भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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७० [ १.१३ १२६ सदाचारी है, ऐसा विश्वास पैदा करके विडार नाम त व्रत, इस प्रकार धर्म की ध्वजा बनाकर छिपकर पाप करनेवाले का व्रत ढोंग कहलाता है। चूहों के राजा ने इस प्रकार कहते ही कहते उछलकर उसकी गरदन पर चढ, ठोडी के नीचे की अन्दर की गले की नाली को डसकर गले की नली को फाड मार डाला। चूहों के दल ने रुक कर शृगाल को मुर मुर करके खा डाला। पहले आए हुओ को ही शृगाल का मांस मिला, पीछे आए हुओ को नही मिला। उसके बाद से चूहों का दल निर्भय हो गया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय का शृगाल यह ढोगी भिक्षु था। चूहों का राजा तो मै ही था। १२६. अग्गिक जातक “नाय सिखा पुञ्जहेतु .” यह (गाथा) भी शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक ढोगी भिक्षु के ही बारे में कही— ख. अतीत कथा पुराने समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व चूहों के राजा हो जगल में रहते थे। एक शृगाल जगल में आग लगने पर जब भागने में असमर्थ रहा, तो एक वृक्ष से सिर टिकाकर खडा हो गया। उसके सारे शरीर के बाल जल गए। वृक्ष से लगे हुए सिर पर शिखा की तरह से कुछ बाल बच गए। उसने एक दिन एक पर्वतीय तालाब में पानी पीते हुए अपनी छाया के साथ शिखा को देखकर सोचा अब मुझे पूंजी मिल गई। फिर जगल में घूमते हुए चूहों के बिल