जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
८२ [ १.१४.१३२ गाने बजाने के शब्द से सारा राजभवन ऐसा गूंज गया जैसे मेघ के शब्द से महासमुद्र की घोस भर जाए। तब बोधिसत्त्व को विचार हुआ—यदि मैं उन यक्षिणियो के बनाए हुए दिव्य-रूप को देखता तो मैं मृत्यु को प्राप्त होता और मुझे यह वैभव न देखना मिलता। प्रत्येक-बुद्धो के उपदेशानुसार चलने से मुझे इसकी प्राप्ति हुई। इस प्रकार सोच उल्लास-वाक्य कहते हुए यह गाथा कही— कुसलूपदेसे धितिया दळ्हाय च अवत्थितत्ताभयभीरुताय च, न रक्खसीनं वसमागमिम्हा स सोत्थिभायो महता भयेन मे ॥ [ सदुपदेश पर दृढ़ता पूर्वक स्थिर रहने से, तथा भय भीरुता को मन में स्थान न देने से हम राक्षसियो के वश में नही आए। मै बडे भारी भय से बच गया (सकुशल रहा) ।] कुसलूपदेसे; समर्थ लोगो के उपदेश से; प्रत्येक-बुद्धो के उपदेशानुसार (चलकर) । धितिया दळ्हाय च, दृढ धृति से वा स्थिर अखण्डित धीर्य्य से । अवत्थितत्ताभयभीरुताय च, भय-भीरुता को मन में स्थान न देने से, भय कहते हैं चित्त का डर मात्र और भीरुता शरीर को कंपा देनेवाला भय। यह दोनो बोधिसत्त्व को यह देखकर भी कि यक्षिणियां मनुष्यो को खा जाती हैं— इस भय के कारण के उत्पन्न होने पर भी नही हुए। इसी लिए कहा है अवत्थि- तत्ताभयभीरुताय च । भयभीरुता के न होने से अर्थात् भयभीरुता का कारण उपस्थित होने पर भी पीछे न लौटने से । नरक्खसीनं वसमागमिम्हा, यक्ष- कान्तार मे उन राक्षसियो के वश में नही आया। क्योकि सदुपदेश में हमारी स्थिति स्थिर और दृढ थी। भयभीरुता के न होने से पीछे न लौटने वाले हुए, इसलिए राक्षसियो के वश में नही आए—यही भाव है। स सोत्थि भायो महता भयेन मे. सो आज मुझेयह बडे भारी भय से, राक्षसियो से प्राप्त होनेवाले दुःख दौर्मनस्य से छुटकारा मिला, कल्याण हुआ, प्रीतिसौमनस्य-भाव पैदा हुआ।
८२ [ १.१४.१३२ गाने बजाने के शब्द से सारा राजभवन ऐसा गूंज गया जैसे मेघ के शब्द से महासमुद्र की कोक्ष भर जाए। तब बोधिसत्व को विचार हुआ—यदि मैं उन यक्षिणियो के बनाए हुए दिव्य-रूप को देखता तो मैं मृत्यु को प्राप्त होता और मुझे यह वैभव न देखना मिलता। प्रत्येक-बुद्धो के उपदेशानुसार चलने से मुझे इसकी प्राप्ति हुई। इस प्रकार सोच उल्लास-वाक्य कहते हुए यह गाथा कही— कुसलूपदेसे धितिया दळ्हाय च अवत्थिसत्ताभयभीरुताय च, न रक्खसीन वसमागमिम्हा स सोत्थिभावो महता भयेन मे ॥ [ सदुपदेश पर दृढ़ता पूर्वक स्थिर रहने से, तथा भय भीरुता को मन में स्थान न देने से हम राक्षसियो के वश में नही आए। मै बडे भारी भय से बच गया (सकुशल रहा) ।] कुसलूपदेसे; समर्थ लोगो के उपदेश से, प्रत्येक-बुद्धो के उपदेशानुसार (चलकर) । धितिया दळ्हाय च, दृढ धृति से वा स्थिर अखण्डित वीर्य से। अवत्थितत्ताभयभीरुताय च, भय-भीरुता को मन में स्थान न देने से, भय कहते है चित्त का डर मात्र और भीरुता शरीर को कँपा देनेवाला भय। यह दोनो बोधिसत्व को यह देखकर भी कि यक्षिणियां मनुष्यो को खा जाती है— इस भय के कारण के उत्पन्न होने पर भी नही हुए। इसी लिए कहा है अवत्थि- तत्ताभयभीरुताय च। भयभीरुता के न होने से अर्थात् भयभीरुता का कारण उपस्थित होने पर भी पीछे न लौटने से। नरक्खसीनं वसमागमिम्हा, यक्ष- कान्तार मे उन राक्षसियो के वश में नही आया। क्योकि सदुपदेश में हमारी स्थिति स्थिर और दृढ थी। भयभीरुता के न होने से पीछे न लौटने वाले हुए, इसलिए राक्षसियो के वश मे नही आए—यही भाव है। स सोत्थि भावो महता भयेन मे. सो आज मुझेयह बडे भारी भय से, राक्षसियो से प्राप्त होनेवाले दुःख दोर्मनस्य से छुटकारा मिला, कल्याण हुआ, प्रीतिसौमनस्य-भाव पैदा हुआ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। मैं उस समय
घंतासन ] ८३ इस प्रकार बोधिसत्त्व इस गाथा से धर्मोपदेश कर धर्मानुसार राज्य कर दानादि पुण्य करते हुए कर्मानुसार परलोक गए। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। मैं उस समय तक्षशिला जाकर राज्य प्राप्त करनेवाला कुमार था। १३३. घतासन जातक “खेम योंह...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय एक भिक्षु के बारे में कही। क. वर्तमान कथा वह भिक्षु बुद्ध से कर्मस्थान ग्रहण कर प्रत्यन्त देश में जा एक गाँव के पास एक आरण्यक निवासस्थान में रहने लगा। पहले ही महीने में जब वह भिक्षा माँगने गया था, उसकी पर्णकुटी में आग लग गई। निवासस्थान के अभाव में कष्ट पाते हुए उसने उपस्थायको से कहा। वे बोले—'अच्छा, भन्ते पर्णशाला बनाएँगे। अभी तो हल जोत रहे हैं। अभी बो रहे हैं, इस प्रकार कहते कहते उन्होंने तीन महीने बिता दिए।' निवासस्थान की अनुकूलता न होने से वह भिक्षु कर्मस्थान को पूरा नहीं कर सका। उसे निमित्त¹ तक प्राप्त नहीं हुआ। वर्षावास की समाप्ति पर वह जेतवन गया और वहाँ शास्ता को प्रणाम कर एक ओर बैठा। शास्ता ने उसके साथ बातचीत करते हुए पूछा—क्या भिक्षु ! तेरा कर्मस्थान सफल ¹ ध्यान के विषय (object) का आंख बन्द कर लेने पर दिखाई देने वाला आकार।
८२ [ १.१४.१३२ गाने बजाने के शब्द से सारा राजभवन ऐसा गूंज गया जैसे मेघ के शब्द से महासमुद्र की कोख भर जाए। तब बोधिसत्व को विचार हुआ—यदि मैं उन यक्षिणियो के बनाए हुए दिव्य रूप को देखता तो मैं मृत्यु को प्राप्त होता और मुझे यह वैभव न देखना मिलता। प्रत्येक-बुद्धो के उपदेशानुसार चलने से मुझे इसकी प्राप्ति हुई। इस प्रकार सोच उल्लास-वाक्य कहते हुए यह गाथा कही— कुसलूपदेसे धितिया दळ्हाय च अवत्थितत्ताभयभीरुताय च, न रक्खसीन वसमगमिरम्हा स सोत्थिभावो महता भयेन मे ॥ [ सदुपदेश पर दृढता पूर्वक स्थिर रहने से, तथा भय भीरुता को मन मे स्थान न देने से हम राक्षसियो के वश में नही आए। में बडे भारी भय से बच गया (सकुशल रहा)।]
कुसलूपदेसे; समर्थ लोगो के उपदेश से, प्रत्येक-बुद्धो के उपदेशानुसार (चलकर)। धितिया दळ्हाय च, दृढ धृति से या स्थिर अखण्डित वीर्य्य से। अवत्थितत्ताभयभीरुताय च, भय-भीरुता को मन में स्थान न देने से, भय कहते हे चित्त का डर मात्र और भीरुता शरीर को कँपा देनेवाला भय। यह दोनो बोधिसत्व को यह देखकर भी कि यक्षिणियां मनुष्यो को खा जाती हैं— इस भय के कारण के उत्पन होने पर भी नही हुए। इसी लिए कहा है अवत्थि- तत्ताभयभीरुताय च। भयभीरुता के न होने से अर्थात् भयभीरुता का कारण उपस्थित होने पर भी पीछे न लौटने से। नरक्खसीन वसमगमिरम्हा, यक्ष- कान्तार में उन राक्षसियो के वश में नही आया। क्योकि सदुपदेश में हमारी स्थिति स्थिर और दृढ थी। भयभीरुता के न होने से पीछे न लौटने वाले हुए, इसलिए राक्षसियो के वश में नही आए--यही भाव है। स सोत्थि भावो महता भयेन मे सो आज मुझयह बडे भारी भय से, राक्षसियो से प्राप्त होनेवाले दु ख दोर्मनस्य से छुटकारा मिला, कल्याण हुआ, प्रीतिसौमनस्य-भाव पैदा हुआ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। मै उस समय
घंतासन ] ८३ इस प्रकार बोधिसत्त्व इस गाथा से धर्मोपदेश कर धर्मानुसार राज्य कर दानादि पुण्य करते हुए कर्मानुसार परलोक गए। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। मै उस समय तक्षशिला जाकर राज्य प्राप्त करनेवाला कुमार था। १३३. घतासन जातक “खेमं यहिं...” यह शास्ता ने जेतवन मे विहार करते समय एक भिक्षु के बारे में कही। क. वर्तमान कथा यह भिक्षु बुद्ध से कर्मस्थान ग्रहण कर प्रत्यन्त देश मे जा एक गाँव के पास एक आरण्यक निवासस्थान में रहने लगा। पहले ही महीने में जब यह भिक्षा माँगने गया था, उसकी पर्णकुटी में आग लग गई। निवासस्थान के अभाव में कष्ट पाते हुए उसने उपस्थापको से कहा। वे बोले—'अच्छा, भन्ते पर्णशाला बनाएँगे। अभी तो हल जोत रहे हैं। अभी बो रहे हैं; इस प्रकार कहते कहते उन्होने तीन महीने बिता दिए।' निवासस्थान की अनुकूलता न होने से वह भिक्षु कर्मस्थान को पूरा नहीं कर सका। उसे निमित्त¹ तक प्राप्त नही हुआ। वर्षावास की समाप्ति पर वह जेतवन गया और वहीं शास्ता को प्रणाम कर एक ओर बैठा। शास्ता ने उसके साथ बातचीत करते हुए पूछा—क्यो भिक्षु ! तेरा कर्मस्थान सफल ¹ ध्यात, ज्ञे. विषय (Object), का, आँख बन्द कर लेने पर, दिखाई देने वाला आकार।
फिर उसके पूछने पर पूर्व-जन्म की कथा कही—
हुआ ? उसने प्रारम्भ से लेकर प्रतिकूलता की सब बात कही । शास्ता ने कहा--भिक्षु ! पूर्व समय मे जानवरो ने भी अपनी अनुकूलता प्रतिकूलता देख, अनुकूल रहने पर उस जगह रह, प्रतिकूल प्रतीत होने पर उसे छोड दिया और दूसरी जगह चले गए । तू ने क्यो अपनी अनुकूलता प्रतिकूलता न समझी ? फिर उसके पूछने पर पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्वकाल में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व पक्षी होकर पैदा हुए । बडे होने पर सौभाग्यशाली पक्षि-राजा हो एक जगल में एक तालाब के किनारे शाखा प्रशाखाओ से युक्त तथा बहुत पत्तोवाले एक महान्-वृक्ष पर अनेक अनुचरो सहित रहने लगे । बहुत से पक्षी पानी पर फैली हुई शाखाओ पर रहते हुए अपनी बीट पानी मे गिरा देते थे । उस तालाब मे एक प्रचण्ड नाग-राज रहता था । उसके मन में आया कि यह पक्षिगण मेरे निवासस्थान तालाब में बीट गिराते है । में पानी मे से आग पैदा कर इस वृक्ष को जला इन्हें यहाँ से भगाऊँ । उसने क्रुद्ध हो रात को जिस समय सब पक्षिगण इकट्ठे हो वृक्ष की शाखाओ पर सो रहे थे, पहले चूल्हे पर रक्खे पानी की तरह बुलबुले पैदा कर, दूसरी बार धुआँ उठा, तीसरी बार ताड के वृक्ष जितनी ऊँची ज्वाला उठाई । बोधिसत्त्व ने कहा—"पक्षिगण ! आग से जलने पर पानी से बुझाया जाता है, लेकिन अब पानी ही जलने लगा है इसलिए यहाँ नही रह सक्ते । अन्यत्र चले ।" इतना कह, यह गाथा कही— खेमं यहिं तत्थ घरी उदीरितो उदकस्स मज्झे जलते घतासनो, न अज्ज वासो महिया महीरुहे दिसा भजव्हो सरणज्ज नो भय ॥ [ जहाँ कल्याण था, वही शत्रु पैदा हो गया । पानी में आग जलने लगी । आज पृथ्वी से उगे वृक्ष पर रहना नहीं होगा । (किसी दूसरी) दिशा को चलो। जिस जगह हम ने शरण ली थी वहाँ से भय पैदा हो गया । ]
भानसोधन ] ८५ सेमें याँहि तत्थ अरी उदीरितो, जिस पानी में हमारा कल्याण था, जहाँ निर्भयता थी, वही से विरोधी, शत्रु पैदा हो गया । उदरस्स, पानी के, घतासनो, अग्नि । वह घृत खाती है, इसी लिए घतासन कहलाई । न अज्ज वासो, आज हमारा रहना नहीं है । महिया महीरुहे, महीरुह कहते हैं वृक्ष को, उस इस पृथ्वी में से पैदा हुए वृक्ष में । दिसा भजव्हो, दिशाओं में जाओ । सरणञ्च नो भय, आज हमारे शरणस्थान से ही भय पैदा हो गया । प्रतिशरणस्थान ही भय का जनक हो गया ।
ऐसा कह बोधिसत्व अपना कहना मानने वाले पक्षियों को लेकर अन्यत्र चले गए । बोधिसत्व का कहना न मान जो पक्षीगण वहीं रहे वह मर गए । शास्ता ने यह धर्मदेशना ला चार आर्य-सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया । आर्य-सत्यों के प्रकाशन के अंत में वह भिक्षु अर्हत् हो गया । उस समय बोधिसत्व का कहना मानने वाले पक्षीगण बुद्ध परिषद हुई । पक्षि-राजा तो मैं ही था । १३४. भानसोधन जातक “ये सञ्चिन्नो...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय सङ्कस्स नगर द्वार पर सक्षेप में पूछे गए प्रश्न की धर्मसेनापति (सारिपुत्र) द्वारा विस्तृत व्याख्या के बारे में कही । अतीत कथा इस प्रकार है— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणमी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व ने एकान्त जगल में मृत्यु को प्राप्त होते समय शिष्यो के पूछने पर सक्षेप से उत्तर
८६ [ १.१४.१३४ दिया—नेवसञ्जानासञ्जी...तपस्वियों को ज्येष्ठ-शिष्य की बात समझ मे नही आई। बोधिसत्व ने आभास्वर (-लोक) से आ आकाश में ठहर यह गाथा कही— ये सञ्जिनो तेपि दुग्गता येपि असञ्जिनो तेपि दुग्गता, एतं उभयं विवज्जय तं समापत्तिसुखं अनङ्गणं ॥ [जो सञ्जि है, उनकी भी दुर्गति है। जो असञ्जि हैं, उनकी भी दुर्गति है। इन दोनो को छोड़कर समापत्ति सुख दोष रहित है।] ये सञ्जिनो, नेवसञ्जानासञ्जी प्राणियो को छोड़ शेष चित्त वाले प्राणियो से मतलब है। तेपि दुग्गता, उस समापत्ति के न होने से वह भी दुर्गति- प्राप्त है। येपि असञ्जिनो, असञ्जा-भव में पैदा होनेवाले चित्त-रहित प्रा- णियो से मतलब है। तेपि दुग्गता, ये भी इसी समापत्ति को प्राप्त किए न रहने से दुर्गति-प्राप्त हैं। एतं उभयं विवज्जय। इन दोनो सञ्जि-भाव तथा असञ्जिभाव को छोड़, त्याग—यह शिष्यो को उपदेश देता है। तं समापत्ति सुखं अनङ्गणं—नेवसञ्जानासञ्जायतन को प्राप्त करने वालो के शान्त होने के कारण उसे सुख कहा, ध्यान सुख अङ्गण-रहित, दोष रहित होता है। चित्त की बहुत एकाग्रता होने से भी वह अङ्गण-रहित कहलाया। इस प्रकार बोधिसत्त्व ने धर्मोपदेश दिया। फिर शिष्य की प्रशंसा कर ब्रह्मलोक गए। तब बाकी के तपस्वियो की ज्येष्ठ-शिष्य के प्रति श्रद्धा बड़ी। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय ज्येष्ठ शिष्य सारिपुत्र था; महाब्रह्मा तो मै ही था।
१३५. चन्दाभ जातक
चन्दाभ ] ८७ १३५. चन्दाभ जातक “चन्दाभं...”, यह (गाथा) भी शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय सङ्कस्स नगर के द्वार पर स्थविर की प्रश्न-की-व्याख्या के ही बारे में कही— पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व ने एकात जगल में मृत्यु को प्राप्त होने के समय शिष्यो के पूछने पर चन्दाभं सुरि- याभं कहा। वह मरकर आभस्वर लोक में उत्पन्न हुए। तपस्वियो ने ज्येष्ठ- शिष्य की बात पर विश्वास नहीं किया। बोधिसत्त्व ने आकर आकाश में उप- स्थित हो यह गाथा कही— चन्दाभं सुरियाभञ्च योघ पञ्ञाय गाधति, अवितक्केन झानेन होति आभस्सरूपगो ॥ [ जो प्रज्ञा से सूर्याभा तथा चन्द्राभा पर स्थिर होता है। वह वितर्क- रहित ध्यान से आभस्वर-लोक में उत्पन्न होता है। ] चन्दाभं का मतलब है श्वेत-कसिण। सुरियाभं का पीत-कसिण। योघ पञ्ञाय गाधति, जो आदमी इस ससार में इन दोनो कसिणों की प्रज्ञा से भावना करता है, उन्हें आलम्बन बनाकर उनमें प्रवेश करता है, उनमें प्रतिष्ठित होता है। अथवा चन्दाभं सुरियाभञ्च योघ पञ्ञाय भावति, जहाँ तक सूर्य तथा चन्द्रमा की आभा फैली है, उस सारे स्थान में परिभाग-कसित¹ को बढाकर उसी को आलंबन बनाकर ध्यान का अभ्यास करनेवाला दोनों आभाओ की प्रज्ञा से भावना करता है। इसलिए यह भी ठीक अर्थ है। वितक्केन झानेन होति ¹परिभाग-कसिण=पटिभाग निमित्त (अभिधम्मत्य संगहो ६।१८)
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय ज्येष्ठ
८८ [ १.१४.१३६
आभस्सरूपगो, वह मनुष्य वैसा अभ्यास करने से द्वितीय-ध्यान को प्राप्त हो आभस्वर-ब्रह्मलोक को प्राप्त होना ही है। इस प्रकार बोधिसत्त्व तपस्वियों को समझाकर तथा ज्येष्ठ शिष्य की प्रशंसा कर ब्रह्मलोक गए। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय ज्येष्ठ शिष्य सारिपुत्र थे और महाब्रह्मा तो मै ही था। १३६. सुवण्णहंस जातक "यं लद्धं तेन तुट्ठब्ब...", यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय थुल्ल नन्दा भिक्षुणी के बारे में कही— क. वर्तमान कथा श्रावस्ती में एक उपासक ने भिक्षुणी संघ को लहसुन लेने का निमन्त्रण दिया और अपने खेत वाले को आज्ञा दी कि यदि भिक्षुणियां आएँ तो एक एक भिक्षुणी को दो तीन गांठ लहसुन दे। उसके बाद से भिक्षुणियां उसके घर भी और खेत पर भी लहसुन के लिए जाने लगीं। एक उत्सव के दिन उस (उपासक) के घर में लहसुन समाप्त हो गया। थुल्लनन्दा भिक्षुणी औरों को साथ ले घर गई और बोली—आयुष्मानो, लहसुन की आवश्यकता है। —आर्ये, लहसुन नहीं हैं। लाया हुआ समाप्त हो गया। खेत पर जाएँ। वह खेत पर गई और बेअन्दाज लहसुन लिवा लाई। खेत वाला खीझा—यह क्या है कि भिक्षुणियां अन्दाज न कर बे अंदाज लहसुन ले जाती हैं।
सुवण्णहंस ] ८६ उसे यह कहता सुन जो अप्पेच्छ भिक्षुणियां थी वह असन्तुष्ट हुई और उनमें सुनकर भिक्षु भी असन्तुष्ट हुए। उन्होंने खीझकर भगवान् से यह बात कही। भगवान् ने थुल्लनन्दा भिक्षुणी की निन्दा कर कहा— “भिक्षुओ, लालची (=महेच्छ) आदमी जिस मां ने जन्म दिया है, उसके लिए भी अप्रिय हो जाता है। वह अप्रसन्न को प्रसन्न नहीं कर सकता। प्रसन्नो को अधिक प्रसन्न नहीं कर सकता। अप्राप्त वस्तु को प्राप्त नहीं कर सकता। प्राप्त वस्तु को सँभाल कर नहीं रख सकता। अप्पेच्छ आदमी अप्रसन्नो को प्रसन्न कर सकता है। प्रसन्न को अधिक प्रसन्न कर सकता है। अप्राप्त वस्तु को प्राप्त कर सकता है। प्राप्त वस्तु को बनाए रख सकता है।” —इस प्रकार भिक्षुओं को उनके योग्य उपदेश दे फिर कहा 'भिक्षुओ, थुल्ल नन्दा अभी लोभी नहीं है, पहले भी लोभी ही रही है।' इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय मे बाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व एक ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। उनके बड़े होने पर उनके समान जाति-कुल से उन्हे एक भार्या ला दी गई। उससे उसे नन्दा, नन्दवती और नन्दसुन्दरी तीन लड़कियाँ हुईं। उनका विवाह होने से पूर्व ही बोधिसत्त्व मर कर स्वर्ण- हंस होकर पैदा हुए। उन्हें पूर्व-जन्म-स्मृति का ज्ञान भी रहा। उसने बड़े होने पर सोने के परो से ढके हुए परम सौभाग्यवान् अपने शरीर को देखकर विचार किया कि मै कहाँ से मरकर यहाँ पैदा हुआ हूँ? उसे मालूम हुआ कि मनुष्य-लोक से। फिर विचार किया कि ब्राह्मणी और लडकियो का जीवन-यापन कैसे होता है ? उसे पता लगा कि दूसरो की मजदूरी करके बड़े कष्ट से जीवन-यापन करती है। तब उसने सोचा कि मेरे सोने के पर ठोस१ हैं। इनमें से में एक एक पर उन्हे दू। इस से मेरी भार्या और लड़कियाँ सुखपूर्वक जीएँगी।” वह यहाँ पहुँच घर के शहतीर के एक सिरे पर बैठ। ——— १कूटे और रगडे जा सकते हैं।
६० [ १४।१३६
ब्राह्मणी और लड़कियों ने बोधिसत्व को देखकर पूछा—स्वामी, कहाँ से आए ? "मैं तुम्हारा पिता हूँ। मरकर स्वर्ण हंस होकर पैदा हुआ हूँ। तुम्हें देखने के लिए आया हूँ। इसके बाद तुम्हे दूसरो की मजदूरी करते हुए कष्ट- पूर्वक जीवन-यापन करने की जरूरत नही है। में तुम्हें अपना एक एक पर दिया करूँगा। उसे बेच-वेच कर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करना।" इतना कह वह एक पर देकर उड़ गया। इसी प्रकार वह बीच बीच में आकर एक एक पर देता। ब्राह्मणियाँ धनी और सुखी हो गईं। एक दिन उस ब्राह्मणी ने लडकियो से बुलाकर सलाह की—'अम्म ! जानवरो के दिल का पता नही। हो सकता है कि कभी तुम्हारा पिता न आए। इसलिए उसके इस बार आने पर हम उसके सभी पर उखाड लें।' उन्होने अस्वीकार किया। वे बोली—इस प्रकार हमारे पिता को कष्ट होगा। ब्राह्मणी ने लालची होने के कारण फिर एक दिन स्वर्ण-राजहंस के आने पर कहा—स्वामी आएँ। जब उसने देखा कि यह उसके पास आ गया है, तो दोनो हाथो से पकड़कर उसके सब पर नोच लिए। सभी पर बोधिसत्त्व की इच्छा के बिना जबर्दस्ती लिए जाने के कारण बगले के पर सदृश हो गए। अब बोधिसत्त्व पक्ष पसारकर उड़ न सके। उसने उन्हें मटके में रखकर पाला। उनके जो नए पर निकले वह श्वेत ही निकले। पक्ष निकलने पर वह उड़कर अपने स्थान पर चले गए, और फिर वहाँ नही गए। शास्ता ने पूर्व-जन्म की बात सुनाकर कहा—भिक्षुओ, थुल्लनन्दा अभी लालची नही रही है। पहले भी लालची रही है। लालच के ही कारण स्वर्ण से हाथ धोया। अब अपने लालच के कारण लहसुन से भी हाथ धोएगी। इसके बाद अब लहसुन खाना न मिलेगा। जैसे थुल्लनन्दा को वैसे ही उसके कारण दूसरी भिक्षुणियों को भी। इस लिए बहुत मिलने पर भी अपना । जानना चाहिए। थोडा मिलने पर जितना मिले उसी से सन्तोष ना चाहिए। अधिक की इच्छा नही करनी चाहिए। इतना कह यह गाथा कही—
बब्बु ] ६१ य लद्ध तेन तुट्ठव्व अतिलोभो हि पापको, हंसराज गहेत्वान सुवण्णा परिहायथ ॥ [ जो मिले उससे संतुष्ट रहना चाहिए। अतिलोभ करना पाप है। हंसराज को पकड़कर स्वर्ण से हाथ धोया । ] तुट्ठव्वं का मतलब है संतोष करना चाहिए। इतना कह शास्ता ने अनेक प्रकार से निन्दा कर नियम बना दिया कि जो भिक्षुणी लहसुन खाए उसे पाचित्तिय (-दोष) लगे ।¹ फिर जातक का मेल बैठाया। उस समय की ब्राह्मणी यह थुल्लनन्दा हुई। तीन लड़कियाँ इस समय की तीन बहनें। स्वर्ण-राजहंस तो मैं ही था। १३७. बब्बु जातक “प्रत्येको लभते बब्बु...”, शास्ता ने इसे जेतवन में विहार करते समय काणमाता के शिक्षा-पद² के बारे में कही। क. वर्तमान कथा श्रावस्ती में अपनी कानी लड़की के कारण काण माता कहलाने वाली एक श्रोतापन्न आर्य-श्राविका थी। उसने अपनी कानी लड़की को एक गामड़े ¹ भिक्खुणी-पातिमोक्ख । ² पाचित्तिय के भोजन-वर्ग का चौथा शिक्षापद ।
६२ [ १.१४.१३७ में समान जाति के किसी आदमी को दिया। काणा किसी काम से माँ के घर आई। कुछ दिन बीतने पर उसके स्वामी ने दूत भेजा—मैं चाहता हूँ कि काणा आये। काणा चली आवे। काणा ने दूत की बात सुन, माँ से पूछा—माँ ! जाती हूँ। काण-माता ने सोचा कि इतने दिन रहकर खाली हाथ कैसे जाएगी, इस लिए पुए पकाने लगी। उस समय एक पिण्डपातिक¹ भिक्षु उसके घर आया। उपासिका ने उसे बिठाकर पात्रभर पुए दिलवाए। उसने निकल दूसरे (भिक्षु) से कहा। उसे भी वैसे दिलवाए। उसने भी निकलकर दूसरे से कहा। उसे भी वैसे ही। इस प्रकार चार जनों को पुए दिलवाए। सब तैयार पुए समाप्त हो गए। काणा का जाना नहीं हुआ। उसके स्वामी ने दूसरा दूत भेजा और दूसरे के बाद तीसरा भेजा। तीसरे दूत के हाथ उसने कहला भेजा कि यदि काणा नहीं आएगी तो में दूसरी भार्या ले आऊँगा। तीनों बार उसी तरह जाना न हो सका। काणा का स्वामी दूसरी स्त्री ले आया। काणा ने जब यह सुना तो रोने लगी। शास्ता को पता लगा तो पहन कर पात्र-चीवर ले काण-माता के घर जा बिछे आसन पर बैठकर पूछा— “यह क्यो रोती है ?” “इस कारण से ।” शास्ता ने धर्मकथा कह काण-माता को दिलासा दिया। फिर उठकर विहार को गए। उन चार भिक्षुओं को तीन बार तैयार पुए ले आकर काणा के गमन में बाधक होने की बात भिक्षुसंघ में प्रकट हो गई। एक दिन भिक्षुओं ने धर्मसभा में बातचीत चलाई—आयुष्मानो ! चार ¹जो भिक्षु केवल भिक्षा से ही निर्वाह करता है, निमन्त्रण आदि ग्रहण नहीं करता।
दुख नहीं दिया है, पहले भी दिया है। इतना कह, पूर्व-जन्म की कथा कही—
भिक्षु तीन बार काण-माता के यहाँ तैयार किए सब पुए खा गए। इससे काणा र जाना रुक गया। स्वामी ने लडकी को छोड दिया। अब इससे महा- पासिका के मन को बहुत दुख हुआ है। शास्ता ने आकर पूछा—“भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?” अमुक बातचीत।” भिक्षुओ, उन चार भिक्षुओ ने काण-माता का खाकर केवल अब ही उसे दुख नहीं दिया है, पहले भी दिया है। इतना कह, पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्वकाल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व पत्थर- कट कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर वह अपने शिल्प में पारङ्गत हो गए। काशी देश के एक कस्बे में एक बडा धनवान् सेठ था। उसका गढा हुआ खजाना ही चालीस करोड़ का सोना था। उसकी स्त्री मरी तो वह धन के स्नेह से चुहिया होकर पैदा हुई और उस खजाने पर रहने लगी। इस प्रकार वह कुल नष्ट हो गया। यज्ञ उजड गया। वह गाँव भी ध्वस्त हो नामशेष रह गया। उन दिनो वोधिसत्त्व जहाँ पहले गाँव था उसी जगह के पत्थर उखाडकर उन्हे तराशते थे। उस चुहिया ने अपने आसपास बोधिसत्त्व को बार बार आते- जाते देखा तो उसके मन में स्नेह पैदा हो गया। उसने सोचा मेरा बहुत सा धन निष्प्रयोजन नष्ट हुआ जाता है। मै और यह इकट्ठे मिलकर इस धन को खाएँगे। एक दिन वह मुँह में एक कार्षापण पकड हुए बोधिसत्त्व के पास पहुँची। बोधिसत्त्व ने प्रिय वाणी का प्रयोग करते हुए पूछा— “अम्म ! कार्षापण लेकर क्यो आई है ?” “तात ! इसे लेकर स्वय भी खाएँ और मेरे लिए भी मास लाएँ।” बोधिसत्त्व ने ‘अच्छा’ कह स्वीकार कर कार्षापण ले घर जाकर एक मासे का मास खरीदकर उसे लाकर दिया। उसने उसे ले अपने निवासस्थान पर जा जी भरकर खाया। उसके बाद से वह इसी तरह प्रतिदिन बोधिसत्त्व को कार्षापण देती। वह भी उससे मास ला देता।
९४ [ १.१४.१३७ एक दिन उस चुहिया को बिल्ले ने पकड़ लिया । वह बोली—स्वामी ! मुझे न मारें।" "क्यो ? मुझे भूख लगी है ! मै मास खाना चाहता हूँ । मैं बिना मारे नही रह सकता ।" "क्या केवल एक दिन एक ही बार मास खाना चाहते है, अथवा नित्य प्रति ?" "मिले तो नित्य खाना चाहूँगा ।" "यदि ऐसा है, तो मुझे छोड़ दें । मै नित्य प्रति मांस दिया करूँगी ।" "अच्छा तो ध्यान रखना" कह बिल्ले ने उसे छोड़ दिया । उसके बाद से उसके लिए जो मास आता उसके वह दो हिस्से करके एक बिल्ले को देती एक स्वयं खाती । फिर एक दिन उसे एक दूसरे बिल्ले ने पकड़ लिया । उसे भी उसी तरह मनाकर अपने आप को छुड़ाया । उसके बाद से तीन हिस्से करके खाने लगी । फिर एक और ने पकड़ लिया । उसे भी उसी तरह मनाकर अपने को छुड़ाया उसके बाद से चार हिस्से करके खाने लगी । फिर एक ने पकड़ लिया । उसे भी उसी तरह समझाकर अपने को छुड़ाया । उसके बाद से पाँच हिस्से करके खाने लगी । केवल पाँचवाँ हिस्सा मिलने से यह चुहिया आहार की कमी से म्लान तथा कृश हो गई । उसका मांस और रक्त कम पड़ गया । बोधिसत्त्व ने उसे देखकर पूछा—"अम्म ! म्लान क्यो पड़ गई है ?" "इस कारण से ।"
चुहिया बोली—अरे दुष्ट बिलार ! क्या मैं तेरी नौकर हूँ कि मांस लाकर दूँ । अपने पुत्रों का मांस खा । बिल्ला नहीं जानता था कि चुहिया स्फटिक गुहा के अन्दर है । उसने क्रोध से सहसा आक्रमण किया कि चुहिया को पकडूंगा । उसका हृदय स्फटिक गुहा से टकराया और उसी समय चूर चूर हो गया । आंखें निकल आईं सी हो गईं । वह वही मरकर एक छिपे हुए स्थान पर गिरा । इस प्रकार दूसरे चार जने भी मृत्यु को प्राप्त हुए । उसके बाद से चुहिया निर्भय हो गई । वह बोधिसत्त्व को प्रतिदिन दो तीन कार्षापण देती । इस प्रकार उसने सारा धन बोधिसत्त्व को ही दे दिया । वे दोनो जीवन भर मित्र-भाव से रह यथाकर्म (परलोक) सिधारे । शास्ता ने यह पूर्वजन्म की कथा कह सम्यक् सम्बुद्ध हुए रहने पर यह गाथा कही— यत्थेषो लभते बब्बु दुतियो तत्थ जायति, ततियो च चतुत्थो च इदं ते बब्बुका बिलं ॥ [ जहाँ एक बिल्ले को (मांस) मिलता है दूसरा वही जाता है । तीसरा भी वही जाता है और चौथा भी वही । हे बिल्ले ! यह तेरा बिल¹ है । ] यत्थ जिस जगह । बब्बु, बिल्ला । दुतियो तत्थ जायति, जहां एक को चुहिया अथवा मास मिलता है, दूसरा बिल्ला भी वही जाता है । वैसे ही ततियो च चतुत्थो च, इस प्रकार वहाँ चार बिल्ले हुए । वे दिन प्रति दिन मास खाते हुए । ते बब्बुका इदं स्फटिक का बना हुआ बिल पेट में गड़ाकर सभी मर गए । इस प्रकार शास्ता ने धर्मोपदेश दे जातक का मेल बैठाया । उस समय के चारो बिल्ले चार भिक्षु हुए । चुहिया काण-माता हुई । पत्थर तराशनेवाला जौहरी तो मैं ही था । ¹ प्रतीत होता है कि यह गाथा चुहिया द्वारा कही गई थी । इस में 'बिल' शब्द का अर्थ 'हिस्सा' होना चाहिए । जातककार ने यह गाथा बुद्ध-भाषित बनाई है; और बिल का जो अर्थ किया है वह मेल नहीं खाता ।
१३८. गोध जातक
६६ [ १.१४.१३८ १३८. गोध जातक “किं ते जटाहि दुम्मेध...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय एक ढोंगी के बारे में कही। वर्तमान-कथा जैसी कथा पहले आई है,१ वैसी ही है। ख. अतीत कथा पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्त्व गोह के रूप में पैदा हुए। उस समय पाँच-अभिञ्ज्ञा प्राप्त (एक) उग्र तपस्वी एक गाँव के समीप जंगल में पर्ण-कुटी में रहता था। ग्रामवासी तपस्वी की अच्छी तरह सेवा करते थे। बोधिसत्त्व उसके चङ्क्रमण करने की जगह के पास एक बिल में रहते थे। प्रतिदिन दो तीन बार तपस्वी के पास आकर धर्म तथा अर्थपूर्ण बातें सुन तपस्वी को प्रणाम कर अपने निवासस्थान को लौट जाते। आगे चलकर तपस्वी ग्राम- वासियों को पूछकर वहाँ से चला गया। उस शीलव्रतसम्पन्न तपस्वी के चले जाने पर एक दूसरा कुटिल तपस्वी आकर उसी आश्रम में रहने लगा। बोधि- सत्त्व उसे भी पहले ही तपस्वी की तरह सदाचारी समझ उसके पास गए। एक दिन ग्रीष्मऋतु में अकाल वर्षा बरसने पर बिलों में से मक्खियाँ निकलीं। उन्हें खाने के लिए गोह घूमने लगीं। ग्रामवासियों ने बाहर निकल बहुत सी गोहें पकड़ चिकनी भोजन सामग्री के साथ खट्टा-मीठा गोह-मांस तैयारकर उस तपस्वी को दिया। १भीमसेन जातक (८०)
गोध ] ६७ तपस्वी ने गोह का मांस खाया तो उसे बहुत स्वादिष्ट लगा । उसने पूछा —यह मांस बड़ा मीठा है। किसका मांस है ? जब उसे पता लगा कि किसका मांस है, तो वह सोचने लगा कि मेरे पास बड़ी गोह आती है । उसे मारकर उसका मांस खाऊँगा । उसने पकाने के बरतन और उनके साथ घी, नमक आदि मँगवा कर एक ओर रख लिए। स्वयं मुद्गर ले काषाय वस्त्र से ढँक पर्ण-कुटी के सामने शान्त-चित्त की तरह बैठ बोधिसत्त्व की प्रतीक्षा करने लगा। बोधिसत्त्व शाम को तपस्वी के पास जाने के लिए निकले। समीप पहुँचते ही उसकी इन्द्रियों में विकार देखकर सोचने लगे—यह तपस्वी उस तरह नहीं बैठा है जैसे और दिनों बैठा रहता था। आज यह मेरी ओर द्रूषित दृष्टि से देख रहा है। इसकी परीक्षा करूँगा । वे जिधर से तपस्वी की देह को छूकर हवा आ रही थी उधर खड़े हुए । गोह के मांस की गन्ध आई । उसे सूंघकर बोधिसत्त्व ने सोचा—इस कुटिल तपस्वी ने आज गोह मांस खाया होगा । इसी से यह रस-तृष्णा में आसक्त हो गया । आज मेरे समीप पहुँचने पर मुझे मुद्गर से मार मांस पकाकर खाना चाहता होगा । वह उसके पास न जा वापिस लौटकर घूमने लगे । तपस्वी ने बोधिसत्त्व को न आता देख समझा कि यह जान गया होगा कि मैं इसे मारना चाहता हूँ । इसी से नहीं आता है । न आने पर भी यह कहाँ बचकर जाएगा । उसने मुद्गर निकाल फेंककर मारा । वह उसकी पूँछ के सिरे में ही लगा । बोधिसत्त्व जल्दी से बिल में प्रविष्ट हो दूसरे छेद से सीस निकालकर बोले —'कुटिल जटिल ! मैं तुझे सदाचारी समझ कर तेरे पास आया । लेकिन अब मैंने तेरा कुटिल स्वभाव जान लिया । तेरे जैसे महाचोर को इस प्रव्रजित भेष से क्या ?'' इस प्रकार उसकी निन्दा करते हुए यह गाथा कही— किं ते जटाहि दुम्मेध किं ते अजिन साटिया, अब्भन्तरं ते गहनं बाहिरं परिमज्जसि ॥१ १ धम्मपद (२६।२२) ७
३८ [ १.१४ १३६ [हे दुर्बुद्धि ! जटाओ से तुझे क्या (लाभ) ? और मृगचर्म के पहनने से क्या ? अन्दर से तो तू मैला है, बाहर से धोता है।] किं ते जटाहि दुम्मेध, भो, दुर्बुद्धि ! मूर्ख ! यह जटाएँ प्रव्रजित को धारण करनी चाहिएँ। प्रव्रज्या गुण से तू रहित है। तुझे इन जटाओ से क्या लाभ ? किं ते प्रजिन साटिया, मृग-चर्म के अनुकूल सयम का अभाव है, तब इस मृग-चर्म से क्या ? अब्भन्तर ते गहन—तेरा भीतर राग, द्वेष तथा मोह से मलिन है, ढका हुआ है। बाहिर परिमज्जसि, सो तू अभ्यन्तर को मैला ही रख स्नान आदि से तथा (श्रमण-) चिह्न धारण करके बाहर को साफ करता है। तू वैसा ही है जैसे वाञ्जी से भरा हुआ तूम्बा हो, विष से भरा घडा हो, साँप से भरी हुई वाँवी हो अथवा गूढ़ से भरा हुआ चित्रित घडा हो। तुझ चोर के यहाँ रहन से क्या ? शीघ्र भाग । यदि नही जाएगा तो ग्रामवासियो को कहकर तेरा निग्रह करवाऊँगा। इस प्रकार बोधिसत्त्व उस कुटिल तपस्वी को धमकाकर बिल में चले गए। कुटिल तपस्वी भी वहाँ से चला गया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय कुटिल तपस्वी यह ढोंगी था। पहला शीलवान् तपस्वी सारिपुत्र था। गोधपण्डित तो मैं ही था। १३६. उभतोभट्ठ जातक "अवस्सो भित्तो पटो नष्टो . ." यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय देवदत्त के बारे म कही।