जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकोसिय ] ७३ पर एक ओर बैठा। शास्ता ने पूछा- "क्यों ब्राह्मण दिखाई नहीं देता ?" "भन्ते ! मेरी ब्राह्मणी के शरीर को वायु बीधती है। सो मैं उसके लिए घी-तेल तथा अच्छे अच्छे भोजन योजता हूँ। उसका शरीर मोटा गया है। चमड़ी निखर आई है। लेकिन वात-रोग का अन्त होता नहीं दिखाई देता। मैं उसकी सेवा में ही लगा रहता हूँ। इसी लिए यहाँ आने का अवकाश नहीं मिलता।" शास्ता ने ब्राह्मणी के दुश्चरित्र होने की बात जान कहा- "ब्राह्मण ! इस प्रकार पड़ी हुई स्त्री के रोग के न शान्त होने पर पूर्व-जन्म में भी तुझे बुद्धिमानो ने बताया था कि यह यह ओषधि करनी चाहिए, लेकिन यह पूर्व-जन्म की बात होने के कारण तू उस पर ध्यान नहीं देता।" - उस ब्राह्मण के पूछने पर शास्ता ने पूर्व जन्म की बात कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व ब्राह्मणो के एक बड़े कुल में पैदा हुए। सयाने होने पर तक्षशिला जा, यहाँ सब विद्याएँ सीख लौटकर बनारस में प्रसिद्ध आचार्य्य हुए। एक सौ राज- धानियो के क्षत्रिय ब्राह्मण कुमार प्रायः उसी के पास विद्याएँ सीखने । एक जनपदवासी ब्राह्मण ने बोधिसत्त्व से तीनो वेद और अट्ठारह विद्याएँ सीखीं। वह वाराणसी में ही बस कर प्रतिदिन दो तीन बार बोधिसत्व के पास आता। उसकी ब्राह्मणी दुश्चरित्र थी, पापिन थी। शेष सारी कथा वर्तमान कथा ही की तरह है। हाँ, बोधिसत्व ने यह सुन कि 'इस कारण से उपदेश सुनने आने का समय नहीं मिलता' और यह समझकर कि वह लडकी उसे धोखा देकर लेट रहती है, उसके अनुकूल औषधि बताने का विचार कर कहा— "तात ! अब से तू उसे दूध, घी, रस आदि मत दे। गोमूत्र में त्रिफला आदि और पांच प्रकार के पत्ते रगड़कर उनका काढ़ा बनाकर ओषधि में ताँबे की गन्ध आने तक ताँबे के नए वर्तन में रख रस्सी, जोत या किसी वृक्ष की ही लता ले उसे जाकर कहना—यह तेरे रोग के लिए उचित दवाई है। या तो इसे पी; नही तो जो भोजन तू करती है उसके अनुसार काम कर। और यह गाथा भी कहना। यदि दवाई न पीए तो उसे रस्सी से या जोत से अथवा लता से कुछ