जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउदञ्चनि ] ११ [ जल निकालने की मटकी सदृशा “भार्या” रूप में यह चोरिणी, सुख पूर्वक रहते हुए मुझे मीठे शब्दों से लुभाकर नून तेल माँग माँगकर जलाती है।] सुख घट म जीवन्त, तात ! तुम्हारे पास सुखपूर्वक रहते हुए, पचमाना, संतप्त करती हुई, पीडा देती हुई, जो जो खाना चाहती वह पकाती, उदकं (=पानी) खींचा जाता है इस से, अत उदञ्चनी । चाटी या कुएँ से पानी निकालने की घटी । उसे उदञ्चनी इसलिये कहा क्योकि वह घटी (= घटिया) के पानी निकालने की तरह जो जो चाहती सो अवश्य निकालती । चोरी जाप्यवादेन; “नाम से तो 'भार्या' लेकिन एक चौरिणी मीठे मीठे शब्दों से मुझे लुभा वहाँ ले जाकर निमक तेल तथा और भी जो जो चाहती वह सब मांगती, जैसे दास या नौकर से वैसे मँगवाती । (यह) कह उसकी निन्दा की । बोधिसत्व ने उसे आश्वासन देकर “तात ! जो हुआ सो हुआ । आ अब तू मैत्री भावना कर । करुणा भावना कर ।” कह चारो ब्रह्मविहारो को कहा । योगक्रिया कही । वह थोडे ही समय मे अभिञ्ज्ञा तथा समापत्तियो को प्राप्त कर, ब्रह्मविहारो की भावना कर, अपने पिता सहित ब्रह्मलोक मे उत्पन्न हुआ । शास्ता ने इस धर्म-देशना को ला, आर्य-सत्यो को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया । सत्यो के प्रकाशित होने पर वह भिक्षु श्रोता- पत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ । उस समय की प्रौढ कुमारी ही आजकल की प्रौढकुमारी तथा चूलतापस ही आसक्त भिक्षु था । पिता तो मै था ही ।