जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबिळारवत ] ६६ "आपका, भन्ते ! क्या नाम है ?" "मेरा नाम है धार्मिक ।" "चारो पैर पृथ्वी पर न रख, एक ही पैर से क्या खड़े हैं ?" "मेरे चारो पैर पृथ्वी पर रखने से पृथ्वी के लिए दूभर होगा, इस लिए एक ही पैर से खडा होता हूँ।" "मुँह खोले क्यो खड़े हैं ?" "हम हवा के अतिरिक्त और कुछ नही खाते ?" "सूर्य की ओर मुंह करके क्यो खडे है ?" 'सूर्य को नमस्कार कर रहा हूँ।" बोधिसत्त्व ने सोचा, यह सदाचारी है । उसके बाद से चूहों के समूह के साथ प्रात साय उसकी सेवा में जाने लगे । उसकी सेवा कर लौटने के समय शृगाल सबसे पिछले चूहे को पकड़कर मास खा, निगल कर, मुंह पोछ खडा हो जाता । क्रम से चूहों का दल कम पड गया । चूहे सोचने लगे कि पहले हम यह बिल पर्याप्त नही होता था, सट सट कर खड़े होते थे, अब खुलकर खड़े होते हैं तब भी बिल नही भरता । क्या मामला है ? उन्होने बोधिसत्त्व से सारा हाल कहा । बोधिसत्त्व ने 'चूहे किस कारण कम हो गए' सोचते हुए शृगाल पर शक किया । फिर जांच करने के लिए (शृगाल की) सेवा (से लौटने) के समय बाकी चूहों को आगे कर स्वय पीछे रहा । शृगाल उस पर उछला । अपने को पकडने के लिए शृगाल को उछलता देख बोधिसत्त्व ने रुककर कहा— भो शृगाल ! तेरा यह व्रत धार्मिक नहीं है । तू दूसरो की हिंसा करने के लिए ही धर्म को आगे करके रहता है । इतना कह यह गाथा कही— यो वे धम्मं धजं कत्वा निगूळ्हो पापमाचरे, विस्सासयित्वा भूतानि बिळार नाम तं वतं ॥ [जो धर्म की ध्वजा बनाकर, प्राणियो में विश्वास उत्पादन कर छिप कर पाप करता है, उसका व्रत बिलाल-व्रत है ।] यो वे, क्षत्रिय आदियों में कोई भी । धम्मं धजं कत्वा, दस कुशल धर्मों की ध्वजा बनाकर, उन्ह करता हुआ उठाकर दिखाता हुआ, विस्सासयित्वा, यह