भारतकोश
जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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१२ [ १.११.१०७ १०७. सालित्त जातक “साधु खो सिप्पक नाम” आदि शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक हंस-मार भिक्षु के बारे में कही। क. वर्तमान कथा वह श्रावस्तीवासी कुलपुत्र सालित्तक शिल्प में पारङ्गत था। सालित्तक शिल्प कहते हैं ठीकरी चलाने के हुनर को। एक दिन उसने धर्मोपदेश सुन, बुद्ध (-शासन) म श्रद्धायुक्त हो प्रव्रजित होकर उपसम्पदा प्राप्त की। लेकिन न उसे शिक्षा की इच्छा थी न उसके अनुसार आचरण करने की। एक दिन वह एक छोटे भिक्षु को साथ ले अचिरवती (नदी) पर गया। वहाँ स्नान करके खडा था कि, उसी समय आकाश में दो सफेद हंसो को उडते देखा। उसने छोटे भिक्षु से कहा— “इनमे जो पिछला हंस है, उसकी आँख को ककर से वींधकर हंस को अपने पैरो में गिराता हूँ।” “कैसे गिरायेगा ? मार ही न सकेगा।” “इधर की आँख रहे। मै इसकी उधर की आँख में मारूँगा।” “असम्भव बात कहते हो ?” “तो देख” कह उसने एक तीखी ठीकरी ले उँगली से तान उस हंस के पीछे फेंकी। ठीकरी ने रुँ करके आवाज की। हंस “खतरा होगा” सोच, रुककर शब्द सुनने लगा। उसने उसी समय एक गोल ककर ले, रुककर देखते हुए हंस के दूसरी ओर की आँख में मारा। ककर दूसरी ओर की आँख बींधता गया ! हंस भिल्लाता हुआ पैरो में आकर गिरा। भिक्षुओं ने इधर उधर से आकर उसकी निन्दा की कि “तू ने नामुना- सिव किया' और शास्ता के पास लेजाकर कह दिया कि 'इसने यह यह किया।'