवेश कर उसकी पीठ मलते हुए पूछा "भद्रे ! तुझे क्या कष्ट है ?" रानी चुप रही। तीसरी बार (पूछने पर) राजा की ओर देखते हुए बोली—"राजन् ! तुम भी जीते हो ? मेरे जैसी स्त्री को भी स्वामी-वाली कहा जा सकता है ?" "भद्रे ! बात क्या है ?" "तुमने जिस पुरोहित को नगर की रक्षा का भार सौंपा, वह राजमहल में तैयारी के काम से यहाँ आया और अपना कहना न करने वाली मुझे मारकर अपने मन की करके गया।"