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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

१०२. पण्णिक जातक

२ [ १.११.१०२ १०२. पण्णिक जातक “यो दुक्खफुट्ठाय भयेय्य ताण .” आदि (की कथा) शास्ता ने जेत- वन में रहते समय एक दुकानदार उपासक के सम्बन्ध में कही। क. वर्तमान कथा वह श्रावस्ती निवासी उपासक नाना प्रकार की जड़ी-बूटी तथा लौकी- कद्दू आदि बेच कर गुजारा करता था। उसकी एक लडकी थी। रूपवान, सुन्दर, सदाचारिणी तथा लज्जा-भय से युक्त, (लेकिन साथ ही) सदा हँसती रहती थी। बराबरी के कुलवालो ने लडकी को ब्याहने आने (की इच्छा करने ) पर, वह सोचने लगा— “इसकी शादी होगी। यह सदैव हँसती रहती है। क्वारपन को नष्ट करके यदि कुमारी दूसरे कुल में जाती है, तो माता पिता के लिये निन्दा का कारण होती है। मैं इसकी परीक्षा करूँगा कि इसका क्वारपन स्वरक्षित है कि नहीं ?” एक दिन उसने लडकी से टोकरी उठवा, पत्तो के लिये जगल में जाकर, उसकी परीक्षा करने की इच्छा से, कामासक्त की भाँति हो, गुप्त बात कह उस हाथ से धर लिया। जैसे ही उसे पकडा उसने रोते चिल्लाते हुए कहा— “तात ! यह नामुनासिब है, यह पानी से आग निकलने के सदृश है। ऐसा न करें।” “धम्म ! मैने केवल परीक्षा करने के लिए ही तुझे हाथ से धरा था। अब, बता कि तेरा क्वारपन (सुरक्षित) है या नहीं ?” “हाँ तात ! है। मैने राग के वशीभूत हो किसी भी पुरुष की ओर नही देखा।” उसने लडकी को आश्वासन दे घर ले जा, विवाह करके पराये कुल भेजा। (फिर) शास्ता की वन्दना करने की इच्छा से, गन्ध-माला आदि हाथ में ले,

न केवल अभी किन्तु, पहले भी उसकी परीक्षा की है' कह पूर्वजन्म की कथा

पण्णिक ] ३ जेतवन पहुँच, शास्ता की वन्दना तथा पूजा करके एक ओर बैठा । "चिर- काल के बाद आये ?" पूछे जाने पर उसने भगवान को वह सब हाल कहा । शास्ता ने 'उपासक ! तुम्हारी तो चिरकाल से सदाचारिणी है, लेकिन तूने न केवल अभी किन्तु, पहले भी उसकी परीक्षा की है' कह पूर्वजन्म की कथा कही- ख. अतीत कथा पूर्वकाल मे वाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय, बोधिसत्त्व जगल मे वृक्ष-देवता होकर उत्पन्न हुए। उस समय वाराणसी मे एक दुकान- दार उपासक था इत्यादि कथा वर्तमान कथा के सदृश ही है। हाँ, परीक्षा करने के लिए उसने जब लडकी को हाथो से धरा, तो लडकी ने रोते रोते यह गाथा कही- यो दुक्खफुट्ठाय भवेय्य ताण सो मे पिता दूभि वने करोति, सा कस्स कन्दामि वनस्स मज्झे यो तायिता सो सहसा करोति ॥ [ कष्ट मे पडने पर, जिसे त्राता होना चाहिये, वही मेरा पिता जगल म विश्वास-घात कर रहा है। सो मे जगल मे किसे (सहायता के लिये) बुलाऊँ ? जो त्राता है, वही दुस्साहस कर रहा है।] यो दुक्खफुट्ठाय भवेय्य ताण का अर्थ है कि जो शारीरिक अथवा मान- सिक दुख से पीडित का त्राण करता है, परित्राण करता है, तथा प्रतिष्ठा का कारण होता है। सो मे पिता दूभि वने करोति का अर्थ है कि वह दुख से परित्राण करनेवाला मेरा पिता ही यहाँ इस प्रकार का मित्र-द्रोही कर्म करता है, अपनी निज की पुत्री (के शील) को ही लांघना चाहता है। सा कस्स कन्दामि का मतलब है कि किसके पास रोऊँ ? कौन मुझे बचायेगा ? यो तायिता सो सहसा करोति, का अर्थ हुआ कि जो पिता मेरा त्राता है, रक्षक है, आश्रय दाता होने योग्य, वह पिता ही दुस्साहस कर रहा है।

शास्ता ने यह धर्म-देशना सुना, (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर, जातक

४ [ १११.१०३ तब पिता ने उसे आश्वासन देकर पूछा—"अम्मे ! तूने अपने आप को सुरक्षित तो रखा है ?" "हाँ, तात ! मैने अपने आपको (सँभाल कर) रक्खा है।" उसने उसे घर ले जा विवाह कर, पराये कुल भेज दिया । शास्ता ने यह धर्म-देशना सुना, (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर, जातक का मेल बैठाया । सत्यों (के प्रकाशन) के अन्त में उपासक स्रोतापत्तिफल में प्रतिष्ठित हुआ । उस समय का पिता ही इस समय का पिता; लड़की ही इस समय की लड़की है। लेकिन उस बात को प्रत्यक्ष देखनेवाला वृक्ष- देवता तो मै ही था । १०३. वेरी जातक "यत्थ वेरी निजसति ." आदि गाथा शास्ता ने जेतवन में रहते समय अनाथ पिण्डिक के सम्बन्ध से कही । क. वर्तमान कथा अनाथ पिण्डिक ने अपने भोग-ग्राम¹ से लौटते हुए रास्ते में चोरो को देख- कर सोचा—"रास्ते मे रहना ठीक नही। श्रावस्ती ही जाकर रहूँगा ।" यह सोच जल्दी जल्दी बैलो को हांक, श्रावस्ती पहुँच, अगले दिन जब विहार गया, तो शास्ता को यह बात कही। शास्ता ने "गृहपति ! पूर्व समय में भी पण्डित-जन रास्ते में चोरो को देखकर रास्ते म न ठहर, अपने रहने के स्थान पर ही चले गये ' कह उसके पूछने पर पूर्व-जन्म की कथा कही— ¹ भोगग्राम=जमींदारी का ग्राम ।

ख. अतीत कथा

बेरी ] ५ ख. अतीत कथा पूर्व समय में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व महासम्पत्ति- शाली सेठ होकर पैदा हुआ। एक गांव में निमन्त्रण खाकर लौटने समय रास्ते में चोरो को देख वहीं नहीं ठहरा। जल्दी जल्दी बैलो को हाँक, अपने घर ही आकर नाना प्रकार के श्रेष्ठरसो से युक्त भोजन करके महाशय्या पर (लेटा। उस समय 'चोरो के हाथ से निकलकर भयरहित स्थान अपने घरपर आ गया हूँ' सोच, उल्लासपूर्वक यह गाथा कही— यत्थ वेरी निवसति न वसे तत्थ पण्डितो, एकरत्तं द्विरत्तं वा दुक्खं वसति वेरिसु ॥ [जहाँ पर वैरी का निवास हो, पण्डित आदमी को चाहिये कि वहाँ निवास न करे। क्योकि वैरी के साथ एक या दो रात्रि रहनेवाला भी दुःख ही भोगता है।] ────── वेरी, वैर-भाव से युक्त आदमी। निवसति, प्रतिष्ठित रहता है। न वसे तत्थ पण्डितो, जहाँ वह वैरी आदमी प्रतिष्ठित होकर रहता है, पाण्डित्य से युक्त पण्डित-जन को चाहिये कि वहाँ न रहे। किस कारण से ? एकरत्तं द्विरत्त वा दुक्ख वसति वेरिसु, वैरियों के बीच में (केवल) एक या दो दिन रहता हुआ भी दुःख ही भोगता है। ────── बोधिसत्त्व इस प्रकार हर्ष ध्वनि करके दान-यादि पुण्य-धर्म कर यथाकर्म (परलोक) सिधारे। शास्ता ने इस धर्म-देशना को ला, जातक का मेल बैठाया कि उस समय मैं ही वाराणसी का सेठ था।

१०४. मित्तविन्द जातक

६ [ १.११.१०४ १०४. मित्तविन्द जातक “चतुब्भि अट्ठज्झगमा” आदि शास्ता ने जेतवन में रहते समय, एक दुर्भाषी भिक्षु के बारे में कही। क. वर्तमान कथा पहले आई मित्तविन्द जातक की कहानी के सदृश ही यह कहानी भी जाननी चाहिये। ख. अतीत कथा लेकिन यह जातक कथा है काश्यप-सम्बुद्ध के समय की। उस समय एक नरक-निवासी ने, जिसके सिर पर घूमनेवाला चक्र¹ था और जो नरक में जल रहा था, बोधिसत्त्व से पूछा—“भन्ते ! मैने क्या पापकर्म किया है ?” बोधि- सत्त्व ने “तूने अमुक और अमुक पापकर्म किया है” कह यह गाथा कही— चतुब्भि अट्ठज्झगमा अट्ठाहिपि च सोळस सोळसाहि च बत्तिस अतिच्छं चक्कमासदो; इच्छाहुतस्स पोसस्स चक्कं भमति मत्थके ॥ [ चार से आठ, आठ से सोलह, और सोलह से बत्तीस की इच्छा करने के कारण यह सिर पर घूमनेवाला चक्र प्राप्त हुआ। क्योंकि इच्छा (लोभ) से ताड़ित मनुष्य के सिर पर चक्र भ्रमता है।] ¹ उरचक्र—पालि-कोष में (रीजडेविड्स ने) उर-चक्र का अर्थ छाती पर रक्खा लोहे का चक्र किया है, जो यथार्थ नहीं। 'उर' शब्द वैदिक है, जिसका अर्थ है गतिमान्।

दुब्बलकट्ठ ] ७ चतुब्भि अट्ठज्झगमा, समुद्र मे चार परियो ( विमान प्रेतनीयो ) को पाकर, उन से सन्तुष्ट न हो, लोभ के कारण और आठ को प्राप्त किया। शेष दो पदो का अर्थ भी इसी प्रकार है। अतिच्छ चक्कम्रासदो इस प्रकार स्वकीय लाभ से असन्तुष्ट इस इस चीज की प्राप्ति होने पर, और और चीज की इच्छा करते हुए, अब इस उर-चक्र को प्राप्त हुए। उसके इस प्रकार इच्छाहातस्स पोसस्स तृष्णा से प्रताडित तेरे चक्क भमति मत्थके, पत्थर तथा लोहे के दो प्रकार के चक्रो मे से तेज धार वाला लोहे का चक्र, फिर फिर उसके माथे पर गिरने से ऐसा कहा गया। यह कहकर (बोधिसत्व) स्वय देवलोक को गये। वह नरकगामी प्राणी भी अपने पापकर्मो के क्षीण होने पर कर्मानुसार अवस्था को प्राप्त हुआ। शास्ता ने इस धर्म-देशना को ला जातक का मेल बैठाया—उस समय मित्र-विन्दक (अब का) दुर्भागीभिक्षु था, और देवपुत्र तो मैं ही था। १०५. दुब्बलकट्ठ जातक “बहुम्पेतं वने कट्ठ” आदि शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक भय- भीत भिक्षु के बारे में कही। क. वर्तमान कथा वह श्रावस्ती-निवासी, तरुण, शास्ता का धर्मोपदेश सुन, प्रव्रजित हो मरने से भयभीत रहता था। रात या दिन मे हवा के चलने पर, सूखी-डण्ठलो के गिरने पर तथा पक्षिया या चौपायो के कुछ शब्द करने पर, मरण-भय से डरकर वह जोर से चिल्लाता हुआ भागता। 'मुझे भी मरना होगा', इसका उसे ध्यान तक न था। यदि वह यह जानता कि “मै मरूँगा” तो उसे मरने

८ [ १.११-१०५ से डर न लगता। वह मरण-स्मृति योग-विधि (=कर्मस्थान) का अन- भ्यासी होने से ही डरता था। उसकी मृत्युभय से भयभीत होने की बात भिक्षु- संघ को पता लग गई। सो एक दिन भिक्षुओं ने धर्म-सभा में बात चलाई —आयुष्मन्तो ! अमुक मरण-भीरु भिक्षु मृत्यु से डरता है। भिक्षु को तो चाहिये कि वह 'मुझे अवश्य ही मरना है' इस मरण-स्मृति कर्मस्थान की भावना करे। शास्ता ने आकर पूछा—"भिक्षुओ ! इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?" "यह बातचीत कहने पर भगवान् ने उस भिक्षु को बुलवाया और पूछा—क्या तुझे सचमुच मरने से डर लगता है ? "भन्ते ! सचमुच !" "भिक्षुओ ! इस भिक्षु से असन्तुष्ट मत होओ। यह भिक्षु केवल अब ही मरने से भयभीत नहीं है, पहले भी भय भीत ही रहा है। वह पूर्वजन्म की कथा कही—

ख. अतीत कथा

पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय, बोधिसत्त्व हिमालय में वृक्ष-देवता की योनि में उत्पन्न हुए। उस समय वाराणसी- नरेश ने हस्ति-शिक्षकों को अपना हाथी दिया था ताकि वे उसे निर्भय बनाव। उन्होंने भाले ले, हाथी को पक्की तरह से खूंटे से बांध, उसे घर उसका डर निकालना शुरू किया। इस पीडा को न सह सकने के कारण हाथी ने खूंटा तुड़ा, मनुष्यों को भगा, स्वयं हिमालय में प्रवेश किया। आदमी उसको न पकड़ सकने के कारण वापिस लौट आये। हाथी को वहाँ मरण भय लग गया। वायु के शब्द को सुनकर, कांपता हुआ, मरने के भय से भय-भीत अपनी सूंड को धुनता हुआ जोर से भागता। इसको ऐसा लगता था जैसे खूंटे पर बाँध कर मारा जा रहा हो। शरीर-सुख वा मानसिकसुख एक भी नहीं मिलता था। कांपता हुआ भटकता था। वृक्ष-देवता ने यह देखकर वृक्ष- की शाखा पर खड़े होकर यह गाथा कही— बहुम्पेत्थ वने कट्ठं वातो भञ्जति दुब्बलं, तस्स चे भायसि नाग ! किसो नून भविस्ससि ॥

उदञ्चनि ] ६ [ जगल में हवा से बहुत सारी दुर्बल लकड़ी टूटकर गिरती है । हे नाग ! यदि तू इससे डरेगा, तो तू निश्चय से कमज़ोर हो जायगा । ] एतं दुब्बलं कट्ठ, पुरवा आदि वांतो भञ्जति, यह इस जगल मे बहुत सुलभ है, जहाँ तहाँ है, यदि तू उससे भायसि, तो ऐसा होने पर तो नित्य ही भयभीत रहने के कारण रक्त-मास क्षीण होकर विसो नून भविस्ससि; इस बन में तेरे भयभीत होने की बात है ही नही, इस लिये अब से मत डर । इस प्रकार देवता ने उसे उपदेश दिया । वह भी उस समय से लेकर निर्भीत हो गया । शास्ता ने इस धर्मोपदेश को ला, चारो आर्य-(सत्यो) को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया । सत्य प्रकाशित होने पर यह भिक्षु श्रोतापत्तिफल में प्रतिष्ठित हुआ । उस समय हाथी तो यह भिक्षु था, वृक्ष-देवता में ही था ।

१०६. उदञ्चनि जातक "सुख बत मं जीवन्त" आदि शास्ता ने जेतवन मे रहते समय 'प्रौढ कुमारी के साथ आसक्ति' के सम्बन्ध में कही । क. वर्तमान कथा मूल कथा (=वस्तु) तेरहवें परिच्छेद की चूल नारद काश्यप¹ जातक में आयेगी । उस भिक्षु से शास्ता ने पूछा—"भिक्षु ! क्या तू सचमुच आसक्त है ?"


¹ चूलनारदजातक (४४७)

कारण सुख को प्राप्त हुआ।" कह पूर्व-जन्म की कथा कही—

१० [ १११२०६ "भगवान् ! सचमुच ।" "तुझे किसमें आसक्ति हुई ?" "एक प्रौढ कुमारी में।" "भिक्षु ! यह तेरे लिये अनर्थकारी है। पहले जन्म में भी तू इसी के कारण सदाचार भ्रष्ट हो कांपता हुआ भटकता था। (फिर) पंडितो के कारण सुख को प्राप्त हुआ।" कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा "पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय" आदि पूर्व समय की कथा भी चुल्ल नारद कस्सप जातक में ही आयेगी। उस समय बोधिसत्त्व ग्राम को फल फूल ले आकर पर्ण-शाला में प्रवेश करके विचरने लगे और अपने पुत्र चुल्लतापस को कहा— "तात ! और दिन तो तुम लकडी लाते थे, पेय तथा खाद्य-सामग्री लाते थे, आग जलाते थे। आज क्या कारण है कि कोई भी काम न करके बुरा मुंह बनाये चिन्तित पडे हो ?" "तात ! आप जब कल फल फूल लेने चले गये थे, तब एक स्त्री आई जो मुझे लुभाकर ले जाना चाहती थी। लेकिन मैं 'आपसे आज्ञा लेकर जाऊँगा' सोच नहीं गया। उसको अमुक स्थान में बिठाकर आया हूँ। तात ! अब मै जाता हूँ।" बोधिसत्त्व ने 'यह रोका नहीं जा सकता' सोच "तो तात ! जाओ ! यह तुम्हे ले जाकर जब मत्स्य-मांस आदि खाने की इच्छा करेगी और घी, नमक तथा तेल आदि मांगेगी और कहगी कि 'यह ला', 'यह ला', तब तू मुझे याद करना और भागकर यहाँ आ जाना" कह चलता किया। वह उसके साथ बस्ती में गया। उसे अपने वश में कर वह 'मांस ला', 'मछली ला' जो जो चाहती, मँगाती। तब उसने 'यह तो मुझे अपने गुलाम की तरह नौकर की तरह पीडा देती है' सोच भागकर पिता के पास आ, उन्हें प्रणाम कर, खडे ही खडे यह गाथा कही— सुख बत म जीवन्त पचमाना उदञ्चनी, घोरी जायप्पवादेन तेल लोणञ्च याचति ॥

उदञ्चनि ] ११ [ जल निकालने की मटकी सदृशा “भार्या” रूप में यह चोरिणी, सुख पूर्वक रहते हुए मुझे मीठे शब्दों से लुभाकर नून तेल माँग माँगकर जलाती है।] सुख घट म जीवन्त, तात ! तुम्हारे पास सुखपूर्वक रहते हुए, पचमाना, संतप्त करती हुई, पीडा देती हुई, जो जो खाना चाहती वह पकाती, उदकं (=पानी) खींचा जाता है इस से, अत उदञ्चनी । चाटी या कुएँ से पानी निकालने की घटी । उसे उदञ्चनी इसलिये कहा क्योकि वह घटी (= घटिया) के पानी निकालने की तरह जो जो चाहती सो अवश्य निकालती । चोरी जाप्यवादेन; “नाम से तो 'भार्या' लेकिन एक चौरिणी मीठे मीठे शब्दों से मुझे लुभा वहाँ ले जाकर निमक तेल तथा और भी जो जो चाहती वह सब मांगती, जैसे दास या नौकर से वैसे मँगवाती । (यह) कह उसकी निन्दा की । बोधिसत्व ने उसे आश्वासन देकर “तात ! जो हुआ सो हुआ । आ अब तू मैत्री भावना कर । करुणा भावना कर ।” कह चारो ब्रह्मविहारो को कहा । योगक्रिया कही । वह थोडे ही समय मे अभिञ्ज्ञा तथा समापत्तियो को प्राप्त कर, ब्रह्मविहारो की भावना कर, अपने पिता सहित ब्रह्मलोक मे उत्पन्न हुआ । शास्ता ने इस धर्म-देशना को ला, आर्य-सत्यो को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया । सत्यो के प्रकाशित होने पर वह भिक्षु श्रोता- पत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ । उस समय की प्रौढ कुमारी ही आजकल की प्रौढकुमारी तथा चूलतापस ही आसक्त भिक्षु था । पिता तो मै था ही ।

१०७. सालित्त जातक

१२ [ १.११.१०७ १०७. सालित्त जातक “साधु खो सिप्पक नाम” आदि शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक हंस-मार भिक्षु के बारे में कही। क. वर्तमान कथा वह श्रावस्तीवासी कुलपुत्र सालित्तक शिल्प में पारङ्गत था। सालित्तक शिल्प कहते हैं ठीकरी चलाने के हुनर को। एक दिन उसने धर्मोपदेश सुन, बुद्ध (-शासन) म श्रद्धायुक्त हो प्रव्रजित होकर उपसम्पदा प्राप्त की। लेकिन न उसे शिक्षा की इच्छा थी न उसके अनुसार आचरण करने की। एक दिन वह एक छोटे भिक्षु को साथ ले अचिरवती (नदी) पर गया। वहाँ स्नान करके खडा था कि, उसी समय आकाश में दो सफेद हंसो को उडते देखा। उसने छोटे भिक्षु से कहा— “इनमे जो पिछला हंस है, उसकी आँख को ककर से वींधकर हंस को अपने पैरो में गिराता हूँ।” “कैसे गिरायेगा ? मार ही न सकेगा।” “इधर की आँख रहे। मै इसकी उधर की आँख में मारूँगा।” “असम्भव बात कहते हो ?” “तो देख” कह उसने एक तीखी ठीकरी ले उँगली से तान उस हंस के पीछे फेंकी। ठीकरी ने रुँ करके आवाज की। हंस “खतरा होगा” सोच, रुककर शब्द सुनने लगा। उसने उसी समय एक गोल ककर ले, रुककर देखते हुए हंस के दूसरी ओर की आँख में मारा। ककर दूसरी ओर की आँख बींधता गया ! हंस भिल्लाता हुआ पैरो में आकर गिरा। भिक्षुओं ने इधर उधर से आकर उसकी निन्दा की कि “तू ने नामुना- सिव किया' और शास्ता के पास लेजाकर कह दिया कि 'इसने यह यह किया।'

में हुशियार है, बल्कि पहले भी हुशियार ही था" कह पूर्वजन्म की कथा कही—

सालित्त ] १३ शास्ता ने उसकी निन्दा करते हुए "भिक्षुओ ! न केवल अभी यह इस हुनर में हुशियार है, बल्कि पहले भी हुशियार ही था" कह पूर्वजन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में बाराणसी में राजा ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधि- सत्त्व उसके आमात्य (होकर उत्पन्न हुए) थे। राजा का तत्कालीन पुरोहित बडा बुलक्कड था—बोलना आरम्भ करता तो किसी दूसरे को बोलने का मौका ही न मिलता। राजा सोचने लगा—'इसका मुंह बन्द करनेवाला कोई कब मिलेगा ?" और तब से ऐसे आदमी की खोज मे रहने लगा। उन दिनो वाराणसी में एक कुबडा ककर फेकने के हुनर मे पारगत था। गाँव के लडके वाले उसे ठेले (रथक) पर चढा खीच कर, वाराणसी नगर के दरवाजे पर शाखाग्रो से युक्त एक महान्न्यग्रोध (वृक्ष) के नीचे ले आते, और उसे घेर कर तथा कौडी आदि दे कहते "हाथी की शक्ल बनाओ । घोडे की शक्ल बनाओ।" वह ककर चला चलाकर न्यग्रोध के पत्तो में भिन्न भिन्न तरह की शक्लें बनाता। सभी पत्तो में छेद हो गये। वाराणसी नरेश सैर को जाते समय उस जगह आये। भगा दिये जाने के भय से लडके वाले भाग गये। कुबडा वही पड रहा। राजा ने न्यग्रोध वृक्ष के नीचे रथ पर बैठे ही बैठे, छिद्रित पत्तो के कारण धूप-छनी छाया देख, सभी पत्तो को छिद्रित पा पूछा—ऐसा किसने किया ?" "देव ! कूबडे ने।" 'यह ब्राह्मण का मुंह बन्द कर सकेगा' सोच राजा ने पूछा—"कुबडा कहाँ है ?" खोज करनेवालो ने कुबडे को वृक्ष की जड में पडे देख कहा "देव ! यहाँ है।" राजा ने उसे बुलवा, लोगों को दूर हटवा, उस से पूछा—"हमारे यहाँ एक बुलक्कड ब्राह्मण है, क्या तू उसे निश्शब्द कर सकेगा ?" "देव ! यदि नलकी भर बकरी के मेगन मिले तो कर सकूँगा।" राजा कुबडे को घर ले गया, और कनात के भीतर बैठाया। (फिर) कनात में एक छेद कर ब्राह्मण के बैठने का आसन उस छेद की ठीक सीध में

१४ [ १.११.१०७ बिछवाया । नलकी भर बकरी की सूखी मींगन कुबड़े के पास रखवा दी । जिस समय ब्राह्मण हजूरी मे आया, उसे उस आसन पर बिठाना, राजा ने बात चीत चलाई । किसी दूसरे को बोलने का अवसर न दे, ब्राह्मण ने राजा से बोलना शुरू किया । बनात के छेद मे से मक्खी डालने की तरह वह कुबड़ा एक एक मींगन ब्राह्मण के तालु के अन्दर गिराता रहा । नलिया मे तेल डालने की तरह ब्राह्मण जो जो मींगनें आती उन्हें निगल जाता । सब खतम हो गईं । उसके पेट में गई नलकी भर बकरी की मींगनें आधे आळ्हक१ भर थी । राजा ने उन्हें खतम हुआ जान कहा—"आचार्य ! अति भुलक्कड़ होने के कारण आपको नलकी भर बकरी की मीगने निगल जाने पर भी पता नहीं लगा । अब इससे अधिक हजम न कर सकोगे । जाओ कगनी या पानी पीकर इन्हें निकाल अपने को स्वस्थ करो ।" उस दिन से मानो ब्राह्मण का मुख सिल गया । बातचीत करनेवाले के साथ भी बातचीत न करता । 'इसने मुझे कर्ण-सुख दिया है' सोच राजा ने कुबड़े को चारो दिशा मे लाख की आमदनी के चार गाँव दिये । बोधिसत्व ने राजा के पास आ 'देव ! बुद्धिमान् आदमी को हुनर सीखना चाहिए । कुबड़े ने केवल कंकर फेंकने (की कला से) भी सम्पत्ति पैदा कर ली' कह, यह गाथा कही— साधु खो सिप्पकं नाम अपि यादिसकीदिसं, पस्स खज्जप्पहारेन लद्धा गामा चतुद्दिशा ॥ [जैसा कैसा भी हो, हुनर सीखना अच्छा है । देखो ! कुबड़े ने (मींगनो के) फेकने (के हुनर) से ही चारो दिशाओ में गाँव पा लिये ।] पस्स खज्जप्पहारेन, महाराज ! देखो इस कुबड़े ने बकरी की मींगन के निशाने लगाने मात्र से ही चारो दिशाओ में चार गाँव पा लिये । अन्य शिल्पो की महिमा का तो क्या ही कहना—इस प्रकार हुनर सीखने की महिमा का वर्णन किया । १ १६ पसत=एक आळ्हक ।

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला, जातक का मेल बैठाया। उस समय

बाहिय ] १५ शास्ता ने यह धर्मदेशना ला, जातक का मेल बैठाया। उस समय का कुबडा यह भिक्षु है। राजा आनन्द है। और पण्डित मन्त्री तो मैं ही हूँ। १०८. बाहिय जातक “सिक्खेय्य सिक्खितब्बानि...” को शास्ता ने वैशाली के आश्रित महावन की कूटागार शाला मे रहते समय एक लिच्छवि के सम्बन्ध से कहा। क. वर्तमान कथा वह लिच्छवि राजा श्रद्धाप्रसन्न था। उसने भिक्षुसंघ सहित बुद्ध को अपने घर निमन्त्रित कर महादान दिया। उसकी भार्या मोटी, सूजी हुई सी थी और उसको सलीके से रहने का शऊर नही था। शास्ता भोजनोपरान्त दानानुमोदन कर, विहार जा भिक्षुओ को उपदेश दे, गन्धकुटी में प्रविष्ट हुए। धर्मसभा मे भिक्षुओ ने बातचीत चलाई—'आयुष्मानो ! वह लिच्छवि-नरेश तो इतना सुन्दर है, लेकिन उसकी भार्या मोटी, सूजी हुई सी है तथा उसे सलीके से रहने का शऊर नहीं। राजा उसके साथ कैसे रहता है ?” शास्ता ने आकर पूछा— "भिक्षुओ ! इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?” "यह बातचीत" कहने पर शास्ता ने "भिक्षुओ ! न केवल अभी, किन्तु पहले भी यह मोटे शरीरवाली स्त्री के साथ ही रहता था" कह, उनके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा "पूर्व समय में वाराणसी में जब ब्रह्मदत्त राज्य करता था, उस समय बोधिसत्व उसके आमात्य थे। मुफस्सल की एक स्थूल शरीर स्त्री जिसे

१६ [ १.११.१०८

सलीक़ा नही था, मजदूरी करती थी। राजाङ्गन से थोड़ी दूर पर जाते हुए उसे शौच की हाजत हुई। जो वस्त्र पहने हुए थी, उसी से शरीर को ढक कर बैठ गई और हाजत रफ़ा कर तुरन्त उठ खड़ी हुई। झरोखे से राजाङ्गण देखते हुए वाराणसी राजा की उस पर नजर पड़ी। वह सोचने लगा—"इस प्रकार के (खुले) प्राङ्गन में बिना लज्जा को छोड़े वस्त्र से ढके ही ढके, शौच फिरकर यह जल्दी से खड़ी हो गई। यह निरोग होगी। इसकी कोख अति परिशुद्ध होगी। परिशुद्ध-कोख से उत्पन्न हुआ पुत्र भी अति पवित्र तथा पुण्यवान् होगा। मुझे चाहिए कि मैं इसे अपनी पटरानी बनाऊँ।"

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय के

कुण्डकपूव ] १७ इस प्रकार बोधिसत्व ने सीखनेयोग्य शिल्पो (के सीखने) का माहात्म्य कहा। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय के पति-पत्नी ही अब के पति-पत्नी। पण्डित अमात्य तो मैं ही था। १०६. कुण्डकपूव जातक “ययन्नो पुरिसो होति” यह शास्ता ने श्रावस्ती में रहते समय, एक महा दरिद्र (मनुष्य) के सम्बन्ध से कही। क. वर्तमान कथा श्रावस्ती म कभी एक ही परिवार बुद्ध तथा उनके सघ को दान देता, कभी तीन चार परिवार एक मे मिलकर, कभी एक गण, कभी एक गली के लोग, कभी सारे नगर के लोग मिलकर। उस समय एक गली के लोग मिलकर दान दे रहे थे। मनुष्य बुद्ध तथा सघ को यवागु परोसकर कहने लगे “खाजा लाभो।” उस गली में रहनेवाले, दूसरो की मजदूरी करके जीनेवाल, एक दरिद्र मनुष्य ने सोचा—"में यवागू नही दे सकता। खाजा दूँगा।" (यह सोच) उसने चावल की बहुत बारीक कनखी ले, छाज से फटक कर पानी से भिगो, आक के पत्तो में रख, भाग मे पकाया। फिर 'यह बुद्ध को दूंगा' सोच उसे ले जाकर शास्ता के सामने खडा हुआ। (लोगो ने) 'खाजा लाभो' पहली बार कहा ही था कि उसने सबसे पहले जाकर शास्ता के सामने वह पूडा रख दिया। शास्ता ने औरो के दिये हुए खाजो को अस्वीकार कर उसी पूडे-खाजे को ग्रहण किया। उसी समय सारे नगर में एक शोर मच गया कि सम्यक् सम्बुद्ध ने उस महादरिद्र का खाना बिना घृणा के खाया। २

१८ [ १.११.१०६ राजा, राजा के महामन्त्री आदि, और तो और द्वारपाल तक आकर शास्ता को प्रणाम कर उस महादरिद्री से कहने लगे—"भो ! सौ लेकर, दो सौ लेकर या पांच सौ लेकर हमारा भी हिस्सा रक्खो ।" उसने 'शास्ता से पूछकर जाऊंगा' सोच शास्ता के पास जाकर यह बात कही । शास्ता ने उत्तर दिया "धन लेकर या बिना लिये जैसे भी हो सब प्राणियो को हिस्सेदार बनाओ । उसने धन लेना प्रारम्भ किया। मनुष्यो ने दुगुना, चौगुना, आठ गुना आदि दे देकर नौ करोड सोना दिया । शास्ता दानानुमोदन कर विहार चले गये । फिर भिक्षुओं के अपना अपना कर्त्तव्य करने पर शास्ता ने उन्हें उपदेश दे गन्धकुटी मे प्रवेश किया । शाम को राजा ने उस महादरिद्री को बुलवाया और श्रेष्ठी बना उसका सत्कार किया। धर्म-सभा मे भिक्षुओ ने बातचीत चलाई—"आयुष्मानो ! महान् दरिद्री के दिये हुए पूए, शास्ता ने बिना घृणा प्रगट किये ऐसे खाये जैसे अमृत । महान् दरिद्री भी बहुत सा धन और सेठ का पद प्राप्त कर बहुत सम्पत्तिशाली हो गया । शास्ता ने आकर पूछा—"भिक्षुओ ! बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?" "अमुक बातचीत" कहने पर 'भिक्षुओ ! न केवल अभी मैने बिना घृणा दिखाये उसके पूए खाये बल्कि पहले जब मै वृक्ष-देवता था तब भी खाये थे" कह पूर्व-जन्म की कथा कही—

ख. अतीत कथा

पूर्व समय म वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य के समय बोधिसत्व अरण्डी के एक वृक्ष पर वृक्ष-देवता होकर पैदा हुए । उस गांवडे के मनुष्य तब देवता- विश्वासी¹ थे । एक त्योहार आने पर उन्होने अपने अपने वृक्ष-देवताओ को बलि दी । एक दरिद्री मनुष्य ने लोगो को वृक्ष-देवताओ की सेवा करते देख स्वय एक अरण्ड-वृक्ष की सेवा की । मनुष्य अपने अपने देवताओ के लिये

¹देवता मङ्गलिका, जिनका विश्वास हो कि देवताओ की पूजा करने से कल्याण होगा ।

कुण्डकपूव ] १६ नाना प्रकार के माला, गन्ध, लेपन आदि और खाद्य-भोज्य लेकर गये । लेकिन यह ले गया भूरे के पूए और कड्छी में पानी। अरण्ड-वृक्ष के समीप पहुँचा तो सोचने लगा—"देवता दिव्य-भोजन करते हैं। मेरे देवता यह घूरे का पूआ नहीं खायेंगे। इसे व्यर्थ क्यों नष्ट करें ? मैं ही इसे खा लूँगा।" यह सोच वहीं से लौट पड़ा। बोधिसत्त्व ने वृक्ष की शाखा पर खड़े होकर कहा—"भो ! यदि तुम धनी होते तो मुझे मधुर खाजा देते, लेकिन तुम दरिद्र हो। मैं तुम्हारा पूआ न खाकर और क्या खाऊँगा ? मेरे हिस्से को नष्ट न करो।" इतना कह यह गाथा कही— ययन्नो पुरिसो होति तथन्ना तस्स देवता, आहरेतं फणं पूर्व मा मे भागं विनासय ॥ [ जैसा आदमी, वैसा देवता । इस घूरे के पूए को ला । मेरे हिस्से को नष्ट मत कर।] ─── ययन्नो, जैसा भोजन, तथन्ना, उस आदमी का देवता भी वैसे ही भोजन का खानेवाला होता है। आहरेत फणं पूवं—इस घूरे के पके पूए को ला । मेरे हिस्से को नष्ट न कर । उसने वापिस लौट बोधिसत्त्व को देख बलि दी। बोधिसत्त्व ने उसमें से सार ग्रहणकर पूछा—"भले आदमी ! तू किस लिये मेरी सेवा करता है ?" "स्वामी ! मैं दरिद्र हूँ। चाहता हूँ कि दरिद्रता से मुक्त हो जाऊँ । इसी लिये सेवा करता हूँ।" "भले आदमी ! चिन्ता मत कर। तूने जो सेवा की है वह कृतज्ञ की, कृत-उपकार को न भूलनेवाले की की है। इस अरण्ड के चारो ओर खजाने से भरे घडे गर्दन से गर्दन मिलाकर रक्खे हैं। तू राजाको कह, गाड़ियों में धन लदवाकर राजाङ्गण में डलवा। राजा प्रसन्न होकर तुझे श्रेष्ठी का पद दे देगा।" यह कहकर बोधिसत्त्व अन्तर्धान हो गये। उसने वैसा ही किया। राजा

शास्ता ने यह धर्म-देशना ला, जातक का मेल बैठाया। उस समय जो

२० [ १.११.११० ने उसे सेठ के पद पर नियुक्त किया। इस प्रकार वह बोधिसत्त्व (की कृपा) से महासम्पत्तिशाली हो स्वकर्मानुसार परलोक गया। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला, जातक का मेल बैठाया। उस समय जो दरिद्र था, वही इस समय दरिद्र। अरण्ड-वृक्ष का देवता तो मै ही था। ११०. सब्ब संहारक पञ्हो “सब्ब संहारको नत्थि”—यह सब्बसहारकपञ्ह (जातक) सारी की सारी उम्मग्ग जातक¹ में प्रगट होगी। महाउम्मग जातक (५४६)

“हंसी त्वं मञ्जसि” यह गद्रभपञ्ह (जातक) भी उम्मग जातक¹ म

पहला परिच्छेद १२. हंसी वर्ग १११. गद्रभ पञ्हो “हंसी त्वं मञ्जसि” यह गद्रभपञ्ह (जातक) भी उम्मग जातक¹ म ही आयेगी । ११२. अमरादेवी पञ्ह “येन सत्तुकिलङ्गा च” यह अमरादेवी पञ्ह (जातक) भी वही (उम्मग जातक¹ में) आयेगी । ११३. सिगाल जातक “सद्दहासि सिगालस्स...”यह गाथा शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय देवदत्त के बारे में कही । १ उम्मग जातक (५४६)