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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

इतना कह राजा के प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही—

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१४० [ २ । १५१ हुए चार अगत्तियों¹ से बचकर दस राजधर्मों से विरुद्ध न जा धर्मानुसार राज्य करते हुए स्वर्ग-मार्ग को भरनेवाले हुए। इतना कह राजा के प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व उसकी पटरानी की कोख में रह गर्भ की सम्यक् रक्षा होने पर माता की कोख से बाहर निकले। नाम-करण के दिन उसका नाम ब्रह्मदत्तकुमार ही रक्खा गया। क्रम से बढ़ते हुए सोलह वर्ष की आयु होने पर वह तक्षशिला जाकर सब शिल्पों में निष्णात हो पिता के मरने पर राजा हो धर्म से तथा न्याय से राज्य करने लगा। राग आदि के वशीभूत न हो वह मुकद्दमो का फैसला करता। उसके धर्म से राज्य करने से आमात्य भी धर्म से ही व्यवहारो (=मुकद्दमो) का फैसला करते। मुकद्दमो का धर्म से फैसला होने के कारण झूठे मुकद्दमे करनेवाले भी नही रहे। उनके न होने से राजाङ्गण में मुकद्दमे करनेवालो का शोर नही होता था। आमात्य सारा दिन न्यायालय में बैठे रहकर भी जब किसी को मुकद्दमा लिए आता न देखते तो उठकर चले जाते। न्यायालय खाली कर देने योग्य हो गए। बोधिसत्त्व सोचने लग कि मेरे धर्मानुसार राज्य करने के कारण मुकद्दमा करने वाले नही आते। शोर नही होता। न्यायालय छोड़ने योग्य हो गए। अब मुझे अपने दुर्गुणो की खोज करनी चाहिए। जब मुझे यह पता लग जाएगा कि यह यह मेरे दुर्गुण है तो उन्ह छोड़कर गुणवान बनकर ही रहूँगा। उसके बाद से वह खोजने लगे कि कोई मेरे दोष कहने वाला है ? उस महल के अन्दर कोई ऐसा नही मिला जो उनके दोष कहे। जो मिला प्रशसा करने वाला ही मिला। 'यह मेरे भय से भी केवल मेरी प्रशंसा ही करते होगे' सोच महल के बाहर रहने वाला की परीक्षा की। यहाँ भी कोई न मिला, तो नगर के अन्दर खोज की। नगर के बाहर चारो दरवाजा पर स्थित गाँवो में ¹छन्द, द्वेष, भय तथा मोह के वशीभूत हो पक्षपात करना।

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राजोवाद ] १४१ राजा। वहाँ भी कोई दोष कहने वाला न मिला। प्रशंसा ही सुनने को मिली। तब बोधिसत्व ने जनपद में खोजने का निर्णय किया। आमात्यों को राज्य संभाल यह रथ पर चढ़ केवल सारथि को साथ ले भेष बदल नगर से निकला। जनपद में खोजते हुए वह राज्य की सीमा तक चला गया। जब वहाँ भी उसे कोई दोष दिखाने वाला नहीं मिला, प्रशंसा ही सुनाने वाले मिले तो प्रत्यन्त-देश¹ की सीमा पर से महामार्ग से नगर की ओर लौटा। उसी समय मल्लिक नाम का कोशल-नरेश भी धर्म से राज्य करता हुआ अपने दोष कहने वाले को ढूंढने के लिए निकला था। जब उसे महल में अन्दर रहने वालों आदि में कोई दोष कहनेवाला नहीं मिला, प्रशंसा करने वाले ही मिले तो वह जनपद म खोजता हुआ वहाँ पहुँचा। ये दोनों गाड़ियों के एक नीचे रास्ते पर आमने सामने हुए। रथों के लिए एक दूसरे को गुजरने देने की जगह नहीं थी। मल्लिक राजा के सारथि ने वाराणसी राजा के सारथि से कहा—अपने रथ को लौटा ले। वाराणसी राजा के सारथि ने कहा—तू अपने रथ को लौटा ले। मेरे रथ म वाराणसी राज्य के स्वामी महाराज ब्रह्मदत्त बैठे हैं। दूसरे ने भी कहा—इस रथ में कोशल राज्य के स्वामी मल्लिक महाराज बैठे हैं। तू अपने रथ को मोड़ कर हमारे राजा के रथ को जगह दे। वाराणसी राजा के सारथि ने सोचा—यह भी राजा है। अब क्या करना चाहिए? उसे एक उपाय सूझा कि राजा की आयु पूछकर जो आयु में छोटा होगा उसका रथ लौटवाकर जो बड़ा होगा उसके रथ के लिए जगह कर- वाऊँगा। ऐसा निश्चय कर उसने दूसरे सारथि से कोशल राजा की आयु पूछी। मिलान करने पर दोनों राजा समान आयु वाले निकले। फिर राज्य-विस्तार, सेना, धन, यश, जाति, गोत्र, कुल-भेद आदि के बारे में पूछा। दोनों तीन तीन सौ योजन राज्य के स्वामी निकले। दोनों की सेना, धन, यश, जाति, गोत्र तथा कुल-भेद सब एक सदृश था। तब सोचा जो अधिक शीलवान् होगा उसे ¹ राज्य-सीमा के बाहर।

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१४२ [ २.१-१५१ जगह दी जायगी। उसने पूछा—सारथि ! तुम्हारे राजा का सदाचार कैसा है ?” उसने अपने राजा के दुर्गुणो को भी गुण बताते हुए कहा कि हमारे राजा में यह गुण है, यह गुण है, और यह गाथा कही— दळ्ह दळ्हस्स खिपत्ति मल्लिको मुदुना मुदु साधुम्पि साधुना जेति असाधुम्पि असाधुना, एतादिसो अय राजा मग्गा उय्याहि सारथि ॥ [ मल्लिक कठोर के साथ कठोरता का व्यवहार करता हैं, कोमल के साथ कोमलता का। भले आदमी को भलाई से जीतता हैं, बुरे को बुराई से। सारथि ! यह राजा ऐसा हैं। तू मार्ग छोड़ दे। ] दळ्ह दळ्हस्स खिपत्ति, जो बहुत कठोर होता हैं उसे कठोर वचन से वा प्रहार से ही जीतना चाहिए। ऐसे आदमी के प्रति यह कठोर व्यवहार करता है अथवा कठोर वचन का प्रयोग करता है। इस प्रकार कठोर होकर ही उसे जीतता हैं—यही प्रकट करता है। मल्लिको, उस राजा का नाम हैं। मुदुना मुदूं, कोमल स्वभाव वाले को स्वयं भी कोमल होकर जीतता हैं। साधुम्पि साधुना जेति असाधुम्पि असाधुना, जो सज्जन है, उनके प्रति स्वयं भी सज्जन बनकर उन्हें सज्जनता से और जो दुर्जन है उनके प्रति स्वयं भी दुर्जन बनकर उन्हें दुर्जनता से जीतता है। एतादिसो अय राजा, इस हमारे कोशल राजा का ऐसा सदाचरण है। मग्गा उय्याहि सारथि, अपने रथ को लौटाकर छोटे रास्ते से जा। हमारे राजा को रास्ता दे। तब वाराणसी राजा के सारथि ने पूछा—"भो ! क्या तुमने अपने राजा के गुण कह लिए ?” “हाँ।” "यदि यही गुण हैं, तो अवगुण कैसे होते हैं ?” "अच्छा ! यह अवगुण ही सही। तुम्हारे राजा में कौन से गुण हैं ?” "अच्छा तो सुनो" कह दूसरी गाथा कही—

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राजोवाद ] १४३ अक्कोधेन जिने कोधं, असाधुं साधुना जिने जिने कदरियं दानेन सच्चेन अलिकवादिनं, एतादिसो अयं राजा मग्गा उय्याहि सारथि¹ ॥ [ क्रोधी को अक्रोध से जीतता है। बुरे को भलाई से। कंजूस को दान से। झूठे को सत्य से। यह राजा ऐसा है। इसलिए सारथि ! तू मार्ग छोड़ दे। ] एतादिसो, इन अक्कोधेन जिने कोध आदि कहे गए गुणों से युक्त। यह क्रोधी आदमी को स्वयं शान्त रहकर अक्रोध को जीतता है। असाधु को स्वयं भला होकर साधुता से। कदरियं, अत्यन्त कंजूस को स्वयं दाता बनकर दान से। अलिक वादिन, झूठ बोलनेवाले को स्वयं सत्यवादी बनकर। सच्चेन जिनाति मित्र सारथि ! मार्ग से हट जा। इस प्रकार के सदाचार से युक्त हमारे राजा को मार्ग दे। हमारा राजा ही मार्ग पाने के योग्य है। ऐसा कहने पर मल्लिक राजा तथा उसके सारथि, दोनों ने उतर कर, घोड़ों को खोल रथ को हटा वाराणसी के राजा को मार्ग दिया। वाराणसी राजा ने मल्लिक राजा को उपदेश दिया कि राजा को यह यह करना चाहिए ! फिर वाराणसी जा वहाँ दानादि पुण्य-कर्म करके जीवन समाप्त होने पर स्वर्ग- मार्ग ग्रहण किया। मल्लिक राजा ने भी उसका उपदेश ग्रहण कर जनपद में जा अपने दोष बताने वाले को बिना खोजे ही अपने नगर पहुँच दानादि पुण्य-कर्म करके स्वर्ग को प्रयाण किया। शास्ता ने कोशल-नरेश को उपदेश देने के लिए यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय मल्लिक राजा का सारथि मोग्गल्लान था। राजा आनन्द था। वाराणसी राजा का सारथि सारिपुत्र था। राजा तो मैं ही था। ¹ धम्मपद (१७।३)।

१५२. सिगाल जातक

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१४४ [ २ । १५२ १५२. सिगाल जातक “असमेक्खित कम्मन्त....” यह शास्ता ने कूटागार शाला में रहते समय वैशाली निवासी एक नाई के लड़के के बारे में कही— क. वर्तमान कथा उसका पिता राजाओ, रानियो, राजकुमारो तथा राजकुमारियो की हजामत बनाता, केश ठीक करता, शतरज¹ बिछाता तथा और भी सभी कार्य्य करता था। वह श्रद्धावान था। उसने बुद्ध धर्म तथा सघ की शरण गही थी। वह पञ्चशीलो की रक्षा करता था। बीच बीच में वह शास्ता का धर्मोपदेश सुनता हुआ, अपना समय व्यतीत करता था। एक दिन वह राजा के यहाँ काम करने जाते समय अपने पुत्र को साथ ले गया। पुत्र ने वहाँ एक देवप्सरा सदृश सजी हुई लिच्छवि कुमारी को देखा। वह उस पर आसक्त हो गया। पिता के साथ राजभवन से लौटने पर उसने कहा कि यह कुमारी मिलेगी तो बचूँगा, नही तो यही मेरा मरण होगा। इतना कह वह खाना पीना छोड़ चारपाई पर पड रहा। उसके पिता ने पास आकर कहा—तात ¹ अनधिकार इच्छा मत कर। तू नाई का लडका है। तेरी जाति छोटी है। लिच्छवि कुमारी क्षत्री की लडकी है। ऊँची जाति वाली। वह तेरे लिए योग्य नही है। तेरे लिए तेरी समान जाति और गोत्र की कोई दूसरी लडकी ला दूँगा। उसने पिता का कहना नहीं माना। उसके माता, भाई, बहन, चाची, चाचा ¹ दोनो ओर आठ आठ मोहरों के स्थान होने से शतरंज का पुराना नाम अट्ठपद है।

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सिगाल ] १४५ सभी रिश्तेदारो तथा मित्रो आदि ने समझाने की कोशिश की । वे नही समझा सके । वह वही सूख सूख कर मर गया । उसका पिता शरीर का दाह-कर्म आदि कृत्य करके जब शोक कम हुआ तो शास्ता की वन्दना करने की इच्छा से बहुत सा गन्ध-माला-लेप आदि ले महावन पहुँच शास्ता की पूजा कर, प्रणाम कर एक ओर बैठा । शास्ता ने पूछा— “उपासक ! क्यो इन दिनो दिखाई नही देता ?” उसने वह हाल कहा । शास्ता बोले—“उपासक ! तेरा लडका केवल अभी अनधिकार इच्छा करके विनाश को प्राप्त नही हुआ, पहले भी हुआ है ।” उपासक के प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व जन्म की बात कही—

ख. अतीत कथा

पूर्व काल मे वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व हिमालय-प्रदेश मे सिंह होकर पैदा हुए । उनसे छोटे छ भाई थे और एक बहन थी । सभी काञ्चन-गुफा में रहते थे । उस गुफा से थोडी ही दूर रजत पर्वत पर एक स्फटिक गुफा थी । उसमें एक सियार रहता था । समय गुजरने पर उन सिंहो के माता पिता मर गए । वह अपनी बहन सिंह बच्ची को गुफा में छोड जाते और स्वय शिकार के लिए बाहर निकल मास ला कर उसे देते । वह सियार उस सिंह बच्ची को देखकर उस पर आसक्त हो गया । उसके माता पिता जब थे, तब तो उसे अवसर न मिलता था । अब इन सातो जनों के शिकार के लिए चले जाने पर स्फटिक गुफा से उतर काञ्चन-गुफा के द्वार पर जा सिंह बच्ची के सामने इस प्रकार कुछ लौकिक ढंग की गुप्त बातचीत कहता— ‘सिंह की बच्ची ! में भी चौपाया हूँ। तू भी चौपाया है । तू मेरी भार्या बन । मे तेरा पति बनूंगा । हम मिलकर प्रसन्नता पूर्वक रहेंगे । अब से तू मेरी प्रेमिका हो जा ।” वह उसकी बातचीत सुन सोचने लगी— “यह सियार चौपायो म सबसे निचले दर्जे का निकृष्ट प्राणी है, वैसे ही जैसे चाण्डाल । हम उत्तम राजकुल के है। यह मुझसे असभ्य अनुचित बात १०

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१४६ [ २.१.१५२ चीत करता है। मैं इस प्रकार की बात चीत सुनकर जीकर ही क्या करूंगी ? सांस रोक कर मर जाऊँगी।" फिर उसने सोचा— "मेरा इस प्रकार यूँ ही मरना ठीक नही। मेरे भाई आते हैं। उन्हें कहकर मरूँगी।" सियार को भी जब उसकी ओर से कोई उत्तर न मिला तो उसने सोचा यह मुझसे सम्बन्ध नही करेगी। वह अफसोस करता हुआ स्फटिक गुफा में जाकर पड रहा। एक सिंह बच्चा भैस वा हाथो में से किसी को मार मास खा, बहन का हिस्सा लाकर बोला—"मांस खा।" "भाई ! में मांस नही खाऊँगी। में मरूँगी।" "क्यो ?" उसने वह हाल कहा। "अब वह सियार कहाँ है ?" उसने स्फटिक गुफा में पड़े हुए सियार को आकाश में हूँ समझा और बोली—"भाई ! क्या नही देखते हो ? यह रजत पर्वत पर आकाश में स्थित है।" सिंह बच्चा नही जानता था कि वह स्फटिक गुफा में लेटा है। उसने उसे आकाश में लेटा हुआ समझ सोचा "इसे मारूँगा" घोर सिंह-वेग के साथ उछल कर, स्फटिक गुफा पर छाती से चोट की। उसका हृदय फट जाने से वह मर कर वही गिर पड़ा। तब दूसरा आया। उसने उसे भी वैसा ही कहा। उसने भी वैसा ही किया और मरकर पर्वत के नीचे गिर पड़ा। इस प्रकार छओ भाइयो के मरने पर सबसे अन्त में बोधिसत्त्व आए। उसने उन्हें भी वह हाल कहा और यह पूछने पर कि अब वह कहाँ है बताया कि यह रजत पर्वत पर आकाश में लेटा है। बोधिसत्त्व ने सोचा—सियार आकाश में नहीं ठहर सकते। यह स्फटिक गुफा में पड़ा होगा। वे पर्वत के नीचे उतरे तो देखा कि छओ भाई मरे पड़े हैं। वे समझ गए कि अपनी मूर्खता के कारण विचार न कर सकने के कारण स्फिटल-

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सिगाल ] १४७ गुफा न जानने से उसी से हृदय टकराकर मरे होगे । 'बिना विचारे जल्दबाजी करने वालो का काम ऐसा ही होता है' कह पहली गाथा कही— असमेक्खितकम्मन्तं तुरिताभिनिपातिनं, सानि कम्मानि तप्पेन्ति उन्हं बज्झोहितं मुखे ॥ [जो आदमी बिना विचारे जल्दबाजी में काम करता है, उसके वह काम ही उसे तपाते हैं; जैसे मुंह मे डाला हुया गर्म भोजन ।] असमेक्खितकम्मन्तं तुरिताभिनिपातिनं, जो आदमी जिस काम को करना चाहता है, यदि वह उसके दोषो का ख्याल न कर, उन पर विचार न कर जल्दबाज होकर जल्दी मे ही उस काम को करने को तैयार होता है, कूद पडता है, लग जाता है, उस बिना विचारे जल्दबाजी में काम करने वाले को वे इस प्रकार किए गए सानि कम्मानि तप्पेन्ति, सोच में डाल देते हैं कष्ट देते हैं । कैसे ? उन्हं बज्झोहितं मुखे जिस तरह खाते समय यदि इसका विचार न कर कि यह ठण्डा है, यह गर्म है गर्म भोजन मुख में डाल दिया जाए तो मुंह भी जलता है, गला भी जलता है और पेट भी जलता है; चिन्ता होती है तथा कष्ट होता है । इसी प्रकार उस तरह के आदमी को वह कर्म तपाते है । उस सिंह ने यह गाथा कह सोचा—मेरे भाई उपाय-कुशल नहीं रहे । सियार को मारने जाकर वह बडे जोर से कूद कर स्वय मर गए । मैं ऐसा न कर गुफा में पडे हुए ही सियार के हृदय को फाड डालूंगा । उसने सियार के चढने-उतरने के रास्ते का ख्याल कर उसके सामने खडे हो तीन बार सिंह नाद किया । पृथ्वी सहित आकाश गूंज उठा । सियार का हृदय स्फटिक गुफा में लेटे ही लेटे डर के मारे फट गया । वह वही मर गया । शास्ता ने कहा—इस प्रकार वह सियार सिंहनाद सुनकर मर गया । शास्ता ने बुद्धत्व प्राप्त किए रहने पर यह गाथा कही— सीहोच सीहनादेन बद्धरं अभिनादयि सुत्वा सीहस्स निग्घोस सिगालो दद्दरे वस भीतो सन्तासमापादि हृदयं चस्स अप्फलि ॥

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१४८ [ २.१.१५

[ सिंह ने सिंह नाद से गुफा को गुंजा दिया । गुफा मे रहने वाले सियार जब सिंह की आवाज सुनी तो वह डर कर त्रास को प्राप्त हुआ और उसका हृद फट गया । ] '

सीहो, सिंह चार प्रकार के होते हैं (१) तृण-सिंह (२) पाण्डु-सिंह (३) बाळ-सिंह (४) लाल हाथ पैर वाला केसरी । उनमें से यहाँ केसरी सिंह से ही मतलब है । दद्दरं अभिनादयि सौ बिजलियो के शब्द से भी भयानक सिंहनाद से उस रजत पर्वत को निनादित कर दिया, गुंजा दिया । यद्वरे बसं स्फटिक मिले रजत पर्वत पर रहते हुए । भीतो सन्तासमापादि मृत्यु-भय से डरकर चित्त-त्रास को प्राप्त हुआ । हृदयं चस्स अप्फलि, उस भय से उसका हृदय फट गया ।

इस प्रकार सिंह उस सियार का प्राणान्त कर, भाइयो को एक जगह छिपाकर बहन को उनके मरने का वृत्तान्त कह, उसे दिलासा दे जन्म भर काञ्चन गुफा में ही रह कर्मानुसार परलोक सिधारा । शास्ता ने यह धर्म-देशना ला आर्य-सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया । सत्यों का प्रकाशन हो चुकने पर उपासक श्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ । उस समय सियार नाई का लडका था । सिंह-बच्ची लिच्छवि-कुमारी, छ छोटे भाई कोई स्थविर हुए । ज्येष्ठ-भ्राता सिंह तो मैं ही था ।

१५३. सूकर जातक "चतुप्पदो अहं सम्म...." यह गाथा ने जेतवन में विहर करते समय एक बूढ़े स्थविर के बारे में कही ।

क. वर्तमान कथा

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सूकर ] १४६ क. वर्तमान कथा एक दिन रात मे जब धर्म-देशना हो रही थी, जब शास्ता गन्धकुटी के दरवाजे पर मणिमय सीढ़ी पर खडे होकर भिक्षुसघ को उपदेश दे गन्धकुटी में चले गए थे, धर्मसेनापति (सारिपुत्र) शास्ता को प्रणाम कर अपने परिवेण में गए । महामोग्गल्लान भी अपने परिवेण में जा, वहाँ थोड़ी देर विश्राम कर स्थविर के पास चले आए और प्रश्न पूछने लगे । जो जो प्रश्न पूछा जाता धर्म सेनापति आकाश मे चन्द्रमा को उठाते हुए से उसका उत्तर देकर समझा देते । चारो प्रकार की परिषद् बैठी धर्म सुनती रही । एक बूढे स्थविर को सूझा—यदि में इस सभा मे सारिपुत्र से कोई प्रश्न पूछकर उसे चकरा दूँ तो यह सभा समझेगी कि यह भी बहुश्रुत है और मेरा सत्कार सम्मान करेगी । इसलिए उसने सभा मुँ से उठ सारिपुत्र के पास जाकर एक तरफ खडे हो कहा—आयुष्मान् ! सारिपुत्र ! हम भी एक प्रश्न पूछना चाहते हैं । हमें भी पूछने की आज्ञा दे । लपेटने के बारे मे, उधेडने के बारे मे, निग्रह के बारे में, प्रग्रह के बारे मे, विशेष के बारे मे, तथा निर्विशेष के बारे मे अपना निश्चय कहे ।१ स्थविर ने उसकी ओर देख सोचा—यह बूढा इच्छाओ के वशीभूत है, तुच्छ है, कुछ नही जानता । वे उससे बिना कुछ बातचीत किए शरमाए हुए, पंखे२ को रखकर आसन से उतर परिवेण में चले गए । मोग्गल्लान स्थविर भी अपने परिवेण में चले गए । मनुष्यो ने उसका पीछा किया—पकडो इस बूढे को, इसने हमें मधुर धर्मोपदेश नही सुनने दिया । यह भागता हुआ विहार के सिरे पर एक दरार फटे पाखाने मे गिर पडा और गन्दगी से पुत गया । आदमियों को उसे देख घृणा हुई । वे शास्ता के पास गए। शास्ता ने उन्हें देख पूछा—"उपासको ! क्यो असमय कैसे आए ?" मनुष्यो ने वह हाल कहा । १ यह प्रश्न निरर्थक शब्द-समूह मात्र है । २ धर्मोपदेश के समय पंखा हाथ में रहता है ।

ख. अतीत कथा

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१५० [ २.१.१५३ शास्ता ने कहा—"उपासको ! न केवल अभी यह बूढ़ा उबल कर अपने बल को न जान महा बलवान् के साथ जूझ कर गूँह से लिबड़ गया है, यह पहले भी उबल कर अपने बल को न जान महाबलवान् से जूझ गूँह से लिबड़ चुका है।" उनके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की बात कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व सिंह होकर पैदा हुए, और हिमालय प्रदेश में पर्वत-गुफा में रहने लगे। उनके नजदीक ही एक तालाब के आसपास बहुत से सूअर रहते थे। उसी तालाब के आसपास तपस्वी भी पर्णशालाओ में रहते। एक दिन सिंह भैंसे या हाथी मे से किसी एक को मार, पेट भर मास खा, उस तालाब में उतर पानी पी ऊपर आया। उसी समय एक मोटा सुअर उस तालाब के आसपास चरता था। सिंह ने उसे देख सोचा कि इसे किसी दूसरे दिन खाऊँगा। यदि यह मुझे देख लेगा तो फिर न आएगा। उसके न आने के डर से वह तालाब से उतर एक तरफ को जाने लगा। सुअर ने उसे देखा तो सोचा—यह मुझे देख मेरे भय से सामने से न जा सकने के कारण भागा जा रहा है। आज मुझे इस सिंह से जूझना चाहिए। उसने सिर उठाकर सिंह को युद्ध के लिए ललकारते हुए यह पहली गाथा कही— चतुप्पदो अह सम्म ! त्वम्पि सम्म ! चतुप्पदो, एहि सीह ! निवत्तस्सु किन्नु भीतो पलायसि ॥ [दोस्त ! में चौपाया हूँ। तू भी चौपाया है। सिंह आ, रुक। डरकर किस लिए भागता है।] सिंह ने उसकी बात सुनी तो कहा—दोस्त ! आज हमारा तेरे साथ युद्ध न होगा। आज से सातवें दिन इसी जगह पर सग्राम होने। इतना कह वह चला गया। सुअर प्रसन्न हुआ कि सिंह के साथ युद्ध करेगा। उसने अपने सब रिश्ते- दारो को कह दिया। वह उसकी बात सुनकर डरे। 'अब तू हम सभी को नष्ट करेगा। अपनी ताकत को न पहचानकर सिंह के साथ युद्ध करना चाहता है। सिंह आकर हम सबके प्राण ले लेगा। दुस्साहस न कर।'

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सूकर ] १५१ उसने भयभीत हो पूछा—"तो अब क्या करूँ ?" उन्होने उपाय बताया—दोस्त सुअर ! तू उस जगह जाकर जहाँ यह तपस्वी मल-मूत्र त्यागते हैं सात दिन तक शरीर में गन्दगी लपेटकर शरीर को सुखा, सातवें दिन शरीर को ओस की बूँदो से गीलाकर सिंह के आने से पहले ही आकर हवा का रुख देख, जिधर से हवा आती हो उधर खडे हो जाना । सिंह सफाई-पसन्द होता है। वह तेरे शरीर की गन्दगी को सूंघ तुझे विजयी छोड चला जाएगा । उसने वैसे ही किया और सातवें दिन वहाँ जाकर खडा हो गया । सिंह उसके शरीर की गन्दगी को सूंघ कर समझ गया कि उसने देह मे गूँह पोता है। वह बोला— "दोस्त सुअर ! तूने अच्छा उपाय सोचा है । यदि तूने गूँह न पोता होता, तो मै तुझे यही मार देता । लेकिन अब तो मै तेरे शरीर को न मुंह से डस सकता हूँ न पैरो से ही तुझ पर प्रहार कर सकता हूँ। इसलिए मै तुझे विजयी मानता हूँ ।'—इतना कह दूसरी गाथा कही— असुचि पूतिलोमोसि दुग्गन्धो वासि सूकर ! सचे युज्झितुकामोसि जय सम्म ! वदामि ते ॥ [ सुअर ! तू अपवित्र गन्दे वालो वाला है। तेरे शरीर से दुर्गन्ध आती हैं। यदि तुझे युद्ध करने की इच्छा हैं, तो मै तुझे विजयी मान लेता हूँ । ] पूतिलोमोसि—गन्दगी लगे दुर्गन्धपूर्ण वालो वाला है । दुग्गन्धो वासि, अनिष्टकर, घृणित, प्रतिकूल दुर्गन्ध फैलाता है। जय सम्म ! वदामि ते ! तुझे विजयी मानता हूँ मे पराजित हूँ। तू जा। इतना कह सिंह रुक, अपना शिकार कर, तालाब में पानी पी पर्वत गुफा को ही चला गया । सुअर ने अपने रिश्तेदारो को कहा—सिंह को मैने जीत लिया। वे डरे कि फिर किसी दिन आकर सिंह हम सबको जान से मार डालेगा। वे भाग कर किसी दूसरी जगह चले गए । शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय सुअर यह वृद्ध स्थविर था । सिंह तो मै ही था ।

१५४. उरग जातक

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१५२ [ २.१.१५४ १५४. उरग जातक "उधूरगान पवरो पविट्ठो . . " यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय श्रेणियों¹ के सघ कलह के बारे में कही। क. वर्तमान कथा कोशल राजा के दो सेवक श्रेणियों के प्रधान थे। वे दोनो महामात्य एक दूसरे को जहाँ कहीं देखते झगडा करते। उनके वैर की बात सारे नगर में फैल गई। न राजा और न उनके रिश्तेदार तथा मित्र उनका झगडा मिटा सके। एक दिन प्रातःकाल शास्ता ने उन आदमियो का विचार करते हुए जिनके ज्ञानी होने की संभावना थी इन दोनो के श्रोतापन्न होने की संभावना को देखा। किसी एक दिन वे श्रावस्ती मे भिक्षाचार करते हुए उनमें से एक के घर के दरवाजे पर खडे हुए। उसने बाहर निकल पात्र ले शास्ता को घर के अन्दर ले जा आसन बिछा कर बिठाया। शास्ता ने बैठते ही उसे मैत्री भावना की महिमा समझाई जब उसका चित्त कुछ कोमल हुआ देखा तो आर्य्य-सत्यों को प्रकाशित किया। सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर वह श्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ। शास्ता ने जब देखा कि वह श्रोतापन्न हो गया तो उसी के हाथ में पात्र रहने देकर उसे साथ ले दूसरे के घर पर पहुँचे। उसने भी बाहर निकल शास्ता को प्रणाम कर 'भन्ते ! घर में प्रवेश करें' कह घर में ले जाकर बिठाया। ————— ¹ शिल्पियों के संघ।

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उरग ] १५३

दूसरा भी पात्र लिए हुए शास्ता के साथ ही अन्दर गया। शास्ता ने उसे मैत्री- भावना के ग्यारह लाभ¹ बतलाए। जब जाना कि उसका चित्त कोमल पड गया तो आर्य-सत्यो को प्रकाशित किया। सत्यो का प्रकाशन समाप्त होने पर यह भी श्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ। वे दोनो श्रोतापन्न हो परस्पर अपने अपने दोषो को स्वीकार कर, उनके लिए क्षमा मांग एक दूसरे के साथ मिलकर आनन्दपूर्वक रहनेवाले, एक ही विचार के हो गए। उसी दिन भगवान् के सामने बैठकर उन्होने इकट्ठे खाया। शास्ता भोजन-कृत्य समाप्त करके विहार गए। वे भी बहुत सा माला- गन्ध-लेप आदि सुगन्धित वस्तुएँ तथा घी, शहद और शक्कर आदि लेकर शास्ता के साथ ही घर से निकले। भिक्षु-सघ ने शास्ता को आदर प्रदर्शित किया। बुद्ध उपदेश देकर गन्ध-कुटी मे प्रविष्ट हुए। भिक्षुओ ने सायकाल धर्म-सभा मे बातचीत चलाई। 'आयुष्मानो ! शास्ता अविनयी को विनयी बनानेवाले हैं। जिन दो अमात्यो का चिर काल तक प्रयत्न करके भी न राजा और न उनके रिश्तेदार वा सम्बन्धी मेल करा सके तथागत ने उनको एक ही दिन मे विनीत कर दिया।' शास्ता ने आकर पूछा- 'भिक्षुओ ! बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?' 'अमुक बात चीत' कहने पर तथागत ने कहा—'भिक्षुओ मैने केवल अभी इन दो जनो का मेल नही कराया, पहले भी कराया है।' इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही-

ख. अतीत कथा

पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय वाराणसी के उत्सव की घोषणा होने पर वडा मेला हुआ। बहुत से मनुष्य, देव, नाग तथा गरुड आदि समज्‍ज² देखने के लिए इकट्ठे हुए। वहाँ एक जगह एक नाग और गरुड मेला देखते हुए इकट्ठे खडे थे।


¹ अङ्गुत्तर निकाय एकादशक निपात । ² समज्‍ज = मेला ।

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१५४ [ २१५४ नाग ने गरुड को गरुड न समझ उसके कंधे पर हाथ रख दिया। गरुड ने मुड़कर देखा कि मेरे कंधे पर हाथ किसने रखा ? उसने देखा कि नाग है। नाग ने भी जब गरुड को देखा तो उसे जान का डर हुआ। वह नगर से निकल नदी के रास्ते भाग गया। गरुड ने भी उसे पकड़ने के लिए पीछा किया। उस समय बोधिसत्त्व तपस्वी थे। वे उसी नदी के किनारे पर्णशाला में रहते हुए दिन की थकावट मिटाने के लिए नहाने का वस्त्र पहन वल्कल-छाल को बाहर छोड़ नदी में उतर स्नान कर रहे थे। नाग ने सोचा इस प्रव्रजित की सहायता से जान बचा सकूँगा। उसने अपना असली रूप छोड़ मणि की शक्ल बना वल्कल के अन्दर प्रवेश किया। गरुड़ ने पीछा करते हुए उसे वहाँ घुसा देख वल्कल के प्रति गौरव होने से उसे न पकड़ बोधिसत्त्व को 'भन्ते ! मैं भूखा हूँ। आप अपने वल्कल को लें। मैं नाग को खाऊँगा' कहने के लिए यह गाथा कही— इधूरगान पवरो पविट्ठो सेलस्स वण्णेन पमोक्खमिच्छ बह्मञ्च वण्ण अपचायमानो बुभुक्खितो नो विसहामि भोत्तुं ॥ [यहाँ मणिवर्ण से नागराजा जान बचाने के लिए घुसा है। मैं ब्राह्मण वर्ण का आदर करने के कारण भूखा होता हुआ भी उसे खाने की हिम्मत नहीं करता।] इधूरगान पवरो पविट्ठो, उस वल्कल में नागों में श्रेष्ठ नागराज प्रविष्ट हुआ है। सेलस्स वण्णेन, मणि के वर्ण से, अर्थात मणि की शक्ल बना प्रविष्ट हुआ। पमोक्खमिच्छ, मुझसे बचने की इच्छा से। ब्रह्मञ्च वण्ण अपचायमानो, मैं तुम्हारे ब्रह्म वर्ण श्रेष्ठ वर्ण की पूजा करने के कारण, गौरव करने के कारण बुभुक्खितो नो विसहामि भोत्तु वल्कल में घुसे हुए इस नाग को भूख होते भी नहीं खा सकता हूँ।

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गग्ग ] १५५ पानी मे खड़े ही खड़े बोधिसत्त्व ने गरुड राज की प्रशंसा करते हुए यह गाथा कही— सो ब्रह्मगुत्तो चिरमेव जीव दिव्या च ते पातुभवन्तु भक्खा सो ब्रह्मवण्णं अपचायमानो धुभुक्खितो नो वितरासि भोत्तु ॥ [ तू ब्रह्म द्वारा रक्षित होकर चिर काल तक जीवित रह । तुझे दिव्य भोजन प्राप्त हो । तू ब्राह्मण वर्ण के गौरव के कारण भूखा होता हुआ भी नहीं खा रहा है । ] सो ब्रह्मगुत्तो, यह तू ब्रह्म द्वारा गोपित, ब्रह्म द्वारा रक्षित होकर दिब्बा च ते पातुभवन्तु भक्खा, देवताओ के भोजन करने योग्य भोजन तुझे मिलें । प्राण हिंसा करके नाग-मास खानेवाला न बन । इस प्रकार बोधिसत्त्व ने पानी में खड़े ही खड़े अनुमोदन कर, पानी से निकल वल्कल पहन उन दोनो को अपने आश्रम पर ले जा मैत्री-भावना की प्रशंसा कर दोनो का मेल करा दिया । उसके बाद से वह प्रसन्नता पूर्वक सुख से रहने लगे । शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय नाग और गरुड यह दो महामात्य थे । तपस्वी तो मैं ही था । १५५. गग्ग जातक “जीव यस्स सत गग्ग ” यह शास्ता ने जेतवन के समीप राजा प्रसेनजित के बनवाए राजकाराम म रहते हुए अपनी छींक के बारे में कही ।

क. वर्तमान कथा

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१५६ [ २ १.१५५ ५ क. वर्तमान कथा एक दिन शास्ता को राजकाराम म चारो प्रकार की परिषद् म बैठे धर्मोपदेश करते समय छींक आई। भिक्षुओं ने जोर मे, ऊँचे स्वर से कहा- "भन्ते ! भगवान् ! जीएँ। सुगत ! जीए।" उनके चिल्लाने से धर्मोपदेश में विघ्न पडा। भगवान् ने भिक्षुओ से पूछा- "भिक्षुओ, यदि किसी के छींकने पर 'जीएँ' कहा जायगा, तो क्या उस कहने से उसके जीने मरने पर कुछ प्रभाव पडेगा ?" "भन्ते ! नही।" "भिक्षुओ ! छींकने पर 'जीएँ' नहीं कहना चाहिए। जो कहे उसे दुष्कृत का दोष लगेगा।"¹ उन दिनो भिक्षुओ को छींक आने पर लोग कहा करते- "भन्ते ! जीएँ।" भिक्षु बुरा मानते और कुछ न बोलते। लोग खीझ उठते- "कैसे हैं यह श्रमण शाक्य-पुत्रीय जो "भन्ते ! जीए' कहने पर कुछ नहीं बोलते। भगवान् से यह बात कही गई। भगवान् ने कहा-"भिक्षुओ ! गृहस्थ लोग मगल-अमगल को मानने वाले हैं। भिक्षुओ ! गृहस्थ लोगों के 'भन्ते जीएँ' कहने पर 'चिरकाल तक जीते रहो' कहने की अनुज्ञा देता हूँ।" भिक्षुओ ने भगवान से पूछा- भन्ते ! 'जीओ', तथा 'जीते रहो' यह कहने की प्रथा कब से आरम्भ हुई ? शास्ता ने कहा-भिक्षुओ, यह 'जीओ' तथा 'जीते रहो' कहने की प्रथा पुराने समय में आरम्भ हुई। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही- ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व काशी देश में एक ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। उसका पिता व्यापार करके गुजारा करता था। उसके सोलह वर्ष के बोधिसत्त्व स मोरी आदि की चीजें उठा ग्राम निगम आदि में घूमते हुए वाराणसी पहुँचकर द्वारपाल के घर पर भात ¹ विनय पिटक में यह शिक्षापद नहीं मिला।

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गग्ग ] १५७ बनवाकर खाया । निवासस्थान नही था । उसने पूछा-"असमय पर आए हुए अतिथि कहाँ रहते हैं ?" मनुष्यो ने उत्तर दिया-"नगर के बाहर एक शाला है । लेकिन उसमें भूत-प्रेत आदि रहते है । यदि चाहे तो वहाँ रहें ।" बोधिसत्त्व ने कहा-"तात ! चले ! डरने की जरूरत नही । मैं उस यक्ष का दमन कर उसे आपके चरणो पर गिराऊँगा ।" वह पिता को लकर वहाँ गए । पिता तख्ते पर लेटा । वे स्वय पिता के पैरो को दबाते हुए बैठे । वहाँ रहनेवाल यक्ष ने बारह वर्ष कुबेर की सेवा करके उससे यह अधिकार प्राप्त किया था कि उस शाला मे जो आदमी आएँ उनमें से किसी को छींक आने पर यदि कोई 'जीवँ' कहे और जिसको छींक आई हो वह भी 'जीओ' कहे तो उनको छोडकर वह शेष सभी को खा सकता है। वह चौखट पर रहता था । उसने बोधिसत्व के पिता को छींक लिवाने के लिए अपने प्रताप से सूक्ष्म चूर्ण बिखेरा । चूर्ण आकर उसके नयनो में पडा । उसे तख्ते पर पडे ही पडे छींक आई। बोधिसत्व ने उसे 'जीवँ' नही कहा । यक्ष उसे खाने के लिए चोखट से उतरने लगा । बोधिसत्व ने उसे उतरते देख, सोचा इसी ने मेरे पिता को छिंकाया होगा । छींकने पर 'जो जीवँ' न कहे उन्हें यह यक्ष खा लेता होगा । उन्होंने पिता को सम्बोधन करके यह पहली गाथा कही— जीव वस्स सत गग्ग ! अपरानि च वीसति, मा मं पिसाचा खादन्तु जीव त्वं सरदोसत ॥ [ गग्ग ! तू सौ वर्ष जीवित रह । और भी बीस वर्ष । मुझे पिशाच न खाएँ । तू सौ वर्ष जीवित रह । ] गग्ग, यह पिता को उसके नाम से सम्बोधन किया है । अपरानि च वीसति, और भी बीस वर्ष जीवित रह । मा मं पिसाचा खादन्तु, मुझे पिशाच न खाए । जीव त्व सरदो सत, तू एक सो बीस वर्ष जी । सरदसत का अर्थ तो सौ वर्ष ही होता है। लेकिन पहले के बीस जोड देने से यहाँ एक सौ बीस से मतलब है ।

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१५८ [ २१.१५५ यक्ष ने बोधिसत्त्व का वचन सुन सोचा कि इस माणवक ने 'जीवै' कहा है, इसलिए इसे नहीं खा सकता । इसके पिता को खाऊँगा । इसलिए पिता के पास गया । उसने उसे आते देख सोचा, यह यक्ष उन लोगों को खा लेता होगा, जो 'जीवै' के उत्तर में 'जीओ' न कहते होंगे । इसलिए मैं प्रतिवचन करूँगा । उसने पुत्र के बारे में दूसरी गाथा कही— त्वम्पि वस्स सत जीव अपराणि च वीसति, विस पिसाचा खादन्तु जीव त्व सरदोसत ॥ [ तू भी सौ वर्ष जीवित रह । और भी बीस वर्ष । पिशाच विष खाएँ । तू सौ वर्ष जीवित रह । ] विस पिसाचा, पिशाच हलाहल विष खाएँ । यक्ष ने उसकी बात सुन सोचा, मैं दोनों में से किसी को नहीं खा सकता । वह रुक गया । बोधिसत्त्व ने पूछा—'भो यक्ष ! इस शाला में प्रवेश करनेवाले आदमियों को तू क्यों खाता है ?' “बारह वर्ष कुबेर की सेवा करके अधिकार प्राप्त किया है ।” “क्या सभी को खाने का अधिकार है ?” “'जीवै' और 'जीओ' कहने वाला को छोड़ शेष सभी को खाता हूँ ।” “यक्ष ! तूने पहले बुरे कर्म किए । इसलिए तू निर्दयी, कठोर तथा दूसरों की हिंसा करनेवाला पैदा हुआ । अब फिर उसी तरह के काम करके तू तमोतम- परायण¹ हो रहा है। इसलिए अब से तू प्राणि हिंसा आदि से विरत हो ।” इस प्रकार उस यक्ष का दमन कर, नरक के भय से उसे डरा, पञ्चशीलों में प्रतिष्ठित कर यक्ष को दूत की तरह विनीत कर दिया । आगे चलकर आने जाने वाले मनुष्यों ने यक्ष को देखा और जब उन्हें मालूम हुआ कि बोधिसत्त्व ने उसका दमन किया, तो उन्होंने राजा से कहा—“देव ! ¹ अन्धकार से अन्धकार में जाने वाला = हीनकुल में पैदा होकर नीच कर्म करने वाला ।

चली, कहा और जातक का मेल बैठाया।

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अलीनचित्त ] १५६ एक तरुण ने उस यक्ष का दमन कर उसे दूत की तरह विनीत कर रखा है।” राजा ने बोधिसत्त्व को बुलाकर सेनापति के स्थान पर नियुक्त किया। और पिता का बहुत सत्कार किया। राजा यक्ष को बलि-ग्रहण का अधिकारी बना, बोधिसत्त्व के उपदेशानुसार चल दान आदि पुण्य-कर्म कर स्वर्ग सिधारा। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला 'जीवं' और 'जीवो' कहने की प्रथा उस समय चली, कहा और जातक का मेल बैठाया। उस समय का राजा आनन्द था। पिता काश्यप था। और पुत्र तो मैं ही था। १५६. अलीनचित्त जातक “अलीनचित्त निस्साय ”, यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय एक हिम्मत-हारे भिक्षु के बारे म कही। क. वर्तमान कथा इसकी कथा ग्यारहवें परिच्छेद (निपात) की सबर जातक¹ म आएगी। शास्ता ने उस भिक्षु से पूछा—'भिक्षु, क्या तूने सचमुच हिम्मत छोड़ दी?' “भगवान् ! सचमुच।” शास्ता ने कहा—'भिक्षु, क्या तूने पूर्व समय में हिम्मत करके मास के टुकड़े सदृश छोटे से कुमार को बारह योजन के वाराणसी के नगर का राज्य ¹ सबर जातक (४६२)