जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१० [ १११२०६ "भगवान् ! सचमुच ।" "तुझे किसमें आसक्ति हुई ?" "एक प्रौढ कुमारी में।" "भिक्षु ! यह तेरे लिये अनर्थकारी है। पहले जन्म में भी तू इसी के कारण सदाचार भ्रष्ट हो कांपता हुआ भटकता था। (फिर) पंडितो के कारण सुख को प्राप्त हुआ।" कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा "पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय" आदि पूर्व समय की कथा भी चुल्ल नारद कस्सप जातक में ही आयेगी। उस समय बोधिसत्त्व ग्राम को फल फूल ले आकर पर्ण-शाला में प्रवेश करके विचरने लगे और अपने पुत्र चुल्लतापस को कहा— "तात ! और दिन तो तुम लकडी लाते थे, पेय तथा खाद्य-सामग्री लाते थे, आग जलाते थे। आज क्या कारण है कि कोई भी काम न करके बुरा मुंह बनाये चिन्तित पडे हो ?" "तात ! आप जब कल फल फूल लेने चले गये थे, तब एक स्त्री आई जो मुझे लुभाकर ले जाना चाहती थी। लेकिन मैं 'आपसे आज्ञा लेकर जाऊँगा' सोच नहीं गया। उसको अमुक स्थान में बिठाकर आया हूँ। तात ! अब मै जाता हूँ।" बोधिसत्त्व ने 'यह रोका नहीं जा सकता' सोच "तो तात ! जाओ ! यह तुम्हे ले जाकर जब मत्स्य-मांस आदि खाने की इच्छा करेगी और घी, नमक तथा तेल आदि मांगेगी और कहगी कि 'यह ला', 'यह ला', तब तू मुझे याद करना और भागकर यहाँ आ जाना" कह चलता किया। वह उसके साथ बस्ती में गया। उसे अपने वश में कर वह 'मांस ला', 'मछली ला' जो जो चाहती, मँगाती। तब उसने 'यह तो मुझे अपने गुलाम की तरह नौकर की तरह पीडा देती है' सोच भागकर पिता के पास आ, उन्हें प्रणाम कर, खडे ही खडे यह गाथा कही— सुख बत म जीवन्त पचमाना उदञ्चनी, घोरी जायप्पवादेन तेल लोणञ्च याचति ॥