जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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रह गया। तब वह अपनी स्त्री को ले, सङ्गसेठ के पास आने के विचार से वाराणसी से निकल पैदल ही राजगृह पहुँच सङ्गसेठ के घर गया। उसने उसे देखते ही 'मेरा मित्र आया है' पहचान गले मिल आदर सत्कार करवाया। फिर कुछ दिन बिताकर पूछा—"मित्र कैसे आए?" "सौम्य, मुझ पर खतरा आ पडा। मेरा सब धन नष्ट हो गया। मुझे सहारा दे।" "मित्र, अच्छा डरें मत" कह उसने खजाना खुलवा चालीस करोड हिरण्य दिलवा उसके साथ अपने पास जो कुछ भी वस्त्र आदि तथा जानदार और बेजान वस्तु थी सभी बांटकर आधी आधी दी। वह उस धन को ले फिर वारा- णसी लौट रहने लगा। आगे चलकर सङ्गसेठ पर भी वैसा ही खतरा आ पडा। उसने अपने लिए सहारा ढूंढते हुए सोचा—मैने अपने मित्र का बहुत उपकार किया। आधी जायदाद दे दी। वह मुझे देखकर त्यागेगा नही। मैं उसके पास चलूँ। उसने अपनी स्त्री के साथ पैदल ही वाराणसी पहुँचकर कहा—भद्रे, तेरे लिए यह अच्छा नही है कि तू मेरे साथ गली गली भटके। मै जाकर सवारी भेजूंगा, तू पीछे उस पर बडे ठाट से आना। उसे एक शाला में बिठा स्वय नगर में दाखिल हुआ। सेठ के घर पहुँच सूचना भिजवाई कि राजगृह से तुम्हारा मित्र आया है। सेठ बोला—आ जाए। उसे देखकर न वह आसन से उठा न स्वागत ही किया, केवल इतना पूछा—"क्यो आया है?" "तुम्हें देखने आया हूँ।" "निवास स्थान कहीं ठीक किया है?" "अभी कही ठीक नही हुआ है। सेठानी को शाला में बिठाकर आया हूँ।" "यहाँ तुम्हारे ठहरने को जगह नही। सीधा लेकर किसी जगह पका खाकर चले जाओ। फिर मेरे पास न आना"—इतना कह अपने एक दास को आज्ञा दी कि मेरे मित्र के पल्ले में एक तूम्बा भर भूसा बाँध दो। उसी दिन उसने एक हजार गाडी लाल चावल छटवाकर कोठे भरे थे। चालीस करोड धन लेकर आए अकृतज्ञ महाचोर ने मित्र को केवल एक तूम्बा भर भुस दिलवाया। दास एक टोकरी मे तूम्बा भर भुस डाल वोधिसत्व के पास गया।