जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६८ [ १.१३ १२८ सेठ बोला—उसने अनुचित किया। और आज्ञा दे उसे वाराणसी मँगवा दास बनाकर रक्खा। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय का कटण्डुक यह भिक्षु था। वाराणसी सेठ तो मैं ही था। १२८. बिळारवत जातक “यो चे धम्मं धजं कत्वा ..” यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक ढोंगी भिक्षु के बारे म कही। क. वर्तमान कथा उस समय शास्ता ने उसके ढोंग की चर्चा चलने पर 'भिक्षुओ, केवल अब ही नहीं, पहल भी यह ढोगी ही रहा है' कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करन के समय बोधिसत्त्व ने चूहे का जन्म ग्रहण किया। बड़े होने पर वह बढ़कर सूअर के बच्चे की तरह हो अनेक सौ चूहों के साथ जंगल म रहने लगा। इधर उधर घूमते हुए एक शृगाल ने उस चूहों के समूह को देखकर सोचा कि इन चूहों को ठगकर खाऊँगा। यह सोच वह चूहों के बिल से थोड़ी ही दूर पर सूर्याभिमुख हो, मुंह खोल हवा पीते हुए की तरह एक ही पाँव से खड़ा हुआ। इधर उधर भोजन के लिए ढूंढ़ते हुए बोधिसत्त्व ने उसे देख सोचा यह सदाचारी होगा और उसके पास आकर पूछा—