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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages
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२८८ [ २.५.१९४ ब्राह्मण-गृहपति आदि देवेन्द्र शक्र को देखकर प्रसन्न हुए—अधार्मिक राजा मारा गया। अब हमें शक्र का दिया हुआ धार्मिक राजा प्राप्त हुआ। शक्र ने भी आकाश में खड़े हो कहा—"यह शक्र का बनाया हुआ राजा अब से धर्मपूर्वक राज्य करेगा। यदि राजा अधार्मिक होता है तो वर्षा असमय होती है, समय पर नहीं होती है, अकाल-भय, रोग-भय तथा शस्त्र-भय बना ही रहता है।" इस प्रकार उपदेश देते हुए शक्र ने दूसरी गाथा कही— अकाले वस्सति तस्स काले तस्स न वस्सति सग्गा च चवतिट्ठना ननु सो तावता हतो ॥ [ उसके राज्य में असमय वर्षा होती है, समय पर नहीं होती। वह स्वर्ग- स्थान से गिरता है। निश्चय से वह उतने से मारा गया।] अकाले, अधार्मिक राजा के राज्य करने के समय—अनुचित समय पर खेती के पकने के समय या कटाई तथा मर्दन करने के समय देव वस्सति। काले, योग्य समय पर, बोने के समय, खेती छोटी रहने के समय वा दाना पड़ने के समय न वस्सति। सग्गा च चवतिट्ठना, स्वर्ग-स्थान से अर्थात् देवलोक से। अधार्मिक राज अप्रतिलाभ होने से देवलोक से च्युत होता है। यह भी अर्थ है कि स्वर्ग में भी राज्य करता हुआ अधार्मिक राजा वहाँ से च्युत होता है। ननु सो तावता हतो, निश्चय से वह अधार्मिक राजा इस से मारा जाता है। अथवा "नु" यहाँ एकान्तवाची है, न केवल वह इतने से मारा गया, बल्कि वह आठ महा नरकों में तथा सोलह उस्सद नरकों में चिरकाल तक भाग जाएगा। इस प्रकार शक्र जन-समूह को उपदेश दे अपने देवस्थान को ही चला गया। बोधिसत्व ने भी धर्म से राज्य करते हुए स्वर्ग-मार्ग को भरा। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय अधार्मिक राजा देवदत्त था। शक्र अनुरुद्ध था। सुजाता राहुल-माता थी। शक्र का बनाया हुआ राजा तो मैं ही था।

१६५. पब्बतूपत्थर जातक

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पब्बतूपत्थर ] २८६ १६५. पब्बतूपत्थर जातक ' "पब्बतूपत्थरे रम्मे. " यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय कोशल राजा के बारे में कही। क. वर्तमान कथा कोशल राजा के एक अमात्य ने रनिवास को दूषित किया। राजा ने खोज करके उसे ठीक ठीक जान शास्ता को निवेदन करने की इच्छा से जेतवन जा, शास्ता को प्रणाम कर पूछा- भन्ते ! हमारे रनिवास को एक अमात्य ने दूषित किया है। उसको क्या करना चाहिए ?" शास्ता ने पूछा-"महा- राज ! वह अमात्य उपकारी है ? वह स्त्री प्रिया है ?" "हाँ भन्ते ! बहुत उपकारी है। सारे राजकुल को सँभालता है। वह स्त्री भी मेरी प्रिया है। "महाराज ! अपने उपकारी सेवकों के प्रति तथा प्रिया स्त्री के प्रति बुरा व्यवहार नही किया जा सकता। पूर्व समय में भी राजा लोग पण्डितो की बात सुन उपेक्षावान् हो गए थे।" उनके याचना करने पर शास्ता ने पूर्व जन्म की बात कही- ख. अतीत कथा : पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व अमात्यकुल में पैदा हो बड होने पर उस राजा के अर्थधर्मानुशासक हुए। उस राजा के एक अमात्य ने रनिवास दूषित किया। राजा ने उसका ठीक ठीक पता लगा सोचा-अमात्य भी मेरा बहुत उपकारी है। वह स्त्री भी प्रिया है। मैं इन दोनो को नष्ट नहीं कर सकता। पण्डित-अमात्य से प्रश्न पूछकर १६

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२६० [ २.५.१६५ यदि सहन करने योग्य होगा तो सहन कर लूंगा; नही सहन करने योग्य होगा तो नही सहन करूँगा।" उसने बोधिसत्त्व को बुला, आसन दे पूछा— "पण्डित ! प्रश्न पूछता हूँ।" "महाराज ! पूछें, उत्तर दूँगा।" राजा ने प्रश्न पूछते हुए यह पहली गाथा कही— पब्बतूपत्थरे रम्मे जाता पोक्खरणी सिवा तं सिगालो अपापासि जानं सीहेन रक्खितं ॥ [ पर्वत के रम्य दामन में सुन्दर पुष्करिणी रही। यह जानते हुए भी कि इसे सिंह ने अपने लिए सुरक्षित रखा है, उसमें शृगाल ने पानी पिया। ] पब्बतूपत्थरे हिमालय पर्वत के दामन में फैले हुए आँगन में जाता पोक्ख- रणी सिवा, शीतल, मधुर जल वाली पुष्करिणी पैदा हुई। कमल से ढकी हुई नदी भी पुष्करिणी ही। अपापासि, अप उपसर्ग है अपासि अर्थ है। जानं सीहेन रक्खितं यह पुष्करिणी सिंह के परिभोग की है, सिंह के द्वारा रक्षित है; उस शृगाल ने यह जानने हुए ही कि यह सिंह द्वारा रक्षित है जल पिया ! तू क्या समझता है ? शृगाल सिंह का भय न मान कर इस प्रकार की पुष्करिणी से जल पिए ? बोधिसत्त्व ने यह समझ कर कि निश्चय से इसके रनिवास को किसी अमात्य ने दूषित किया होगा, दूसरी गाथा कही— पिपन्ति वे महाराज ! सापदानि महानदिं न तेन अनदी होति खमस्सु यदि ते पिया ॥ [ महाराज ! महानदी पर सभी प्राणी जल पीते हैं। उससे नदी अनदी नही होती। यदि वह प्रिया है, तो क्षमा करें। ] सापदानि न केवल गीदड ही किन्तु चीते, कुत्ते, खरगोश, बिल्ले, हिरन आदि सभी प्राणी कमल से ढकी हुई होने के कारण पुष्करिणी कहलाने वाली

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धासाहस्स ] २६१ नदी पर पानी पीते ही हैं। न तेन अनदी होति नदी पर दो पैरो वाले, चार पैरो वाले, साँप-मत्स्य आदि सभी प्यासे पानी पीते हैं। उससे वह न अनदी होती है, न जूठी। क्यों? सब के लिए साधारण होने से। जिस प्रकार नदी जिस किसी के पानी पीने से दूषित नहीं होती, उसी प्रकार स्त्री भी कामुकता के वशीभूत हो अपने पति के अतिरिक्त किसी दूसरे से सहवास करने से अनिस्त्री नहीं होती। क्यों? सब के लिए साधारण होने से। न हि स्त्री जूठी होता है। क्यों? जल-स्नान से शुद्ध हो सकने के कारण। खमस्सु यदि ते पिया, यदि वह स्त्री तुझे प्रिया है तथा वह अमात्य बहुत उपकारी है; उन दोनों को क्षमा कर। उपेक्षावान् हो। इस प्रकार बोधिसत्त्व ने राजा को उपदेश दिया। राजा ने उसका उप- देश मान 'फिर ऐसा पापकर्म न करना' कह दोनों को क्षमा किया। उसके बाद से वह विरत रहे। राजा भी दानादि पुण्य कर्म करते हुए मरने पर स्वर्ग सिधारे। कागल नरेश भी यह धर्मदेशना सुन उन दोनों को क्षमा कर उपेक्षावान् हुआ। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय राजा आनन्द था। पण्डित अमात्य तो मैं ही था। १६६. वालाहस्स जातक "ये न काहन्ति ओवाद..." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय.एक उत्कण्ठित भिक्षु के बारे में कही। क. वर्तमान कथा शास्ता ने उस भिक्षु से पूछा- "क्या तू सचमुच उत्कण्ठित है ?" "सच- मुच" कहने पर पूछा-किस कारण से उत्कण्ठित है ? उसने उत्तर दिया-

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२६२ “एक अलङ्कृत स्त्री को देखकर कामुकता का भाव उत्पन्न हो जाने के कारण शास्ता ने कहा—“भिक्षु ! स्त्रियां अपने रूप, शब्द, गन्ध, रस, स्पर्श र हासविलास से पुरुषो को आसक्त कर, जब उन्हें अपने वश में हुआ सम हैं, तो उनका शील और धन नष्ट कर डालती हैं। इसीसे यह यक्षिणियां लाती हैं। पहले भी यक्षिणियो ने स्त्रियो के हासविलास से एक काफले के जा, व्यापारियो को आकृष्ट कर, अपने वशीभूत कर, फिर दूसरे आदमियो देख पहले के सब आदमियो को मार डाला। और दोनो दाढो से रक्त बः हुए, उन्हें मुरमुरे की तरह खा डाला।” इतना कह शास्ता ने पूर्व-जन्म कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्वं काल में ताम्रपर्णी द्वीप में सिरीसवत्थु नाम का यक्षो का नगर थ जहाँ यक्षिणियां रहती थी । जिन व्यापारियो की नौकाएँ टूट जाती, उ आने पर वे सजसजा कर खाद्य भोज्य लिवा, दासियो से घिरी हुई तथा में बच्चो को उठाए व्यापारियो के पास जाती । उन पर यह प्रगट करने लिए कि वे मनुष्य-निवास से आए है, जहाँ तहाँ कृषि, गोरक्षा आदि क हुए आदमी, गौएँ कुत्ते आदि दिखाती। व्यापारियो के पास जाकर कहती- यह यवागू पीएँ । भोजन करें । खाद्य खाएँ। व्यापारी न जानने के का उनका दिया खा लेते । उनके खा-पीकर विश्राम करने के समय उनसे कुशल क्षेम पूछती—“ कहाँ के रहने वाले हे ? कहाँ से आए हैं ? कहाँ जाएँगे ? यहाँ किस का से आए ?” वे कहते कि नौका टूट जाने के कारण इधर आये। तब वे कहती- “आर्यो ! अच्छा ! हमारे स्वामियो को भी नौका पर चढ कर गए वर्ष हो गए। वे मर गए होगे। आप लोग भी व्यापारी ही है। हम आप चरण-सेविकाएँ होकर रहेगी।” इस प्रकार वे उन व्यापारियो को स्त्रियो के हासविलास से आसक्त यक्ष-नगर ले जाती। यदि पहले से पकडे हुए आदमी (अभी जीवित) हो तो उन्हें जादू की जंजीर से बाँध कारा-गृह में डाल देती। जब उन्हें अ निवास-स्थान पर ऐसे आदमी जिनकी नौकाएँ टूट गई हो, न मिलते तो उ

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यालाहस्स ] २६३ कल्याणि (नदी) और इधर नाग द्वीप—इन दोनो के बीच में समुद्र तट पर घूमती। यही उनका स्वभाव था। एक दिन पाँच सौ ऐसे व्यापारी जिनकी नौकाएँ टूट गई थी, उनके नगर के पास उतरे। वे उनके पास गईं और उन्हें लुभा कर यक्ष-नगर ला पहले जिन आदमियो को पकड़ा था, उन्हे जादू की ज़जीर में बांध कारा-गृह में डाल दिया। ज्येष्ठ यक्षिणी ने ज्येष्ठ व्यापारी को शेष यक्षिणियो ने शेष व्यापारियो को, इस प्रकार उन पाँच सौ यक्षिणियो ने पाँच सौ व्यापारियो को अपना पति बनाया। वह ज्येष्ठ यक्षिणी रात को जिस समय व्यापारी सोए रहते उठ कर जा कारा-गृह मे आदमियो को मार उनका मास खाकर आती। बाकी भी उसी तरह करती। ज्येष्ठ यक्षिणी जिस समय मनुष्य-मास खाकर लौटती उसका शरीर ठंडा होता। ज्येष्ठ व्यापारी ने उसका स्पर्श किया तो उसे पता लगा 'कि यह यक्षिणी है। उसने सोचा यह पाँच सौ भी यक्षिणियां ही होगी। हमें भागना चाहिए। अगले दिन प्रात काल ही मुंह धोने जाकर उसने बाकी व्यापारियो को कहा—"यह मानवी नही है। यह यक्षिणियां है। दूसरे नौका-टूटे व्यापारियो के आने पर उन्हें स्वामी बना हमें खा डालेंगी। हम यहाँ से भागें।" उनमें से ढाई सौ बोले—"हम इन्हे नही छोड़ सकते। तुम जाओ। 'हम नही भागगे।" ज्येष्ठ व्यापारी अपनी बात मानने वाले ढाई सौ जनो को ले उनसे डर कर भाग गया। उस समय बोधिसत्त्व बादल-अश्व की योनि में पैदा हुए थे। सारा रग श्वेत । सिर कौए जैस। बाल मूंज के से। ऋद्धिमान। आकाशचारी। वह हिमालय से आकाश में चढ कर ताम्रपर्णी द्वीप जा वहाँ ताम्रपर्णी तालाव के कीचड मे अपने से उगे हुए धान खाकर लौटता। इस प्रकार जाते हुए वह दया से प्रेरित हो तीन बार मानुषी-वाणी बोलता—"कोई जनपद जाने वाला है ? कोई जनपद जाते वाला है?" उन्होने उसकी बात सुन, पास जा हाथ जोड कर कहा—"स्वामी ! हम नपद जाएँग।' ४

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२६४ [ २.५.१६६

"तो मेरी पीठ पर चढो।" कुछ चढे। कुछ ने पूँछ पकड़ी। कुछ हाथ जोडे खडे ही रहे। बोधिसत्व अपने प्रताप से सभी ढाई सौ व्यापारियो को, जो हाथ जोडे खडे थे उन तक को जनपद ले गए। वहाँ उन्हे उन उनके स्थान पर पहुँचा स्वय अपने निवास- स्थान को गए। वह यक्षिणियाँ भी औरो के आने पर उन ढाई सौ व्यापारियो को जो पीछे रह गए थे मार कर खा गईं। शास्ता ने भिक्षुओ को सम्बोधन कर कहा—"भिक्षुओ, जैसे उन यक्षि- णियो के वशीभूत हुए व्यापारी विनाश को प्राप्त हुए। बादल अश्व-राज का कहना मानने वाले अपने अपने स्थान पर पहुँच गए। इसी प्रकार बुद्धों के उपदेश के अनुसार न चलने वाले भिक्षु, भिक्षुणियों तथा उपासक और उपासिकाएँ भी चारों नरको तथा पाँच प्रकार के बन्धन, दण्ड आदि से महान् दुःख को प्राप्त होते हैं। उपदेश मानने वाले तीन कुल-सम्पत्तियों,¹ छ काम- स्वर्ग तथा बीस ब्रह्मलोको को प्राप्त हो, अमृत महानिर्वाण को साक्षात कर महान् सुख का अनुभव करते हैं।" अभिसम्बुद्ध होने पर यह गाथाएँ कही— ये न काहन्ति ओवाद नरा बुद्धेन देसित, व्यसन ते गमिस्सन्ति रक्खसीहिव वाणिजा ॥१॥ ये च काहन्ति ओवाद नरा बुद्धेन देसित, सोत्थि पारङ्गमिस्सन्ति वालाहेनेव वाणिजा ॥२॥ [ जो बुद्ध के उपदेश के अनुसार आचरण नही करते थे उसी तरह दुःख को प्राप्त होते हैं जैसे राक्षसियो द्वारा व्यापारी। जो बुद्ध के उपदेश के अनुसार चलते हैं वे उसी तरह सकुशल पार पहुँच जाते हैं जैसे बादल (के अश्व) की सहायता से व्यापारी।] ये न काहन्ति जो नहीं करेगे। व्यसन ते गमिस्सन्ति, वे महान् दुःख को प्राप्त होगे। रक्खसीहीव वाणिजा राक्षसिंयो द्वारा लुभाए गए व्यापारियो की तरह। सोत्थि पारङ्गमिस्सन्ति बिना किसी विघ्न के निर्वाण को प्राप्त


¹ ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य।

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर जातक

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मित्तामित्त ] २६५ धरेंगे। वालाहेनेय वाणिजा यादत के घोडे के 'श्रामो' कहने पर उसरा कहना मानने वाले व्यापारियों की तरह। जैसे वह समुद्र पार जाकर अपने अपने स्थान पर पहुँच गए; उसी प्रकार बुद्धो या उपदेश मानने वाले संसार को पार कर निर्वाण को प्राप्त होते है। अमृत महानिर्वाण से धर्मदेशना को समाप्त किया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर उत्कण्ठित-चित्त भिक्षु स्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ। और भी बहुतो को स्रोतापत्ति, सकृदागामी, अनागामी तथा अर्हत् फल प्राप्त हुआ। उस समय बादल अश्व-राज था। कहना मानने वाले ढाई सौ व्यापारी बुद्ध-परिषद थे। बादल अश्व-राज तो मैं ही था। १६७. मित्तामित्त जातक “न नं उम्हयते दिस्वा....” यह शास्ता ने श्रावस्ती में विहार करते समय एक भिक्षु के बारे में कही— क. वर्तमान कथा एक भिक्षु ने यह समझ कि मेरे ले लेने पर मेरा उपाध्याय बुरा नही मानेगा, विश्वास कर उसके रखे हुए एक वस्त्र-खण्ड को ले उससे जूता रखने की थैली बना ली। पीछे उपाध्याय को कहा। उपाध्याय ने पूछा—"क्यो लिया ?” “मेरे लेने से आप क्रोधित नहीं होंगे; आपका ऐसा विश्वास करके।”

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२६६ [ २.५.१६७

उपाध्याय ने क्रोध से उठकर पीटा—'तेरा मेरा विश्वास क्या है ?" उसकी वह करनी भिक्षुओ में प्रकट हो गई। एक दिन भिक्षुओ ने धर्म- सभा में बातचीत चलाई—"आयुष्मानो ! अमुक तरुण-भिक्षु ने उपाध्याय का विश्वास कर वस्त्र-खण्ड ले उससे जूता रखने की थैली बनाई। उपाध्याय ने 'तेरा मेरा क्या विश्वास हैं' कह क्रोध से उठकर पीटा। शास्ता ने आकर पूछा—"भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?" "अमुक बातचीत।" "भिक्षुओ, यह भिक्षु न केवल अभी अपने शिष्य का अविश्वासी है, पहले भी अविश्वासी ही था।" इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व काशी देश मे ब्राह्मण-कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर ऋषियो के प्रव्रज्या-क्रम से प्रव्रजित हो अभिज्ञा तथा समापत्तियाँ प्राप्त कर गण के नेता हो वह हिमालय-प्रदेश मे रहने लगे। उन ऋषियो के समूह में एक तपस्वी था, जो बोधिसत्त्व का कहना न मान एक हाथी के बच्चे को जिसकी माँ मर गई थी, पालता था। बडे होने पर वह उस तपस्वी को मार जगल में चला गया। उसका शरीर-कृत्य कर ऋषियो ने बोधिसत्त्व को घेर कर पूछा—"भन्ते ! मित्र या अमित्र कैसे पहचाना जा सकता है ?" बोधिसत्त्व ने 'इस इस बात से' कहते हुए यह गाथा कही— न नं उम्हयते दिस्वा न च नं पटिनन्दति चक्खूनि चस्स न ददाति पटिलोमञ्च वत्तति ॥१॥ एते भवन्ति आकारा अमित्तस्मि पतिट्ठिता येहि अमित्तं जानेय्य दिस्वा सुत्वा च पण्डितो ॥२॥

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राध ] २६७ करता है; और उलटा बर्तता है। ये अमित्र के रगढग हैं, उन्हें देख सुनकर पण्डित आदमी को अपने अमित्र को पहचानना चाहिए।] न नं उम्हयते दिस्वा जो जिसका अमित्र होता है वह उसे देख कर न मुस्कराता है, न हँसता है; प्रसन्नकार प्रदर्शित नही करता। न च नं पटि- नन्दति उसकी बात सुनकर उसे आनन्द नहीं होता, 'अच्छा' कहा है, 'सुभाषित हैं' (कह) अनुमोदन नहीं करता। चक्खूंनि चस्स न ददाति, आंख से आँख मिलाकर सामने नही देखता, आंख दूसरी ओर ले जाता है। पटिलोमञ्च वत्तति, उसका काय-कर्म अथवा वाणी का कर्म भी उसे अच्छा नहीं लगता; विरोधी-भाव ही ग्रहण करता है। आकारा, बातें। येहि अमिरत्तं जिन बातो से वे बातें। दिस्वा च सुत्वा च पण्डितो आदमी को चाहिए कि पहचान करे कि यह मेरा अमित्र है। इससे विरुद्ध बातो से मित्र-भाव जानना चाहिए। इस प्रकार बोधिसत्व मित्र तथा अमित्र के लक्षण कह ब्रह्मविहारो की भावना कर ब्रह्मलोकगामी हुए। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय हाथी को पालने वाला तपस्वी शिष्य था। हाथी उपाध्याय था। ऋषिगण बुद्ध-परिषद थी। गण का नेता तो में ही था। १६८. राध जातक¹ "पयासा आगतो तात...." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय एक उत्कण्ठित चित्त भिक्षु के बारे मे कही। ¹ राधजातक (१४५)

क. वर्तमान कथा

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२६८ [ २.४.१६८ क. वर्तमान कथा शास्ता ने पूछा-"भिक्षु, क्या तू सचमुच उत्कण्ठित है ?" "भन्ते ! सचमुच।" "किस कारण से ?" "एक अलङ्कृत स्त्री को देखकर कामुकता के कारण।" "भिक्षु, स्त्री की जाति की संभाल नही की जा सकती। पूर्व समय में द्वारपाल रखकर हिफाजत करने वाले भी हिफाजत नहीं कर सके। तुझे स्त्री से क्या ? मिलने पर भी उसकी हिफ़ाज़त नही की जा सकती।" इतना कह शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही- ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसो में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व तोते की योनि में पैदा हुए। उसका नाम था राध। उसके छोटे भाई का नाम था पोट्ठपाद। उन दोनो को ही, जब वह छोटे ही थे एक चिड़ीमार ने पकड़ कर वाराणसी के एक ब्राह्मण को दिया। ब्राह्मण ने उन्हें पुत्र की तरह पाला। उसकी ब्राह्मणी दुश्चारिणी थी, उसकी हिफाजत नही 'की जा सकती थी। ब्राह्मण ने व्यापार करने के लिए जाते समय उन तोते-बच्चो को बुलाकर कहा-"तात ! में व्यापार के लिए जाता हूँ। समय असमय तुम अपनी माता की करनी पर नजर रखना। दूसरे आदमी का अन्दर आना जाना देखना।" इस प्रकार वह उन तोते-बच्चों को ब्राह्मणी सौंप कर गया। वह उसके बाहर जाने के समय से ही अनाचार करने लगी। रात को भी, दिन को भी आने जाने वालो की सीमा न रही। उसे देख पोट्ठपाद ने राध से कहा- "ब्राह्मण इस ब्राह्मणी को हम सौंप कर गया। यह पाप-कर्म करती है। मैं इसे मना करूँ?" राध न कहा- "मत बोल।" वह उसका कहना न मान बोला- "अम्ब ! तू पापकर्म किस लिए करती है ?" उसने उसे मार डालने की इच्छा से कहा- "तात ! तू मेरा पुत्र है। अब से न करूंगी। जरा, यहाँ आ।" इस प्रकार प्यार करती हुई की तरह

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राय ] २६१ उसे बुझाकर, झाने पर पटक दिया। फिर 'तू मुझे उपदेश देता है। अपनी हैसियत नहीं देखता ?' वह, गरदन मरोड मारकर चूल्हे में फेंक दिया। ब्राह्मण ने लौट कर, विश्राम से बोधिसत्त्व से कहा—"तात राय ! तुम्हारी माता भ्रष्टाचार करती थी या नहीं करती थी ?" पूछते हुए यह पहली गाथा कही— पवासा आगतो तात ! इदानि न चिरागतो, कच्चिन्नु तात ! ते माता न अञ्ञमुपसेवति ॥ [ तात ! मैं अब प्रवास से लौट आया हूँ। मैं अभी आ रहा हूँ। तात ! क्या तेरी माता दूसरे पुरुष का सेवन करती थी ? ] मैं तात पवासा आगतो, यह मैं अभी आया हूँ। न चिरागतो, इसीसे समा- चार न जानने के कारण पूछता हूँ। कच्चिन्नु तात ते माता अञ्ञं पुरुष को न उपसेवति ? राय ने 'तात ! पण्डित सत्य या असत्य असत्यानाकार बात कभी नहीं कहते' प्रकट करते हुए दूसरी गाथा कही— न खो पनेतं सुभणं गिरं सच्चमसङ्कितं, शयेय पोट्ठपादोव मुम्मुरे उपकूलितो ॥ [ यह सच्ची बात सुभाषित वाणी नहीं है; बिगरे कहने से पोट्ठपाद की तरह गर्म राख में भुने । ] • गिरं वचन। यथा को ही जैसे अब 'गिरा' कहते हैं वैसे ही तब 'गिरं' कहते थे। तोला-बच्चा सिद्ध का ख्याल न कर ऐसा कहता हूँ। लेकिन इसका अर्थ यह है—तात ! पण्डित लोग सच्ची, यथार्थ, तथ्य-युक्त स्वाभाविक बात भी असत्याकार होने से न सुभणं। असत्याकार सच्ची बात कहने से सयेय पोट्ठपादोव मुम्मुरे उपकूलितो जैसे पोट्ठपाद गरम राख में भुना हुआ सोता है; उस प्रकार सोए। उपकूलितो पाठ का भी यही अर्थ है।

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर जातक

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३०० [ २.५.१६६ इस प्रकार बोधिसत्त्व ब्राह्मण को धर्मोपदेश दे 'मैं भी यहाँ नहीं रह सकता' कह जंगल को गया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। सत्यों (का प्रकाशन) समाप्त होने पर उत्कण्ठित भिक्षु स्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ। उस समय पोट्ठपाद आनन्द था। राध तो मैं ही था। १६६. गहपति जातक "उभयम्मे न खमति...." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय उत्कण्ठित-चित्त के ही बारे में कही। क. वर्तमान कथा यह कथा कहते हुए शास्ता ने 'स्त्री जाति की हिफाजत नहीं की जा सकती। पाप करके जिस किसी उपाय से स्वामी को ठगती ही हैं' कह पूर्व-जन्म की कथा कही। ख. अतीत कथा पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व ने काशी-राष्ट्र के गृहपति-कुल में जन्म ग्रहण कर बड़े होने पर विवाह किया। उसकी भार्या दुराचारिणी थी; गाँव के मुखिया के साथ दुराचार करती। बोधिसत्त्व जानकर परीक्षा करते हुए रहने लगे। उस समय वर्षा काल में बीजों के बह जाने से अकाल हो गया था। खेती

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गहपति ] ३०१ मे दाना पडा। सारे ग्रामवासियो ने मिलकर निश्चय किया कि अब से दो महीने बाद खेत काटकर धान दे देंगे, और गाँव के मुखिया से एक बूढ़ा बैल ले उसका मास खा गए। एक दिन गाँव का मुखिया मौका देख, जिस समय बोधिसत्व बाहर गया था घर में घुसा। उनके सुख से लेटने के समय ही बोधिसत्व ग्राम-द्वार से प्रविष्ट हो घर की ओर हो लिया। ग्राम-द्वार की ओर देखते हुए उस स्त्री ने सोचा, 'यह कौन है ?' फिर देहली पर खडे होकर देखने से जब उसे निश्चय हुआ कि यह वही है, तो उसने मुखिया से कहा। गाँव का मुखिया डर के मारे काँपने लगा। उसने कहा—डर मत। एक उपाय है। हमने तेरा दिया गोमास खाया है। तू मांस का मूल्य उगाहने वाले की तरह हो। मैं कोठे पर चढ काठ के द्वार पर खडी हो कहती हूँ कि धान नहीं है। तू घर के बीच म खडा होकर बार बार उलाहना दे—'हमारे घर मे बच्चे भूखे हैं। मेरे मांस का मूल्य दो।' इतना कह वह कोठे पर चढ कोठे के दरवाजे पर बैठी। मुखिया घर में खडा हो कहने लगा—मांस की कीमत दो। वह कोठे के दरवाजे पर बैठ कहती— धान नहीं है। खेत कटने पर देंगे। जा। बोधिसत्व ने घर में प्रवेश कर उनकी करतूत देख समझ लिया कि इस पापिन ने यह ढग बनाया होगा। उसने गाँव के मुखिया को बुलाकर कहा— "हे ग्राम-भोजक ! हमने तेरे बूढे बैल का मास खाते समय, 'अब से दो महीने बाद धान देंगे' कहकर मास खाया था। अभी आधा महीना भी नहीं गुजरा। तू अभी से क्यो धान लेना चाहता है ? लेकिन तू इस उद्देश्य से नही आया, दूसरे ही उद्देश्य से आया होगा ? मुझे तेरी करतूत अच्छी नही लगती। यह भी दुराचारिणी पापिन जानती है कि कोठे में धान नहीं है। वह अब कोठे पर चढ कहती है—धान नही है। तू भी कहता है—दे। मुझे दोनो की बात अच्छी नही लगती।" इस भाव को प्रकट करते हुए बोधिसत्त्व ने यह गाथाएँ कही— उभयम्मे न खमति उभयम्मे न रुच्चति, या चाय कोट्ठमोतिण्णा न दस्स इति भासति ॥

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३०२ [ २.५.१६६ तं तं गामपति ब्रूमि कदरै अप्पस्मि जीविते, द्वे मासे कारुं कत्वान मंसं जरगवं किसं; अप्पत्तकाले चोदेसि तम्पि मय्हं न रुचति ॥ [दोनो मुझे पसन्द नही; दोनो मुझे अच्छे नही लगते। यह जो कोठे पर चढ़ कहती है—(धान) नही दिखाई देते। हे ग्रामपति ! मै यह कहता हूँ कि जीवन इतना कठिन होने पर भी तू बूढे कृष बैल के मास (के मूल्य) का दो महीने का करार करके समय के पूर्व ही उलाहना देता है। यह भी मुझे अच्छा नही लगा ।] तं तं गामपति ब्रूमि भो । ग्राम के मुखिया इस कारण से यह कहता हूँ। कदरे अप्पस्मि जीविते, हमारा जीवन दुःखी है, जड है, रूक्षा है, न्यून है, अल्प है, मन्द है, परिमित है। इस प्रकार के जीवन के होने पर द्वे मासे कारं कत्वान मंसं जरग्गवं किसं हमारे मास लेते समय बूढा, कृष, दुर्बल बैल देते हुए तूने दो महीने की अवधि बांधी थी कि दो महीने मे मूल्य देना। इस प्रकार करार करके, अवधि बांध कर अप्पत्तकाले चोदेसि, उस समय के आने से पूर्व ही दोष लगाता है। तम्पि मय्हं न रुचति यह जो पापिन दुराचारिणी, कोठे में धान नही है जानती हुई अनजान की तरह कोट्ठमोतिण्णा कोठे के द्वार पर खड़ी हो न दस्सं इति भासति। यह भी और यह जो तू असमय माँगता है तम्पि यह दोनो न मुझे पसन्द है, न अच्छा लगता है। इस प्रकार कहते कहते बोधिसत्व ने गाँव के मुखिया को केशो से पकड़, खींच कर घर के बीच में गिराया। "'मैं गाँव का मुखिया हूँ' समझ दूसरो की रखी, हिफाजत की हुई चीज के प्रति अपराध करता है ?" आदि बातो से धपदाब्द कह, पीट कर, दुर्बल कर, गरदन से पकड़ घर से निकाल दिया। उस दुष्ट स्त्री को भी बेणी से पकड़ कोठे से उतार, पीटते हुए डांटा—"यदि फिर ऐसा करेगी, तो जानेगी ?" उसके बाद से गाँव का मुखिया उस घर की ओर नजर भी नही उठा सका। वह पापिन भी फिर मन से भी दुराचार नही कर सकी।

२००. साधुसील जातक

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साधुसील ] ३०३ शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों को प्रकाशित किया। सत्यों के अन्त में उत्कण्ठित चित्त भिक्षु सोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ। उस समय ग्राम के मुखिया को ठीक करने वाला गृहपति में ही था।

२००. साधुसील जातक

“सरीरदप्प ” यह शास्ता ने जेतवन म विहार करते समय एक ब्राह्मण के बारे में कही।

क वर्तमान कथा

उस ब्राह्मण की चार लड़कियाँ थीं। व चार प्रकार के आदमियों को चाहती थीं। उनमें से एक सुन्दर शरीर वाले को, एक आयु में बड़े को, एक (ऊँची) जाति वाले को और एक सदाचारी को। ब्राह्मण सोचने लगा ' लड़कियों को (पराए) घर भेजते हुए, उनका विवाह करते हुए उन्हें किसे देना चाहिए ? क्या रूपवान् को ? क्या आयु म बड़े को ? क्या जाति में बड़े को अथवा सदाचारी को ? ' जब सोचने पर भी वह कुछ निश्चय न कर सका तो उसने विचार किया कि इस बात को सम्यक् सम्बुद्ध जानेंगे। उन्हें पूछ कर, इन चारों में जिसे देना उचित होगा उसे दूंगा। वह गन्धमाला आदि लिवा कर विहार गया, शास्ता को प्रणाम कर एक ओर बैठा। उसने आरम्भ से सब बात सुना कर पूछा— “भन्ते ! इन चार जनों में से किसे देना उचित है ?” शास्ता ने कहा— “पहले भी पण्डितों ने तेरे इस प्रश्न का उत्तर दिया था। लेकिन वह पूर्व-जन्म की बात होने से तू उसे नहीं जान सकता।” ऐसा कह उसके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही।

ख. अतीत कथा

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३०४ [ २.५.२०० ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व ब्राह्मण-कुल में जन्म ग्रहण कर बड़े हो तक्षशिला गए। वहाँ शिल्प सीख लौट कर वाराणसी में प्रसिद्ध आचार्य्य हुए। एक ब्राह्मण की चार लड़कियाँ थीं। वह इसी प्रकार चार जनो को चाहती थीं। ब्राह्मण ने यह न जानते हुए कि किसे दें सोचा कि आचार्य्य को पूछ कर जिसे देना योग्य होगा, उसीको दूँगा। उसने आचार्य्य के पास जा यह प्रश्न पूछते हुए पहली गाथा कही— सरीरदव्वं वड्ढव्वं सोजच्चं साधु सीलियं ब्राह्मणन्त्वेव पुच्छाम कम्नु तेसं वणिम्हसे ॥ [ शरीर के सौंदर्य्य वाले को, आयु बडी वाले को, जाति बडी वाले को वा सदाचारी को ? हे ब्राह्मण ! तुम्हें पूछते है कि उन्हे किसे दें ? ] सरीरद्वयं आदि से उन चारो में विद्यमान् गुणो का प्रकाशन किया गया है। अभिप्राय यह है—मेरी लडकियाँ चार प्रकार के आदमियो को चाहती हैं। उनमें से एक के पास सरीरदव्वं है, शरीर सम्पत्ति है, सौन्दर्य्य है। एक के पास वढद्वयं वृद्धभाव, ज्येष्ठपन है। एक के पास सोजच्चं अच्छी जाति वाला होना, जाति सम्पत्ति है। सुजच्चं भी पाठ है। एक के पास साधुसीलियं सुन्दर चरित्र वाला होना, सदाचार सम्पत्ति है। ब्राह्मणन्त्वेव पुच्छाम; उनमें से यह अमुक को देनी चाहिए, हम इसका निश्चय न कर सकने के कारण आप ब्राह्मण को ही पूछते हैं। कम्नु तेसं वणिम्हसे उन चार जनो में से किसका वरण करें ? किसकी इच्छा करें ? पूछता हूँ कि वे कुमारियाँ किसे दें ? इसे सुन आचार्य्य ने कहा—"रूप सम्पत्ति आदि विद्यमान रहने,पर भी दु शील निन्दित है। इसलिए वह ठीक नहीं। हमें शीलवान् ही अच्छा लगता है।" इस विचार को प्रकट करने के लिए दूसरी गाथा कही—

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साधुसील ] ३०५ अत्यो अत्यि सरीरम्हि वढव्यस्स नमोकरे, अत्यो अत्यि सुजातम्हि सीलं अस्माकरुच्चति ॥ [ शरीर की भी अपनी विशेषता है, ज्येष्ठ को नमस्कार होता है। सुजात की भी विशेषता है; लेकिन हमें तो शीलवान् अच्छा लगता है।] अत्यो अत्यि सरीरम्हि, रूपवान् शरीर में भी अर्थ, विशेषता, उन्नति होती है। नही होती है, नही कहते। वढव्यस्स नमो करे, ज्येष्ठ को हम नमस्कार ही करते हैं। ज्येष्ठ की ही वन्दना होती है। अत्यो अत्यि सुजातम्हि, सुजात पुरुष की भी उन्नति होती है। जाति-सम्पत्ति भी इच्छा करने ही की चीज़ है। सीलं अस्माकरुच्चति, हमें शील ही अच्छा लगता है। शीलवान्, सदाचारी शरीर-सौन्दर्य से रहित भी पूज्य प्रशंसनीय होता है। ब्राह्मण ने उसकी बात सुन सदाचारी को ही लडकियाँ दीं। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। सत्यों के अन्त में ब्राह्मण स्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ। उस समय ब्राह्मण यही था; प्रसिद्ध आचार्य्य तो मैं ही था।

२०१. बन्धनागार जातक

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\दूसरा परिच्छेद ६. नतंदळ्ह वर्ग २०१. बन्धनागार जातक “न तं दळ्हं बन्धनमाहु धीरा....” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय बन्धनागार के बारे में कही। क. वर्तमान कथा उस समय बहुत से सेंद लगाने वाले, बटमार तथा मनुष्यघातक चोरो को लाकर राजा के सामने पेश किया गया। राजा ने उन्हें बेड़ी से, रस्सी से तथा जंजीर से बँधवा दिया। देहात के तीस भिक्षु शास्ता का दर्शन करने की इच्छा से आए। दर्शन तथा प्रणाम कर चुकने के अगले दिन भिक्षाटन करते हुए वह बन्धनागार पहुँचे। वहाँ चोरों को देख, भिक्षाटन से लौट सन्ध्या के समय शास्ता के पास जा निवे- दन किया—भन्ते ! आज हमने भिक्षाटन करते समय बहुत से चोरो को बेड़ी आदि से बँधे हुए महान् दुःख अनुभव करते देखा। वे उन बन्धनों को काटकर भाग नही सकते। क्या उन बन्धनो से बढकर भी कोई बन्धन है ? शास्ता ने कहा—भिक्षुओ, यह क्या बन्धन है ? यह जो धन-धान्य-पुत्र तथा दारा आदि के प्रति तृष्णा रूपी बन्धन हैं, यह इन बन्धनों से सौ गुणा, हजार गुणा कड़ा बन्धन है। इस प्रकार के अत्यन्त कठिनाई से टूटने वाले महान् बन्धन को भी, पुराने पण्डितो ने तोड कर हिमालय में प्रवेश कर प्रव्रज्या ग्रहण की। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—

ख. अतीत कथा

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=] बन्धनागार ] ख. अतीत कथा पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व एक दरिद्र गृहस्थ के घर में पैदा हुआ। उसके बड़े होने पर पिता मर गया। वह नौकरी करके माता को पालने लगे। उसके अनिच्छा प्रकट करने पर भी उसकी माँ ने उसे एक लड़की ला दी और स्वयं मर गई। उसकी भार्या की कोख में गर्भ रह गया। उसे न मालूम था कि भार्या की कोख में गर्भ है। उसने कहा—'भद्रे ! तू नोक- चाकरी करके अपना पालन पोषण कर, मैं प्रव्रजित होऊँगा। उसने उत्तर दिया—मेरी कोख में गर्भ है। बच्चों को देख कर प्रव्रजि- होना । बोधिसत्त्व ने 'अच्छा' कह स्वीकार किया और उसके बच्चे को जन्म देने पर पूछा—भद्रे ! तूने कुशलपूर्वक बच्चे को जन्म दिया। अब मैं प्रव्रजित होऊँ ? उसने कहा कि जब तक बच्चा स्तन का दूध पीता है, तब तक प्रतीक्ष- करें। इस बीच में वह फिर गर्भवती हो गई। उसने सोचा इसकी रजामन्द- से जाना न हो सकेगा, इसे बिना कहे ही भाग कर प्रव्रजित होऊँगा। वह बिना कहे ही रात को उठकर भाग गया। उसे नगर रक्षको ने पकड़ा। बोधि- सत्त्व ने कहा—'स्वामी ! मैं 'माँ का पोषण करन वाला' हूँ। मुझे छोड़ दें उनसे अपने आपको छुड़ा एक स्थान पर ठहर, मुख्य द्वार से ही निकल बोधिसत्त्व ने हिमालय में प्रवेश किया। वहाँ ऋषियों के प्रव्रज्या क्रम के अनुसार प्रव्रजित हो अभिज्ञा तथा समापत्तियाँ प्राप्त कर ध्यान क्रीडा में रत हो रहने लगा। वहाँ रहते हुए 'ऐसे दुष्करता से तोडे जा सकने वाले पुत्र-दारा के प्रति आसक्ति के बन्धन को भी तोड़ते हैं' उल्लास-वाक्य कहते हुए उसने यह गाथा कही— न तं दळ्हं बन्धनमाहु धीरा, यदायसं दारुज बब्बजञ्च, सारत्तरत्ता मणिकुण्डलेसु, पुत्तेसु दारेसु च या अपेक्खा ॥