जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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जिस प्रकार आग म नमक तथा शक्कर डालने पर चट चट शब्द होता है, उसी प्रकार राजा क्रोध से चटचटाता हुआ रानी के कमरे से निकला और द्वारपालो तथा परिचारको को बुलवाकर आज्ञा दी—"अरे ! जामो, पुरो- हित की बाहे पिछली तरफ बाँधकर, उसे वध करने योग्य मनुष्य की तरह नगर से बाहर वध करने के स्थान पर ले जा कर उसका सिर काट दो।" उन्होंने जल्दी से जाकर उसकी बाँहें पिछली तरफ करके बाँध, वध-भेरी बजवा दी। बोधिसत्त्व ने सोचा "उस दुष्ट देवी ने राजा को पहले से ही फोड लिया। अब मै आज अपने बल से ही अपने को मुक्त करूँगा।" उसने उन लोगो से कहा— "भो ! तुम मुझे मारते हो, तो एक बार राजा के पास ले चलकर मारना।" "किस लिए?" "मै राज कर्मचारी हूँ। मैने बहुत कार्य्य किए हैं। मैं अनेर गडे हुए खजानो को जानता हूँ। मै ही राज्य-सम्पत्ति की देखरेख करता रहा हूँ। यदि मुझे राजा को न दिखाओगे, तो बहुत धन का नाश हो जाएगा। मुझे राजा को उसके धन की सूचना दे लेने पर, फिर जो करना हो करो।" वे उसे राजा के पास ले गए। राजा ने उसे देखते ही कहा—"अरे ब्राह्मण ! तूने मेरी भी शरम नही रक्खी ? तूने क्यो ऐसा पापकर्म किया?" "महाराज ! मैं श्रोत्रिय कुल में पैदा हुआ हूँ। मैने कभी च्यूंटी तक की भी जान नही ली। मैने कभी तिनके की भी चोरी नही की। मैने कभी कामुक दृष्टि से किसी की स्त्री की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखा। मैंने कभी हँसी में भी झूठ नही बोला। मैने कभी कुशाग्र से भी मद्य नही पिया। मैने तुम्हारा कुछ अपराध नही किया। उस मूर्खा ने मुझे हाथ से पकड़ा। मेरे इनकार करने पर वह अपना दिया घाव प्रकट कर, मुझे यह कमरे में घसी गई। मैं निरपराधी हूँ। हाँ, पत्र लेकर आनेवाले चौसठ आदमी अपराधी हैं। देव ! उन्हें बुलवा कर पूछें कि उन्होंने उसका कहना किया अथवा नहीं किया?" राजा ने उन चौसठ जनो को बँधवाकर देवी को बुलवाकर पूछा— "तूने इनके साथ पाप किया या नहीं किया?"