भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

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७२ [ १.१३.१३० न खा पाएगा। अथवा हमारे साथ तुम्हारा रहना बन्द हुआ; अब हम तेरे साथ न बसेंगे। शेष पहले ही की तरह से है। ————— शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय भी शृगाल यही भिक्षु था। चूहों का राजा तो मैं ही था। १३०. कोसिय जातक "यथाधाचाव भुञ्जस्सु..." यह (गाथा) शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय श्रावस्ती-निवासी एक स्त्री के बारे में कही। क. वर्तमान कथा वह एक श्रद्धालु ब्राह्मण उपासक की ब्राह्मणी थी; बहुत दुश्चरित्र, पापिन। रात को दुराचार करती। दिन में कुछ न कर रोग का बहाना बना बड़बड़ाती हुई लेट रहती। वह ब्राह्मण उससे पूछता—"भद्रे ! तुझे क्या कष्ट है?" "मुझे वायु बींधती है।" "तो तुझे क्या क्या चाहिए?" "चिकने, मीठे, अच्छे, स्वादिष्ट यागु-भात-तेल आदि।" जो जो वह इच्छा करती, ब्राह्मण ला लाकर देता। दास की तरह सब काम करता। लेकिन वह ब्राह्मण के घर आने के समय लेट रहती, बाहर जाने के समय जारों के साथ गुजारती। ब्राह्मण सोचता कि इसके शरीर में चुभनेवाली वायु का अन्त ही होता दिखाई नहीं देता। एक दिन वह गन्ध माला आदि से जेतवन जा शास्ता की वन्दना तथा पूजा

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