जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
१८७ चतुमट्ठ जातक २६७
[ १७ ] विषय पृष्ठ १८७ चतुमट्ठ जातक २६७ [ हंस बच्चे वृक्ष पर बैठ बातचीत करते थे। सियार बोला—नीचे उतरकर बातचीत करो, जिसे मृगराज भी सुने। ] १८८ सीहपोत्युक जातक २६६ [ गीदड़ी से सिंहपुत्र पैदा हुआ। उसकी शक्ल सूरत थी सिंह जैसी किंतु स्वर शृगाल का सा। ] १८६. सीहचम्म जातक २७१ [ सिंह की खाल पहन कर गधा खेत चरता रहा , किंतु बोलने पर मारा गया। ] १६० सीलानिसंस जातक २७३ [ शील के प्रताप से एक आर्य्य-श्रावक ने अपने साथ एक नाई को भी नौका पर समुद्र पार लँघाया। ] • रूहक वर्ग २७६ १६१ रूहक जातक २७६ [ ब्राह्मणी ने ब्राह्मण के साथ मजाक किया। उसने गुस्से हो उसे तलाक दे दिया। ] १६२ सिरिकालकण्णि जातक २७८ [ यह जातक महाउम्मग्ग जातक (५४६) में आएगी। ] १६३ चुल्लपदुम जातक २७६ [ सात भाई छ भाइयो की स्त्री को मार कर खा गए। बोधिसत्त्व अपनी स्त्री को लेकर भाग निकल। उस स्त्री ने कृतघ्नता की हद कर दी। ] १६४ मणिचोर जातक २८५ [ राजा ने स्त्री पर मुग्ध हो उसके पति पर मणि चुराने का झूठा अपराध लगाकर उसे मरवाना चाहा। वह स्वयं मारा गया। ] २
१९५ पब्बत्तूपत्थर जातक २८६
[ १८ ] विषय पृष्ठ १९५ पब्बत्तूपत्थर जातक २८६ [ राजा की रानी को उसके आमात्य ने दूषित कर दिया। राजा ने विचार कर दोनो को क्षमा कर दिया। ] १९६ वालाहस्स जातक २९१ [ यक्षिणियां व्यापारियो को फँसाकर यक्ष नगर ले जाती। पाँच सौ व्यापारी उनके चगुल म फँस गए। ज्येष्ठ व्यापारी को पता लगा कि यह यक्षिणियाँ हैं। उसने सब को भाग चलने को कहा। ढाई सौ व्यापारी ज्येष्ठ व्यापारी का कहना मान बच निकले। कहना न मानने वाले दो ढाई सौ व्यापारी यक्षिणियो के आहार बने । ] १९७ मित्तामित्त जातक २९५ [ मित्र या अमित्र कैसे पहचाना जा सकता है ? ] १९८ राध जातक २९७ [ पोट्ठपाद ने ब्राह्मणी को दुराचार से विरत रहने का उपदेश दिया। उसने विचारे तोते की गरदन मरोड उसे चूल्हे में फेंक दिया। ] १९९ गहपति जातक ३०० [ ब्राह्मणी और गाँव का मुखिया मिलकर ब्राह्मण को धोखा देना चाहते थे। वे अपने दुराचार को न छिपा सके। ] २०० साधुसील जातक ३०३ [ एक ब्राह्मण की चार लडकियां थी। उसने आचार्य से पूछा—लड़कियाँ किसे देना योग्य है ? ] ६. नतंदळ्ह वर्ग ३०६ २०१ बन्धनागार जातक ३०६ [ पुत्र दारा का बन्धन सब से बडा बन्धन है । ]
२०२ केळिसील जातक ३०६
[ १६ ] विषय पृष्ठ २०२ केळिसील जातक ३०६ [ शक्र ने जरा जीर्ण हाथी घोडे, बैल तथा आदमियो को तग करने वाले ब्रह्मदत्त का दमन किया । ] २०३ खन्धवत्त जातक ३१२ [ सर्पों के प्रति मैत्री भावना का माहात्म्य । ] २०४ वीरक जातक ३१८ [ सविट्ठक ने वीरक की नकल की । वह काई म फँसकर मर गया । ] २०५ गङ्गेय्य जातक ३२० [ गङ्गेय्य सुन्दर है अथवा यामुनेय्य ? दोनो मछलियो मे कौन अधिक सुन्दर है ? ] २०६ कुरुङ्गमृग जातक ३२३ [ कुरुङ्ग मृग ने कठफोडे तथा कछुए की सहायता से अपने को शिकारी से बचाया और उनके प्राणो की भी रक्षा की । ] २०७ अस्सक जातक ३२६ [ अस्सक राजा अपनी मृत रानी के शोक से पागल हो रहा था । वह रानी गोबर के कीडे की योनि म पैदा हो कर एक कीडे को अस्सक राजा का अच्छा अच्छा समझती थी । ] २०८ सुसुमार जातक ३३० [ मगरमच्छ की भार्या बन्दर का कलेजा खाना चाहती थी । कपिराज ने उसके पति का बुरी तरह चकमा दिया । ] २०६ कककर जातक ३३२ [ पुराना हुशियार बगला शिकारी के फन्दे म नही आता था । ]
२१० कन्दगलक जातक ३३४
[ २० ] विषय पृष्ठ २१० कन्दगलक जातक ३३४ [ कन्दगलक ने खदिरवन में रहनेवाले कठफोरनी पक्षी की नकल कर अपनी जान गँवाई । ] ७. धीरत्थम्भक वर्ग ३३७ २११ सोमदत्त जातक ३३७ [ पुत्र पिता को सिखा पढ़ाकर राजा से दो बैल माँगने लगाया। पिता ने राजा से बैल माँगने के बदले कहा— बैल लें । ] २१२ उच्छिद्वभत्त जातक ३४० [ ब्राह्मणी ने अपने पति को अपने जार का जूठा भात खिलाया । ] २१३ भरु जातक ३४३ [ भरू राजा ने रिश्वत से बट वृक्ष के लिए झगड़ने वाले तपस्वियो का झगड़ा बढ़ाया । ] २१४ पुण्णनदी जातक ३४७ [ राजा ने क्रोधित हो अपने बुद्धिमान पुरोहित को निकाल दिया था। पीछे उसके गुणो को याद कर कौवे का मास भेज कर बुलाया । ] २१५ कच्छप जातक ३४६ [ हंस-बच्च अपनी चोंच म एक लकडी पर कछुए को लिए जा रह थे । उसने चुप न रह सकने के कारण आकाश से गिरकर जान गँवाई । ] २१६ मच्छ जातक ३५२ [ कामी मच्छ ने मच्छिया से प्राण की भिक्षा मांगी । ] २१७ सेग्गु जातक ३५४ [ पिता न पुत्री के ग्वारपन की परीक्षा की । ]
२१८. कूटवाणिज जातक . . . . ३५७
[ २१ ] विषय पृष्ठ २१८. कूटवाणिज जातक . . . . ३५७ [ एक बनिए ने दूसरे की लोहे की फालों को 'चूहे खा गए' कहा तो उसने उसके पुत्र को 'चिडिया ले गई' कहा । ] २१९. गरहित जातक . . . . ३६१ [ बन्दर ने कुछ दिन मनुष्यों में रह कर लौटकर अपने साथियों में मनुष्यों के जीवन की बड़ी निन्दा की । ] २२०. धम्मद्ध जातक . . . . ३६४ [ राजा ने काळक के स्थान में बोधिसत्त्व को न्यायाधीश बना दिया । काळक का रिश्वत का लाभ जाता रहा । उसने बोधिसत्त्व को मरवाने के अनेक उपाय किए । शक्र बोधिसत्त्व के सहायक थे । काळक की एक न चली । ] ८. कासाव वर्ग ३७५ २२१. कासाव जातक . . . . ३७५ [ एक आदमी काषाय वस्त्र पहन हाथियों को धोखा दे उनकी सूण्ड काट काट लाकर बेचता था । ] २२२. चुल्लनन्दिय जातक . . . . ३७८ [ शिकारी ने मातृ-भक्त बन्दरों तथा उनकी बूढ़ी माता को मार डाला । उसके घर पर बिजली गिर पड़ी । ] २२३. पुटभत्त जातक . . . . ३८१ [ राजा को भात की पोटली मिली । वह उसमें से बिना रानी को कुछ दिए अकेला ही खा गया । ] २२४. कुम्भील जातक . . . . ३८५ [ वानरिंद जातक (५७) के समान कथा है । ] २२५. खन्तियवण्णन जातक . . . . ३८६ [ आमात्य ने राजा के रनिवास को दूषित किया और आमात्य के सेवक ने उसके घर में दूषितकर्म किया । ]
२२६ कोसिय जातक ३८८
[ २२ ] विषय पृष्ठ २२६ कोसिय जातक ३८८ [ समय पर घर से बाहर निकलना अच्छा है, असमय पर नहीं । ] २२७ गूहपाणक जातक ३६१ [ गूँह का कीड़ा गीले गूँह पर चढ़ा । वह उसके चढ़ने से थोड़ा नीचे को दबा । गूँह का कीड़ा चिल्लाया— पृथ्वी मेरा बोझ नहीं उठा सकती है । ] २२८ कामनीत जातक ३६४ [ काम जातक (४६७) म । ब्रह्मचारी न राजा को तीन राज्य जिला देन की बात कही । फिर वह चला गया । राजा को लगा कि उसके हाथ में आए हुए तीन राज्य चले गए । ] २२६ पलासी जातक ३६८ [ वाराणसी नरेश ने तक्षशिला पर आक्रमण की तैयारी की । किन्तु वह तक्षशिला नरेश की ड्योढ़ी देखकर ही हिम्मत हार गया । ] २३० द्वितिय पलासी जातक ४०१ [ तक्षशिला नरेश न वाराणसी नरेश पर आक्रमण की तैयारी की । किन्तु वह वाराणसी नरेश के स्वर्णपट सदृश महाललाट को देख कर हिम्मत हार गया । ] ६. उपाहन वर्ग ४०५ २३१ उपाहन जातक ४०५ [ शिष्य ने आचार्य से हस्ति शिल्प सीख उसी से मुकाबला करना चाहा । ] २३२ वीणथूण जातक ४०८ [ सेठ की लडकी न कुबडे की पीठ पर कूब देख कर समझा यह पुरुषों म वृषभ होगा । ]
२३३. थिकण्टक जातक . . . . . . . . . ४११
[ २३ ] विषय पृष्ठ २३३. थिकण्टक जातक . . . . . . . . . ४११ [ स्वादिष्ट भोजन के वशीभूत मच्छ तीर से बींधा गया । ] २३४. असिताभू जातक . . . . . . . . ४१४ [ राजकुमार अपनी देवी की ओर से उदासीन हो किन्नरी की ओर आकृष्ट हुआ । देवी ने सन्मार्ग ग्रहण किया । ] २३५. वच्छनख जातक . . . . . . . . ४१७ [ गृहस्थी ने परिव्राजक को गृहस्थ जीवन की ओर आकृष्ट करना चाहा । परिव्राजक ने गृहस्थ जीवन के दोष कहे । ] २३६. बक जातक . . . . . . . . . . ४२० [ ढोंगी बगुला मछलियो को खाना चाहता था । ] २३७. साकेत जातक . . . . . . . . ४२१ [ तथागत ने स्नेह की उत्पत्ति का कारण बताया । ] २३८. एकपद जातक . . . . . . . . ४२३ [ अनेक अर्थपदो से युक्त एकपद । ] २३९. हरितमात जातक . . . . . . . . ४२५ [ सर्प ने नीले मेण्डक से पूछा—तुझे मछलियो की यह करतूत अच्छी लगती है ? ] २४०. महापिङ्गल जातक . . . . . . . . ४२८ [ राजा मर गया था। तब भी द्वारपाल को भय था कि अत्याचारी राजा यमराज के पास से कही लौट न आवे । ] १०. सिगाल वर्ग ४३२ २४१. सब्बदाठ वर्ग . . . . . . . . ४३२ [ सब्बदाठ नामक शृगाल ने पृथ्वीजय मन्त्र सीख लिया था। उसने सब पशुओ की सेना बना वाराणसी नरेश पर आक्रमण किया । ब्राह्मण ने उपाय से उसे हराया । ]
२४२. सुनख जातक . . . ४३५
[ २४ ]
विषय पृष्ठ २४२. सुनख जातक . . . ४३५ [ कुत्ते को चमडे की रस्सी मे बाँधकर ले जाया जा रहा था । जब सब लोग सो रहे थे कुत्ते ने चमडे की रस्सी काट डाली और भाग आया । ] २४३. गुत्तिल जातक ४३८ [ उज्जैन का मूषिल गन्धर्व काशी के गुत्तिल गन्धर्व के पास आया । उसने गुत्तिल से वीणावादन सीख गुत्तिल से ही मुकाबला करने की धृष्टता की । ] २४४. थोतिच्छ जातक . ४४७ [ परिव्राजक ने बोधिसत्त्व से शास्त्रार्थ किया—कौन सी गङ्गा ? ] २४५. मूलपरियाय जातक . ४४६ [ आचार्य ने अभिमानी शिष्यो को प्रश्न पूछ कर निरुत्तर किया । ] २४६. तेलोवाद जातक ४५२ [ बुद्धिमान मास खाने वाले को पाप नहीं लगता । ] २४७. पादञ्जली जातक . ४५४ [ पादञ्जली कुमार को केवल होंठ चबाना आता है । ] २४८. किंसुकोपम जातक ४५६ [ राजकुमारो ने किंसुक को भिन्न भिन्न समयो म देखा था । इसीलिए उनमें से एक ने किंसुक को एक आकार का समझा, दूसरे ने दूसरे का । ] २४६. सालक जातक . . . . ४५८ [ सपेरे ने बन्दर को बाँस से मारा । बंदर ने फिर सपेरे का विश्वास ही नही किया । ] २५०. कपि जातक . . . ४६१ [ ढोंगी बन्दर आग तापने के लिए कुटी के द्वार पर बैठा था । तपस्वी ने भगा दिया । ]
जा त क [द्वितीय खण्ड]
१०१. परोसत जातक
पहला परिच्छेद ११. परोसत वर्ग १०१. परोसत जातक परोसतञ्चेपि समागतान झापेयुं ते वस्ससत अपञ्ञा, एकोव सेय्यो पुरिसो सपञ्ञो यो भासितस्स विजानाति अत्थ ॥ [प्रज्ञाहीन शताधिक आये-हुए मनुष्य यदि सौ वर्ष तक भी ध्यान लगाते रह तो उनकी अपेक्षा एक प्रज्ञावान् मनुष्य जो कही हुई बात के (गम्भीर) अर्थ को जान लेता है, अच्छा है।] कथा की दृष्टि से, व्याख्या ( व्याकरण ) की दृष्टि से, सारांश की दृष्टि से यह जातक ( कथा ) परोसहस्स जातक¹ के समान ही है। इसमें केवल 'ध्यान कर' पद की विशेषता है। जिसका अर्थ है कि प्रज्ञा- रहित मनुष्य सौ वर्ष भी ध्यान करते रह, देखते रह, धारण करते रहें, इस प्रकार देखते हुये भी वह गूढ (अर्थ) को अथवा (असली) बात को नहीं देख पाते। इसलिए जो मनुष्य कही बात के अर्थ को जानता है वह प्रज्ञावान् अकेला ही अच्छा है।
¹परोसहस्स जातक (६६)
१०२. पण्णिक जातक
२ [ १.११.१०२ १०२. पण्णिक जातक “यो दुक्खफुट्ठाय भयेय्य ताण .” आदि (की कथा) शास्ता ने जेत- वन में रहते समय एक दुकानदार उपासक के सम्बन्ध में कही। क. वर्तमान कथा वह श्रावस्ती निवासी उपासक नाना प्रकार की जड़ी-बूटी तथा लौकी- कद्दू आदि बेच कर गुजारा करता था। उसकी एक लडकी थी। रूपवान, सुन्दर, सदाचारिणी तथा लज्जा-भय से युक्त, (लेकिन साथ ही) सदा हँसती रहती थी। बराबरी के कुलवालो ने लडकी को ब्याहने आने (की इच्छा करने ) पर, वह सोचने लगा— “इसकी शादी होगी। यह सदैव हँसती रहती है। क्वारपन को नष्ट करके यदि कुमारी दूसरे कुल में जाती है, तो माता पिता के लिये निन्दा का कारण होती है। मैं इसकी परीक्षा करूँगा कि इसका क्वारपन स्वरक्षित है कि नहीं ?” एक दिन उसने लडकी से टोकरी उठवा, पत्तो के लिये जगल में जाकर, उसकी परीक्षा करने की इच्छा से, कामासक्त की भाँति हो, गुप्त बात कह उस हाथ से धर लिया। जैसे ही उसे पकडा उसने रोते चिल्लाते हुए कहा— “तात ! यह नामुनासिब है, यह पानी से आग निकलने के सदृश है। ऐसा न करें।” “धम्म ! मैने केवल परीक्षा करने के लिए ही तुझे हाथ से धरा था। अब, बता कि तेरा क्वारपन (सुरक्षित) है या नहीं ?” “हाँ तात ! है। मैने राग के वशीभूत हो किसी भी पुरुष की ओर नही देखा।” उसने लडकी को आश्वासन दे घर ले जा, विवाह करके पराये कुल भेजा। (फिर) शास्ता की वन्दना करने की इच्छा से, गन्ध-माला आदि हाथ में ले,
न केवल अभी किन्तु, पहले भी उसकी परीक्षा की है' कह पूर्वजन्म की कथा
पण्णिक ] ३ जेतवन पहुँच, शास्ता की वन्दना तथा पूजा करके एक ओर बैठा । "चिर- काल के बाद आये ?" पूछे जाने पर उसने भगवान को वह सब हाल कहा । शास्ता ने 'उपासक ! तुम्हारी तो चिरकाल से सदाचारिणी है, लेकिन तूने न केवल अभी किन्तु, पहले भी उसकी परीक्षा की है' कह पूर्वजन्म की कथा कही- ख. अतीत कथा पूर्वकाल मे वाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय, बोधिसत्त्व जगल मे वृक्ष-देवता होकर उत्पन्न हुए। उस समय वाराणसी मे एक दुकान- दार उपासक था इत्यादि कथा वर्तमान कथा के सदृश ही है। हाँ, परीक्षा करने के लिए उसने जब लडकी को हाथो से धरा, तो लडकी ने रोते रोते यह गाथा कही- यो दुक्खफुट्ठाय भवेय्य ताण सो मे पिता दूभि वने करोति, सा कस्स कन्दामि वनस्स मज्झे यो तायिता सो सहसा करोति ॥ [ कष्ट मे पडने पर, जिसे त्राता होना चाहिये, वही मेरा पिता जगल म विश्वास-घात कर रहा है। सो मे जगल मे किसे (सहायता के लिये) बुलाऊँ ? जो त्राता है, वही दुस्साहस कर रहा है।] यो दुक्खफुट्ठाय भवेय्य ताण का अर्थ है कि जो शारीरिक अथवा मान- सिक दुख से पीडित का त्राण करता है, परित्राण करता है, तथा प्रतिष्ठा का कारण होता है। सो मे पिता दूभि वने करोति का अर्थ है कि वह दुख से परित्राण करनेवाला मेरा पिता ही यहाँ इस प्रकार का मित्र-द्रोही कर्म करता है, अपनी निज की पुत्री (के शील) को ही लांघना चाहता है। सा कस्स कन्दामि का मतलब है कि किसके पास रोऊँ ? कौन मुझे बचायेगा ? यो तायिता सो सहसा करोति, का अर्थ हुआ कि जो पिता मेरा त्राता है, रक्षक है, आश्रय दाता होने योग्य, वह पिता ही दुस्साहस कर रहा है।
शास्ता ने यह धर्म-देशना सुना, (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर, जातक
४ [ १११.१०३ तब पिता ने उसे आश्वासन देकर पूछा—"अम्मे ! तूने अपने आप को सुरक्षित तो रखा है ?" "हाँ, तात ! मैने अपने आपको (सँभाल कर) रक्खा है।" उसने उसे घर ले जा विवाह कर, पराये कुल भेज दिया । शास्ता ने यह धर्म-देशना सुना, (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर, जातक का मेल बैठाया । सत्यों (के प्रकाशन) के अन्त में उपासक स्रोतापत्तिफल में प्रतिष्ठित हुआ । उस समय का पिता ही इस समय का पिता; लड़की ही इस समय की लड़की है। लेकिन उस बात को प्रत्यक्ष देखनेवाला वृक्ष- देवता तो मै ही था । १०३. वेरी जातक "यत्थ वेरी निजसति ." आदि गाथा शास्ता ने जेतवन में रहते समय अनाथ पिण्डिक के सम्बन्ध से कही । क. वर्तमान कथा अनाथ पिण्डिक ने अपने भोग-ग्राम¹ से लौटते हुए रास्ते में चोरो को देख- कर सोचा—"रास्ते मे रहना ठीक नही। श्रावस्ती ही जाकर रहूँगा ।" यह सोच जल्दी जल्दी बैलो को हांक, श्रावस्ती पहुँच, अगले दिन जब विहार गया, तो शास्ता को यह बात कही। शास्ता ने "गृहपति ! पूर्व समय में भी पण्डित-जन रास्ते में चोरो को देखकर रास्ते म न ठहर, अपने रहने के स्थान पर ही चले गये ' कह उसके पूछने पर पूर्व-जन्म की कथा कही— ¹ भोगग्राम=जमींदारी का ग्राम ।
ख. अतीत कथा
बेरी ] ५ ख. अतीत कथा पूर्व समय में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व महासम्पत्ति- शाली सेठ होकर पैदा हुआ। एक गांव में निमन्त्रण खाकर लौटने समय रास्ते में चोरो को देख वहीं नहीं ठहरा। जल्दी जल्दी बैलो को हाँक, अपने घर ही आकर नाना प्रकार के श्रेष्ठरसो से युक्त भोजन करके महाशय्या पर (लेटा। उस समय 'चोरो के हाथ से निकलकर भयरहित स्थान अपने घरपर आ गया हूँ' सोच, उल्लासपूर्वक यह गाथा कही— यत्थ वेरी निवसति न वसे तत्थ पण्डितो, एकरत्तं द्विरत्तं वा दुक्खं वसति वेरिसु ॥ [जहाँ पर वैरी का निवास हो, पण्डित आदमी को चाहिये कि वहाँ निवास न करे। क्योकि वैरी के साथ एक या दो रात्रि रहनेवाला भी दुःख ही भोगता है।] ────── वेरी, वैर-भाव से युक्त आदमी। निवसति, प्रतिष्ठित रहता है। न वसे तत्थ पण्डितो, जहाँ वह वैरी आदमी प्रतिष्ठित होकर रहता है, पाण्डित्य से युक्त पण्डित-जन को चाहिये कि वहाँ न रहे। किस कारण से ? एकरत्तं द्विरत्त वा दुक्ख वसति वेरिसु, वैरियों के बीच में (केवल) एक या दो दिन रहता हुआ भी दुःख ही भोगता है। ────── बोधिसत्त्व इस प्रकार हर्ष ध्वनि करके दान-यादि पुण्य-धर्म कर यथाकर्म (परलोक) सिधारे। शास्ता ने इस धर्म-देशना को ला, जातक का मेल बैठाया कि उस समय मैं ही वाराणसी का सेठ था।
१०४. मित्तविन्द जातक
६ [ १.११.१०४ १०४. मित्तविन्द जातक “चतुब्भि अट्ठज्झगमा” आदि शास्ता ने जेतवन में रहते समय, एक दुर्भाषी भिक्षु के बारे में कही। क. वर्तमान कथा पहले आई मित्तविन्द जातक की कहानी के सदृश ही यह कहानी भी जाननी चाहिये। ख. अतीत कथा लेकिन यह जातक कथा है काश्यप-सम्बुद्ध के समय की। उस समय एक नरक-निवासी ने, जिसके सिर पर घूमनेवाला चक्र¹ था और जो नरक में जल रहा था, बोधिसत्त्व से पूछा—“भन्ते ! मैने क्या पापकर्म किया है ?” बोधि- सत्त्व ने “तूने अमुक और अमुक पापकर्म किया है” कह यह गाथा कही— चतुब्भि अट्ठज्झगमा अट्ठाहिपि च सोळस सोळसाहि च बत्तिस अतिच्छं चक्कमासदो; इच्छाहुतस्स पोसस्स चक्कं भमति मत्थके ॥ [ चार से आठ, आठ से सोलह, और सोलह से बत्तीस की इच्छा करने के कारण यह सिर पर घूमनेवाला चक्र प्राप्त हुआ। क्योंकि इच्छा (लोभ) से ताड़ित मनुष्य के सिर पर चक्र भ्रमता है।] ¹ उरचक्र—पालि-कोष में (रीजडेविड्स ने) उर-चक्र का अर्थ छाती पर रक्खा लोहे का चक्र किया है, जो यथार्थ नहीं। 'उर' शब्द वैदिक है, जिसका अर्थ है गतिमान्।
दुब्बलकट्ठ ] ७ चतुब्भि अट्ठज्झगमा, समुद्र मे चार परियो ( विमान प्रेतनीयो ) को पाकर, उन से सन्तुष्ट न हो, लोभ के कारण और आठ को प्राप्त किया। शेष दो पदो का अर्थ भी इसी प्रकार है। अतिच्छ चक्कम्रासदो इस प्रकार स्वकीय लाभ से असन्तुष्ट इस इस चीज की प्राप्ति होने पर, और और चीज की इच्छा करते हुए, अब इस उर-चक्र को प्राप्त हुए। उसके इस प्रकार इच्छाहातस्स पोसस्स तृष्णा से प्रताडित तेरे चक्क भमति मत्थके, पत्थर तथा लोहे के दो प्रकार के चक्रो मे से तेज धार वाला लोहे का चक्र, फिर फिर उसके माथे पर गिरने से ऐसा कहा गया। यह कहकर (बोधिसत्व) स्वय देवलोक को गये। वह नरकगामी प्राणी भी अपने पापकर्मो के क्षीण होने पर कर्मानुसार अवस्था को प्राप्त हुआ। शास्ता ने इस धर्म-देशना को ला जातक का मेल बैठाया—उस समय मित्र-विन्दक (अब का) दुर्भागीभिक्षु था, और देवपुत्र तो मैं ही था। १०५. दुब्बलकट्ठ जातक “बहुम्पेतं वने कट्ठ” आदि शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक भय- भीत भिक्षु के बारे में कही। क. वर्तमान कथा वह श्रावस्ती-निवासी, तरुण, शास्ता का धर्मोपदेश सुन, प्रव्रजित हो मरने से भयभीत रहता था। रात या दिन मे हवा के चलने पर, सूखी-डण्ठलो के गिरने पर तथा पक्षिया या चौपायो के कुछ शब्द करने पर, मरण-भय से डरकर वह जोर से चिल्लाता हुआ भागता। 'मुझे भी मरना होगा', इसका उसे ध्यान तक न था। यदि वह यह जानता कि “मै मरूँगा” तो उसे मरने
८ [ १.११-१०५ से डर न लगता। वह मरण-स्मृति योग-विधि (=कर्मस्थान) का अन- भ्यासी होने से ही डरता था। उसकी मृत्युभय से भयभीत होने की बात भिक्षु- संघ को पता लग गई। सो एक दिन भिक्षुओं ने धर्म-सभा में बात चलाई —आयुष्मन्तो ! अमुक मरण-भीरु भिक्षु मृत्यु से डरता है। भिक्षु को तो चाहिये कि वह 'मुझे अवश्य ही मरना है' इस मरण-स्मृति कर्मस्थान की भावना करे। शास्ता ने आकर पूछा—"भिक्षुओ ! इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?" "यह बातचीत कहने पर भगवान् ने उस भिक्षु को बुलवाया और पूछा—क्या तुझे सचमुच मरने से डर लगता है ? "भन्ते ! सचमुच !" "भिक्षुओ ! इस भिक्षु से असन्तुष्ट मत होओ। यह भिक्षु केवल अब ही मरने से भयभीत नहीं है, पहले भी भय भीत ही रहा है। वह पूर्वजन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय, बोधिसत्त्व हिमालय में वृक्ष-देवता की योनि में उत्पन्न हुए। उस समय वाराणसी- नरेश ने हस्ति-शिक्षकों को अपना हाथी दिया था ताकि वे उसे निर्भय बनाव। उन्होंने भाले ले, हाथी को पक्की तरह से खूंटे से बांध, उसे घर उसका डर निकालना शुरू किया। इस पीडा को न सह सकने के कारण हाथी ने खूंटा तुड़ा, मनुष्यों को भगा, स्वयं हिमालय में प्रवेश किया। आदमी उसको न पकड़ सकने के कारण वापिस लौट आये। हाथी को वहाँ मरण भय लग गया। वायु के शब्द को सुनकर, कांपता हुआ, मरने के भय से भय-भीत अपनी सूंड को धुनता हुआ जोर से भागता। इसको ऐसा लगता था जैसे खूंटे पर बाँध कर मारा जा रहा हो। शरीर-सुख वा मानसिकसुख एक भी नहीं मिलता था। कांपता हुआ भटकता था। वृक्ष-देवता ने यह देखकर वृक्ष- की शाखा पर खड़े होकर यह गाथा कही— बहुम्पेत्थ वने कट्ठं वातो भञ्जति दुब्बलं, तस्स चे भायसि नाग ! किसो नून भविस्ससि ॥
उदञ्चनि ] ६ [ जगल में हवा से बहुत सारी दुर्बल लकड़ी टूटकर गिरती है । हे नाग ! यदि तू इससे डरेगा, तो तू निश्चय से कमज़ोर हो जायगा । ] एतं दुब्बलं कट्ठ, पुरवा आदि वांतो भञ्जति, यह इस जगल मे बहुत सुलभ है, जहाँ तहाँ है, यदि तू उससे भायसि, तो ऐसा होने पर तो नित्य ही भयभीत रहने के कारण रक्त-मास क्षीण होकर विसो नून भविस्ससि; इस बन में तेरे भयभीत होने की बात है ही नही, इस लिये अब से मत डर । इस प्रकार देवता ने उसे उपदेश दिया । वह भी उस समय से लेकर निर्भीत हो गया । शास्ता ने इस धर्मोपदेश को ला, चारो आर्य-(सत्यो) को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया । सत्य प्रकाशित होने पर यह भिक्षु श्रोतापत्तिफल में प्रतिष्ठित हुआ । उस समय हाथी तो यह भिक्षु था, वृक्ष-देवता में ही था ।
१०६. उदञ्चनि जातक "सुख बत मं जीवन्त" आदि शास्ता ने जेतवन मे रहते समय 'प्रौढ कुमारी के साथ आसक्ति' के सम्बन्ध में कही । क. वर्तमान कथा मूल कथा (=वस्तु) तेरहवें परिच्छेद की चूल नारद काश्यप¹ जातक में आयेगी । उस भिक्षु से शास्ता ने पूछा—"भिक्षु ! क्या तू सचमुच आसक्त है ?"
¹ चूलनारदजातक (४४७)
कारण सुख को प्राप्त हुआ।" कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
१० [ १११२०६ "भगवान् ! सचमुच ।" "तुझे किसमें आसक्ति हुई ?" "एक प्रौढ कुमारी में।" "भिक्षु ! यह तेरे लिये अनर्थकारी है। पहले जन्म में भी तू इसी के कारण सदाचार भ्रष्ट हो कांपता हुआ भटकता था। (फिर) पंडितो के कारण सुख को प्राप्त हुआ।" कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा "पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय" आदि पूर्व समय की कथा भी चुल्ल नारद कस्सप जातक में ही आयेगी। उस समय बोधिसत्त्व ग्राम को फल फूल ले आकर पर्ण-शाला में प्रवेश करके विचरने लगे और अपने पुत्र चुल्लतापस को कहा— "तात ! और दिन तो तुम लकडी लाते थे, पेय तथा खाद्य-सामग्री लाते थे, आग जलाते थे। आज क्या कारण है कि कोई भी काम न करके बुरा मुंह बनाये चिन्तित पडे हो ?" "तात ! आप जब कल फल फूल लेने चले गये थे, तब एक स्त्री आई जो मुझे लुभाकर ले जाना चाहती थी। लेकिन मैं 'आपसे आज्ञा लेकर जाऊँगा' सोच नहीं गया। उसको अमुक स्थान में बिठाकर आया हूँ। तात ! अब मै जाता हूँ।" बोधिसत्त्व ने 'यह रोका नहीं जा सकता' सोच "तो तात ! जाओ ! यह तुम्हे ले जाकर जब मत्स्य-मांस आदि खाने की इच्छा करेगी और घी, नमक तथा तेल आदि मांगेगी और कहगी कि 'यह ला', 'यह ला', तब तू मुझे याद करना और भागकर यहाँ आ जाना" कह चलता किया। वह उसके साथ बस्ती में गया। उसे अपने वश में कर वह 'मांस ला', 'मछली ला' जो जो चाहती, मँगाती। तब उसने 'यह तो मुझे अपने गुलाम की तरह नौकर की तरह पीडा देती है' सोच भागकर पिता के पास आ, उन्हें प्रणाम कर, खडे ही खडे यह गाथा कही— सुख बत म जीवन्त पचमाना उदञ्चनी, घोरी जायप्पवादेन तेल लोणञ्च याचति ॥
उदञ्चनि ] ११ [ जल निकालने की मटकी सदृशा “भार्या” रूप में यह चोरिणी, सुख पूर्वक रहते हुए मुझे मीठे शब्दों से लुभाकर नून तेल माँग माँगकर जलाती है।] सुख घट म जीवन्त, तात ! तुम्हारे पास सुखपूर्वक रहते हुए, पचमाना, संतप्त करती हुई, पीडा देती हुई, जो जो खाना चाहती वह पकाती, उदकं (=पानी) खींचा जाता है इस से, अत उदञ्चनी । चाटी या कुएँ से पानी निकालने की घटी । उसे उदञ्चनी इसलिये कहा क्योकि वह घटी (= घटिया) के पानी निकालने की तरह जो जो चाहती सो अवश्य निकालती । चोरी जाप्यवादेन; “नाम से तो 'भार्या' लेकिन एक चौरिणी मीठे मीठे शब्दों से मुझे लुभा वहाँ ले जाकर निमक तेल तथा और भी जो जो चाहती वह सब मांगती, जैसे दास या नौकर से वैसे मँगवाती । (यह) कह उसकी निन्दा की । बोधिसत्व ने उसे आश्वासन देकर “तात ! जो हुआ सो हुआ । आ अब तू मैत्री भावना कर । करुणा भावना कर ।” कह चारो ब्रह्मविहारो को कहा । योगक्रिया कही । वह थोडे ही समय मे अभिञ्ज्ञा तथा समापत्तियो को प्राप्त कर, ब्रह्मविहारो की भावना कर, अपने पिता सहित ब्रह्मलोक मे उत्पन्न हुआ । शास्ता ने इस धर्म-देशना को ला, आर्य-सत्यो को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया । सत्यो के प्रकाशित होने पर वह भिक्षु श्रोता- पत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ । उस समय की प्रौढ कुमारी ही आजकल की प्रौढकुमारी तथा चूलतापस ही आसक्त भिक्षु था । पिता तो मै था ही ।